बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में 16 लोगों की आंखें किस वजह से निकाली गईं?

    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, मुज़फ़्फ़रपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

'आंख के बदले आंख चाहिए, आंख ही नहीं रहेगा तो ज़िंदगी कैसे चलेगा'

'जाँच के बहाने निकाल लिया आंख, हमसे न अंगूठा लिया और न सिग्नेचर'

यह कहना है 70 साल की कौशल्या देवी का जिनकी एक आंख निकाली जा चुकी है. दूसरी आंख भी कुछ ख़ास साथ नहीं देती.

इन दिनों वह अपनी बेटी के पास रह रही हैं, वैसे तो उनके दो बेटे भी हैं लेकिन कोई बेटा उनकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं. उन्हें 400 रुपये वृद्धावस्था पेंशन मिलती है और वही उनके गुज़ारे का मूल साधन है.

वहीं 60 साल की सावित्री देवी को भी अपनी एक आंख गंवानी पड़ी है.

उन्हें तो किसी तरह की कोई वृद्धावस्था पेंशन भी नहीं मिलती, और उनके पति की पेंशन भी लॉकडाउन से रुकी हुई है. उन्हें राशन भी नहीं मिल पा रहा है. पैसे के अभाव में बिजली का कनेक्शन काट दिया गया है. दो बेटियों के सहारे ज़िंदगी काटने की कल्पना करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है.

क्या है मामला

ये दोनों महिलाएं उन 65 मरीज़ों में शामिल हैं, जो मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के 'मुज़फ़्फ़रपुर आई हॉस्पिटल' में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने गए थे.

ये दोनों 22 नवंबर के दिन पहुँचीं तो इस उम्मीद में थीं कि उनके आंखों के सामने छा रहा धुंधला छटेगा लेकिन धुंधला छटना तो दूर आज वह अपनी एक आंख की रोशनी भी हमेशा के लिए गंवा बैठी हैं. इसी तरह से अब तक 16 लोगों की आंखें निकाली जा चुकी हैं.

ऑपरेशन के बाद से ही कई मरीज़ों की हालत ख़राब होने लगी. किसी के सिर में दर्द तो किसी को उल्टियां होने लगीं, लेकिन सारे मरीज़ों को अगले दिन कुछ दवाएं देकर और ड्रेसिंग वग़ैरह करके डिस्चार्ज कर दिया गया. यह कहा गया कि वे आठवें दिन यानी कि अगले मंगलवार (30 नवंबर) को वापस आएं.

एसकेएमसीएच में अपने पति का इलाज करवा रही रंजना कुमारी हमसे बातचीत में कहती हैं, "मेरे पति को परेशानी तो ऑपरेशन के बाद से ही होने लगी थी, लेकिन पहले दवाई और बाद में इंजेक्शन देकर मंगलवार (23 तारीख़) को नाम काट दिया गया. कोई डॉक्टर या सिस्टर सुध लेने नहीं आया. कहा गया कि मरीज़ को घर ले जाएं और अगले मंगलवार यानी कि (30 तारीख़) को फिर से वापस आएं लेकिन हमारी दिक़्क़त बढ़ने लगी. हम अपने मरीज़ को 24 तारीख़ को ही लेकर मुजफ़्फ़रपुर आई हॉस्पिटल पहुँचे."

रंजना कुमारी कहती हैं, "जब हॉस्पिटल में शिकायत की तो हमें कुछ भी स्पष्ट नहीं बताया गया. हमको पटना चलने के लिए कहा गया, वहां दृष्टिकुंज हॉस्पिटल में अल्ट्रासाउंड हुआ. वहां भी हमें कुछ स्पष्ट नहीं बताया गया."

"अगर हमसे वे सारी बातें साफ़-साफ़ कहते तो हम कहीं और कोशिश करते. अपनी आंख तो नहीं गंवाते. दोनों अस्पतालों में मिली-भगत है. वहां भी हमसे कहा गया कि हम उनका कुछ नहीं कर पाएंगे. थाने से लेकर वकील सब हमारे पास हैं. हम सब मैनेज कर लेंगे."

