बेंगलुरु में 16 महीने बाद कोरोना पीड़ितों के शव मिलने का मामला- जानिए क्यों हुआ ऐसा

मुनिराजू अपने परिवार के साथ जिनकी जुलाई 2020 में मौत हो गई थी और 16 महीने बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ.

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इमेज कैप्शन, मुनिराजू अपने परिवार के साथ जिनकी जुलाई 2020 में मौत हो गई थी और 16 महीने बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ.
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

"क्या महसूस होगा जब कोई कहे कि 16 महीने पहले गुज़रे पिता का शव अब मिला है. हम लोग उनका अंतिम संस्कार बीते साल ही कर चुके थे, ऐसा लगा कि सिर पर पहाड़ गिरा हो."

यह दुख चेतना सतीश का है जिन्हें स्थानीय पुलिस से पता चला कि उनके पिता का शव राजाजीनगर स्थित केंद्र सरकार द्वारा संचालित इंप्लॉइज़ स्टेट इंश्योरेंस (ESI) अस्पताल के शव गृह में 2 जुलाई, 2020 से रखा हुआ है.

पुलिस ने 15 साल की कीर्तना को भी फोन किया और उन्हें बताया कि उनकी मां दुर्गा सुमित्रा का शव भी 2 जुलाई, 2020 से ही शव गृह में रखा हुआ है.

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इन बच्चों की मौसी जीबी सुजाता बताती हैं, "कीर्तना और उसकी 10 साल की छोटी बहन, पुलिस के फोन के बाद से ही सदमे में हैं. मैं उन्हें अपने साथ ले आयी क्योंकि दुर्गा मेरी छोटी बहन थी. बच्चों के पिता की मौत भी स्वास्थगत वजहों से 2019 में हो गई थी."

अस्पताल ने अंतिम संस्कार करने का किया था दावा

इन दोनों ही परिवारों को जब पिछले साल अपने-अपने परिजनों की मौत की जानकारी मिली थी तब उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था. अस्पताल प्रबंधन ने चेतना के पिता मुनिराजू और कीर्तना की मां दुर्गा सुमित्रा की कोविड से मौत की जानकारी इन परिवारों को दी थी.

चेतना ने बताया, "उस समय में कोविड संक्रमित मरीज़ों के शव को घर लाने की इजाज़त नहीं थी, हमें बताया गया था कि बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका के कर्मचारी उनका अंतिम संस्कार करेंगे. हम वहां गए भी नहीं थे क्योंकि हमारे पड़ोसी कोविड संक्रमण को लेकर काफ़ी डरे हुए थे."

जीबी सुजाता ने बताया, "नगरपालिका अधिकारियों ने हमें फोन करके बताया कि अंतिम संस्कार हो गया है. हमें मृत्यु प्रमाण पत्र भी मिल गया."

स्वास्थ्य कर्मी

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यही वजह है कि जब पुलिस ने इन परिवारों को परिजनों के अंतिम संस्कार नहीं होने की जानकारी दी तब से ये लोग सदमे में हैं. चेतना और कीर्तना को पुलिस ने तब फ़ोन किया जब ESI अस्पताल के सफ़ाई कर्मचारी को दो शव गृहों में से एक में दुर्गंध महसूस हुई.

रविवार को ESI अस्पताल के कर्मचारियों ने पुलिस को जानकारी दी और पुलिस को गले हुए शव पर दोनों परिवारों के संपर्क का टैग मिला. पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज करते हुए शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा.

किसी के पास कोई जवाब नहीं

जीबी सुजाता ने बताया, "पुलिस ने हमें बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया. हमें कोई नहीं बता रहा है कि शव इतने लंबे समय तक शव गृह में कैसे रखे रहे?"

राजाजी नगर के बीजेपी विधायक और पूर्व मंत्री सुरेश कुमार ने श्रम मंत्री शिवाराम हेब्बार को लिखे खुले खत में कहा है, "यह अमानवीय है."

अधिकारियों के मुताबिक मुनिराजू और दुर्गा की कोविड से मौत के एक महीने बाद एक नया शव गृह बना था और उससे पहले पुराने शव गृह को ख़ाली किया जाना था.

नए शव गृह में 12 शवों को एक साथ रखने की व्यवस्था है जबकि पुराने में छह शव रखे जा सकते थे.

इन दोनों शवों को पुराने शव गृह से नहीं निकालने और बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका के कर्मचारियों को नहीं सौंपने के मामले में किसकी लापरवाही है, इसका पता अभी तक नहीं चला है.

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अस्पताल के फॉरेंसिक विभाग के एक प्रोफेसर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कोविड संक्रमण के समय में शव गृह की देखभाल का ज़िम्मा कैजुअल्टी विभाग के पास था."

लगातार फोन और मैसेज भेजने के बाद भी अस्पताल प्रबंधन यानी मेडिकल सुपरिटेंडेंट या फिर निदेशक से संपर्क नहीं हो सका है. अस्पताल के एक कमर्चारी ने नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त के साथ कहा कि नए शव गृह का प्रभार फॉरेंसिक विभाग के पास है जबकि पुराने शव गृह का प्रभार कैजुएल्टी विभाग के पास ही है.

