You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बिहार: नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर की टिप्पणी, तो जाएंगे जेल
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई का गुरुवार को जारी एक आदेश विवादों में है.
राज्य के मुख्य सचिव, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव और राज्य के पुलिस महानिदेशक को जारी इस आदेश में कहा गया है, "सोशल मीडिया/ इंटरनेट के माध्यम से सरकार, मंत्रीगण, सांसद, विधायक एवं सरकारी पदाधिकारियों के संबंध में आपत्तिजनक /अभद्र एवं भ्रांतिपूर्ण टिप्पणियां साइबर अपराध की श्रेणी में आती है. इस कृत के लिए ऐसे व्यक्तियों, समूहों के विरुद्ध विधि सम्मत कार्रवाई किया जाना समीचीन प्रतीत होता है."
आर्थिक अपराध इकाई, साइबर अपराध का नोडल संस्थान है. इकाई के अपर पुलिस महानिदेशक नैय्यर हसनैन ख़ान ने आदेश दिया है कि ऐसे मामलों के बारे में आर्थिक अपराध इकाई को सूचित किया जाए ताकि विधि सम्मत कार्रवाई की जा सकें.
'सीएम मुझे गिरफ़्तार करें'
इस आदेश के आने के बाद से ही राज्य के राजनीतिक और नागरिक समाज में प्रतिक्रियाएं तेज़ हो गईं हैं.
प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हिटलर के पदचिह्नों पर चलने वाला बताया है.
उन्होंने ट्वीट किया, "नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के पितामह, दुर्दांत अपराधियों के संरक्षणकर्ता, अनैतिक और अवैध सरकार के कमज़ोर मुखिया हैं. मैं सीएम को चुनौती देता हूं कि इस आदेश के तहत मुझे गिरफ़्तार करें."
वहीं जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन ने बीबीसी से कहा, "जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ जिस तरह से सोशल मीडिया का दुरुपयोग हो रहा है उस पर सरकार के इस क़दम की तारीफ़ होनी चाहिए. सोशल मीडिया तो दुनिया की अच्छी चीज़ें जानने, उसे एक्सप्लोर करने का साधन है लेकिन आप असंसदीय शब्द का इस्तेमाल कर रहे है."
वहीं बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल कहते हैं, "किसी भी व्यक्ति को अभद्र भाषा का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है. कोई भी अनर्गल आरोप लगाकर चला जा रहा है बिना किसी प्रमाण के. ऐसे में ये स्वागत योग्य क़दम है."
लेकिन पत्र में वर्णित अभद्र या अमर्यादित क्या है, इस सवाल पर राजीव रंजन कहते हैं, "साइबर क़ानून में जो भी अभद्र या अमर्यादित की श्रेणी में रखा गया है, वो यहां भी लागू होगा."
लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों पर हमला
पीपल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) के राज्य महासचिव सरफ़राज़ कहते हैं, "ये पत्र आईपीसी की धारा 124 ए की तरह है. पत्र बहुत अस्पष्ट है यानी इस बात की क्लैरिटी ही नहीं है कि अभद्र टिप्पणी सरकार किसे मानती है? ऐसे में सरकार किसी भी व्यक्ति पर बहुत आसानी से कार्रवाई कर सकती है. ये हमारे व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है. "
वहीं पटना यूनिवर्सिटी डेमोक्रैटिक टीचर फ़ोरम के संयोजक और पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य नवल किशोर चौधरी कहते हैं, "मानहानि का क़ानून पहले से ही आपके पास है. ऐसे में ये नया क़ानून तो लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों पर ही हमला है और ये सिर्फ़ बिहार सरकार ही नहीं कर रही."
नीतीश सरकार की 'इमरजेंसी'
साल 2013 में नीतीश सरकार ने दुर्गापूजा पंडालों में धार्मिक और पॉलिटिकल कार्टूनों पर रोक लगा दी थी. राजधानी पटना के दुर्गापूजा पंडालों में कार्टून मुख्य आकर्षण पॉलिटिकल कार्टून थे जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना होती थी. साल 2013 में कार्टूनों की इस बंदिश की आलोचना हुई थी.
ऐसा नहीं था सरकारी आलोचना को दबाने की ये एकमात्र कोशिश थी. साल 2019 में सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक़ सरकार ने साल 2014 से 2019 तक 498 करोड़ रुपये सिर्फ़ अख़बारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर विज्ञापन को देने में ख़र्च किए थे. साल 2014 -15 में सरकार ने मीडिया विज्ञापन पर 83 करोड़ रुपये ख़र्च किए तो 2018-19 में ये बढ़कर 133 करोड़ हो गया.
वहीं अगर 1999 से 2006 तक के मीडिया संस्थानों को दिए गए विज्ञापनों की बात करें तो ये पाँच करोड़ से भी कम था. साल 2007-08 में इसमें उछाल आया और ये बढ़कर 9,65,45,105 रुपये हुआ.
ग़ौरतलब है कि 2007-08 तक विज्ञापन सिर्फ़ प्रिंट मीडिया के लिए ही थे. 2008-09 में इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी विज्ञापन दिए जाने लगे. इस वित्तीय वर्ष में भी 24 करोड़ से ज्यादा का विज्ञापन प्रिंट मीडिया को दिया गया जो 2007-08 में दिए गए 9 करोड़ का लगभग तीन गुना था.
मुख्यमंत्री सोशल मीडिया से परेशान
ऐसे में ये सवाल मौजूं है कि ये पत्र जारी करने के क्या मायने हैं?
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय कहते हैं कि मुख्यधारा की मीडिया सत्ता पक्ष की ख़बरों से पटी पड़ी रहती है, तो लोग और विपक्षी दल सरकार की आलोचना सोशल मीडिया के ज़रिए कर रहे है.
वो आगे कहते हैं, "हाल के दिनों में मुख्यमंत्री सोशल साइट्स पर अपनी आलोचना से नाराज़गी ज़ाहिर करते रहे हैं. तेजस्वी भी इसका इस्तेमाल ख़ूब करते हैं. ऐसे में ये क़दम मुख्य तौर राजनीतिक विरोध या पॉलिटिकल ऑपोज़ीशन दबाने के लिए है. वर्ना सारे क़ानून तो पहले से ही मौजूद है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "हाल के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री ख़ुद लालू परिवार के ख़िलाफ़ अमर्यादित टिप्पणियों करते रहे. ऐसे में उनकी सरकार का ये आदेश सिर्फ़ सरकार की आलोचना के दमन का ही तरीक़ा है. सरकार इमरजेंसी की तरफ़ बढ़ रही है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)