एफ़आईआर की गई दर्ज

मुज़फ़्फ़रपुर सदर अस्पताल के सिविल सर्जन डॉक्टर विनय शर्मा ने बताया कि अस्पताल के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और क़ानून के अनुसार कार्रवाई होगी. अब तक जो जाँच हुई है उसकी रिपोर्ट भी थाने को भेज दी गई है. प्राथमिकी में हत्या के प्रयास, जानबूझकर लापरवाही और अंग-भंग करने समेत कई धाराएं लगाई गई हैं.

क़ानूनी प्रक्रियाओं और मुआवज़े के सवाल पर मरीज़ प्रमीला देवी (48) कहती हैं कि 'वह बस सरकार से यही कहना चाहती हैं कि उन्हें आंख के बदले आंख चाहिए क्योंकि जब आंख ही नहीं रहेगी तो वह क्या करेंगी?'

प्रमीला देवी छह बच्चों की मां हैं, उनके पास खेत भी नहीं है और बकरी और मज़दूरी करके घर किसी तरह से चलता है. वह इस बात को लेकर चिंतिंत हैं कि आगे उनकी ज़िंदगी कैसे कटेगी.

राज्य की जाँच टीम ऑपरेशन में हुई ख़ामी की जाँच में जुटी है. इस टीम के एक सदस्य हरीश चंद्र ओझा का कहना है, "प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अस्पताल की टीम से कहीं न कहीं चूक तो हुई है यह तो तय है. इस मामले में अस्पताल को मरीज़ों का तय आंकड़ा तो देना था लेकिन उसके असहयोग की वजह से ही एफ़आईआर दर्ज करने की नौबत आई है. यह तो तय है कि अस्पताल अगर जाँच में दोषी पाया जाता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी. जितने लोगों की आंखें ख़राब हुईं, उनका उचित इलाज सरकार कराएगी और सरकार की तरफ़ से जो अनुदान देना होगा, वह सरकार देगी.''

इस जाँच के बीच मुज़फ़्फ़रपुर आई हॉस्पिटल के सहायक प्रशासक पद पर कार्यरत दीपक कुमार ने अस्पताल का पक्ष रखते हुए कहा, "21 नवंबर को इस अस्पताल में शिविर लगा, जिसमें 105 मरीज़ भर्ती हुए और इनमें से 65 लोगों का ऑपरेशन सोमवार (22 नवंबर) को किया गया."

"ऑपरेशन डॉक्टर एनडी साहू ने किया. 23 तारीख़ को मरीज़ों को छुट्टी दे दी गई. 25 तारीख़ को कुछ मरीज़ आंख में दर्द की शिकायत के साथ आए और इसके बाद उन्हें डॉक्टर से दिखाया गया. डॉक्टर ने उन मरीज़ों को बताया कि उनकी आंख में इंफ़ेक्शन हो गया है, जो काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है."

"इस पर हम लोगों ने राय-विचार किया, जिस पर रेटिना सर्जन से इलाज कराने की बात हुई. हमारे यहां के रेटिना सर्जन छुट्टी पर थे तो हमने मरीज़ों को तुरंत पटना भेज दिया, वहां उनका इलाज हुआ और मरीज़ फिर अस्पताल वापस आए. जिसमें से कई लोग ठीक हुए और चार मरीज़ ऐसे थे, जो ठीक नहीं हो सकते थे और चिकित्सक के अनुसार ऐसे मरीज़ों की सुरक्षा को देखते हुए और उनकी मर्ज़ी से डॉक्टर ने उनकी आंख निकाली."

दीपक कुमार यह भी बताते हैं कि अस्पताल में ऑपरेशन के दिन कोई सर्जन नहीं था और सहयोग के लिए डॉक्टर एनडी साहू को बुलाया गया था.

वह इस आरोप को ख़ारिज करते हैं कि मरीज़ से आंख निकालने के बारे में नहीं पूछा गया था.

वह यह कहते हैं कि मरीज़ को पूरी तरह से स्थिति समझाई गई थी और उनकी अनुमति से ही आंख निकाली गई थी.