बेंगलुरु में काम करने वाले एक फॉरेंसिक प्रोफ़ेसर ने पहचान ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर बीबीसी हिंदी से कहा, "अगर शव गृह का फ्रीजर ठीक से काम कर रहा था तो दुर्गंध बाहर नहीं आनी चाहिए. अगर फ्रीजर का इस्तेमाल नहीं हो रहा होगा तो यह संभव है."

उन्होंने यह भी बताया, "हम दूसरे देशों के उदाहरणों से जानते हैं कि शव गृहों में लंबे समय तक शव रखे जा सकते हैं. एक सवाल तो यही है कि दुर्गंध कैसे आई. शव को नष्ट करने का तरीका अस्पताल जानते हैं और सरकारी अस्पताल भी कोई अपवाद नहीं हैं."

स्थानीय बीजेपी विधायक सुरेश कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह पूरी तरह से लापरवाही का मामला है. यह अस्पताल प्रबंधन और नगरपालिका के बीच आपसी तालमेल की कमी का भी मामला है. दोनों की लापरवाही है."

शुरुआत में कर्नाटक के श्रम विभाग ने इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया लिया था.

मरीज़

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दरअसल ESI अस्पताल श्रम विभाग के अधीन संचालित है लेकिन राजाजी नगर वाला अस्पताल नई दिल्ली से संचालित है.

कर्नाटक के श्रम मंत्री शिवाराम हेब्बार ने कहा, "जया नगर, राजाजी नगर और कलबुर्गी के अस्पताल का संचालन दिल्ली से होता है. लेकिन दो लोगों की मौत कैसे हुई है और उनका शव अब कैसे मिला? मैंने ESI मेडिकल सेवा बेंगलुरू को इस मामले की जांच का निर्देश दिया है."

राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है या नहीं

कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. के. सुधाकर के मुताबिक इस मामले में राज्य सरकार ज़िम्मेदार नहीं है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "मूल रूप से ESI अस्पताल श्रम विभाग के अधीन काम करता है. मामला जहां का है, वह अस्पताल सीधे दिल्ली मुख्यालय से संचालित है. सब लोग सोच रहे हैं कि राज्य सरकार का स्वास्थ्य विभाग ज़िम्मेदार है लेकिन ऐसा है नहीं. फिर भी मैं यह स्वीकार करता हूं कि यह ग़लती हुई है."

के. सुधाकर ने कहा, "सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर मैं ज़िम्मेदारी लेता है. अधिकारियों को परिवार के पास जाकर माफ़ी मांगनी चाहिए. किसी भी सूरत में यह ग़लती दोबारा नहीं होनी चाहिए."

लेकिन सुजाता और चेतना की समस्या केवल माफ़ी मांगने से दूर नहीं होगी. जन स्वास्थ्य मामलों की विश्लेषक और एक्टिविस्ट डॉ. सेल्विया करपागम बताती हैं, "परिवार को ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए मदद की ज़रूरत होती है."

कोरोना

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चेतना ने कहा, "जब हम मेडिकल रिपोर्ट्स मांगने गए थे तो हमसे सही ढंग से बात नहीं की गई थी. हमने बीयू नंबर (बेंगलुरु शहर में कोविड संक्रमित सभी लोगों को मिला नंबर) भी मांगा था लेकिन हमें वह नंबर नहीं मिला."

उस नंबर की ज़रूरत क्यों है, इस बारे में पूछे जाने पर चेतना ने कहा, "अगर हमारे पास वह नंबर होता तो हम सरकार की ओर से कोविड मौतों पर मिलने वाली एक लाख की मदद के लिए आवेदन कर सकते थे."

जीबी सुजाता बताती हैं, "हमें अंतिम संस्कार के बाद कल रात बीयू नंबर मिला है. उम्मीद है कि हमें यह सहायता मिलेगी. लेकिन मैं चाहती हूं कि सरकार दुर्गा के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ख़र्चा उठाए.

"मेरी बहन ने दोनों का नामांकन प्राइवेट स्कूल में कराया था. मैं उन्हें वहां से निकालना नहीं चाहती. मेरे भी पति की मौत दुर्गा के पति की मौत से कुछ साल पहले हो गई थी. मेरा एक बेटा भी है जो पढ़ाई कर रहा है."

भोपाल में अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करते लोग

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डॉ. सेल्विया बताती हैं, "यह एक दो डॉक्टर या अधिकारी पर दोष मढ़ने जैसा मामला नहीं है. यह समस्या जन स्वास्थ्य सुविधाओं की उपेक्षा के चलते अंदर तक धंसी हुई है. कोरोना महामारी के बाद सभी राज्य सरकारों को जन स्वास्थ्य सुविधाओं में कमियों को दूर करने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए.

"अधिकांश मामलों में एक दो लोगों को दोषी ठहरा दिया जाता है, जो निचले पायदान पर काम करते हैं, किसी भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनका कोई योगदान नहीं होता है."

जीबी सुजाता ने कहा, "अंतिम संस्कार हो गया है, लेकिन परिवार के सभी लोग सदमे में हैं."

वहीं चेतना ने कहा, "अब हमें नया मृत्यु प्रमाण पत्र हासिल करना होगा, आप स्थिति की कल्पना कर सकते हैं."

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