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बिहार: कोरोना जांच में बड़ा घोटाला, सरकार ने दिए जांच के आदेश
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में कोविड-19 के सैंपल टेस्ट में अनियमितता का मामला प्रकाश में आया है.
राज्य में बड़े पैमाने पर हो रहे रैपिड एंटिजन टेस्ट के आंकड़ों में फ़र्ज़ीवाड़ा और टेस्टिंग में धांधली पर अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है.
अनियमितता का कैसे पता चला?
इस रिपोर्ट में पटना, शेख़पुरा और जमुई की सूची में दर्ज 885 प्रविष्टियों की पड़ताल की गई है जिनका सरकारी आंकड़ों में कोविड-19 सैंपल टेस्ट हो चुका है.
अख़बार की पड़ताल में बहुत सारे नाम और फ़ोन नंबर फ़र्ज़ी मिले. सूची में सैकड़ों ऐसे नाम दर्ज हैं जिनके मोबाइन नंबर की जगह 0000000000 लिखा है. किसी का नाम सही है तो फ़ोन नंबर ग़लत है और किसी का फ़ोन नंबर सही है तो नाम ग़लत.
बिहार का विपक्ष इस मुद्दे पर नीतीश सरकार को घेरने की कोशिश में है.
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं, "मैंने पहले ही बिहार में कोरोना घोटाले की भविष्यवाणी की थी. तब विधानसभा में हमनें घोटाले का चिट्ठा सार्वजनिक किया था तो मुख्यमंत्री ने हमेशा की तरह नकार दिया. उन्होंने अधिकारी बदले. एक-एक करके तीन. और फिर वो 'अमृत' मंथन किया कि 7 दिनों में प्रतिदिन टेस्ट का आंकड़ा 10 हज़ार से 1 लाख और 25 दिनों में 2 लाख पार करा दिया."
सरकार ने क्या कार्रवाई शुरू की?
बिहार सरकार ने भी मामले को संज्ञान में लेते हुए अख़बार की रिपोर्ट के आधार पर आंकड़ों में हुए फ़र्ज़ीवाड़े की जांच के आदेश दे दिए हैं.
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा है, "फ़र्ज़ीवाड़े के लिए जो भी दोषी पाए जाएंगे उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. मैंने विभाग के प्रधान सचिव से कहा है कि रिपोर्ट में जो भी तथ्य छपे हैं उनकी जांच की जाए और अनियमितता के लिए ज़िम्मेदार लोगों पर एक्शन लिया जाए. विभाग ने अंतरिम जांच शुरू कर दी है."
मंत्री का आदेश मिलते ही विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने उन ज़िलों के सिविल सर्जनों को तलब किया जिनके यहां के आंकड़ों में अनियमितता की रिपोर्ट छपी है.
प्रत्यय अमृत ने बीबीसी को बताया, "अख़बार की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित ज़िले के सिविल सर्जन को जल्द से जल्द उन सभी मामलों की जांच करने का आदेश दिया गया है जिनके बारे में रिपोर्ट में लिखी गई है. ज़िलों से रिपोर्ट आने के बाद हमलोग आगे की कार्रवाई करेंगे."
संसद तक जा पहुंची बात
राष्ट्रीय जनता दल ने शुक्रवार को संसद में भी यह मुद्दा उठाया. राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने ऊपरी सदन में अख़बार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से बिहार में कोरोना जांच में हुए फ़र्ज़ीवाड़े की उच्चस्तरीय जांच की मांग की.
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आगे से कोरोना जांच के दौरान जांचे गए लोगों की पहचान के लिए वैध पहचान पत्र को अनिवार्य बनाया जाए जिससे कि इस तरह का फ़र्ज़ीवाड़ा न हो सके.
अंग्रेज़ी अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह जिन्होंने यह रिपोर्ट की है, बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "टेस्टिंग का जैसा पैटर्न बिहार में है, लगभग वैसा ही दूसरे राज्यों में भी है. अगर इसी तरह की पड़ताल दूसरे राज्यों में भी की जाए तो हो सकता है उन राज्यों में भी ऐसी अनियमितताएं देखने को मिलें. लेकिन यह जांच का विषय है. हमें जांच की प्रक्रिया को बदलना होगा. प्रामाणिकता के लिए पहचान के वैध दस्तावेज़ों को शामिल करना होगा जैसे आधार कार्ड या दूसरे अन्य दस्तावेज़."
उधर झारखंड सरकार ने भी अख़बार की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए अपने राज्य के आंकड़ों की जांच के आदेश पहले ही दे दिए हैं. बिहार में हुई अनियमितताओं को आधार बनाते हुए झारखंड के स्वास्थ्य विभाग ने अपने सभी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को कहा है कि अपने ज़िले के आंकड़ों की जांच कर रिपोर्ट भेजें.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई को बिहार में कोरोना जाँच की संख्या 10456 थी, जो छह दिनों में ही 30 जुलाई को दोगुनी तेज़ी से बढ़कर 20801 हो गई.
इसके 13 दिनों बाद 13 अगस्त को बिहार में प्रतिदिन कोविड-19 के सैंपल टेस्ट की संख्या एक लाख के आंकड़े को भी पार कर गई. और फिर 22 अगस्त आते-आते रोज़ाना दो लाख से भी अधिक सैंपल टेस्ट होने लगे.
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