पीड़ितों का अलग बयान

हालांकि, मर्ज़ी और अनुमति की बात पर पीड़ित सावित्री देवी की बेटी मीना कहती हैं कि जाँच के बहाने से उनकी मां को ले जाया गया और उनसे काग़ज़ात तक ले लिए गए थे और वहां आंख निकाल ली गई.

वह स्पष्ट तौर पर कहती हैं कि उनसे कहीं भी हस्ताक्षर या अंगूठा नहीं लिया गया था.

एक साथ कई मरीज़ों को हुई दिक़्क़त को लेकर यह बात सामने आ रही है कि यह मामला आंख में ऑपरेशन के बाद हुए इंफ़ेक्शन का हो सकता है.

इस पर मुजफ़्फ़रपुर में सदर अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीतू कुमारी ने कहा, "सर्जरी तो विशेषज्ञ द्वारा ही की गई है और इसमें कुछ ग़लती भी नहीं हुई है. लेकिन इतने सारे मामले एक साथ आए हैं तो इससे यही ज़ाहिर होता है कि यह संक्रमण का मामला है, यह सिर्फ़ सर्जरी से नहीं हो सकता है और यह पता लगाना होगा कि संक्रमण का स्रोत क्या है? दवाई या औज़ार?"

"मरीज़ को जब अस्पताल से छुट्टी दी गई तब तक मरीज़ की स्थिति भी अच्छी थी. जितने मरीज़ों से मेरी बात हुई तो उनमें से सबने यही कहा कि उनकी हालत एक दिन बाद बिगड़ी है. जाँच के सारे नमूनों को एसकेएमसीएच माइक्रो बायलॉजी विभाग भेजा जा चुका है, वहां से रिपोर्ट आने पर ही चीज़ें स्पष्ट होंगी.''

एक दिन में कितने ऑपरेशन कर सकते हैं डॉक्टर?

एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉक्टर बीएस झा इलाज में देरी के सवाल पर कहते हैं, "निश्चित रूप से यदि 24 घंटे के अंदर कोई मरीज़ आता है तो एक इंजेक्शन लगाकर इंफ़ेक्शन को नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन अगर ऐसा करने में विलंब होता है तो संक्रमण आंख के बाहर फैल जाता है. अगर इसको भी नियंत्रित नहीं किया जाता तो जीवन के लिए ख़तरा पैदा हो जाता है.''

वहीं एक शिफ़्ट में ज़्यादा मरीज़ों के ऑपरेशन के बारे में वह कहते हैं, "छह घंटे की एक शिफ़्ट होती है तो एक दिन में अधिकतम दो शिफ़्ट में एक डॉक्टर 30 ऑपरेशन कर सकता है. यह मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया का दिशानिर्देश है."

हालांकि, उनसे जब यह पूछा गया कि इस मामले में तो ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई देता है तो उनका कहना था, "देश में जनसंख्या इतनी ज़्यादा है कि मानदंड के अनुसार हम कहां चल पाते हैं.''

विधानसभा तक पहुंचा मामला

मुज़्फ़फ़रपुर आई अस्पताल के बाहर एक पर्चा चिपका दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि इस मामले की जाँच करने तक सदर हॉस्पिटल और एसकेएमसीएच मेडिकल कॉलेज से जाँच समिति आई, जिसने तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक ओटी बंद करने का निर्देश दिया है.

एसकेएमसीएच में भर्ती मरीज़ों को बेहतर इलाज के लिए एक बस से पटना भेजा गया है.

अब तक कुल 16 लोगों की आंखें निकाली जा चुकी हैं. पीड़ितों का इलाज सरकारी ख़र्चे पर होने की बात कही गई है और यह मामला राज्य के विधानसभा में भी उठ चुका है.

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने प्रदर्शन किया और पीड़ितों के लिए पर्याप्त मुआवज़े और दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की. वहीं कुछ नेताओं ने स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का इस्तीफ़ा भी माँगा है.

हालांकि, स्वास्थ्य मंत्री का कहना है कि जाँच टीम गठित की जा चुकी है और रिपोर्ट आने के बाद उसी आधार पर कार्रवाई की जाएगी.

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