कांग्रेस नेता को 'भकचोन्हर' कहने वाले लालू यादव को अब कांग्रेस का साथ क्यों चाहिए?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में अगले महीने होने वाले विधान परिषद 24 सीटों के चुनाव के लिए आरजेडी और कांग्रेस पिछले महीने उपचुनाव में दिखी कड़वाहट भुलाकर फिर साथ आ सकते हैं.
बिहार विधानपरिषद में कुल 75 सीटें है. निकाय कोटे की 24 सीटों के लिए चुनाव पंचायत चुनाव के बाद होने हैं. पंचायत चुनाव 12 दिसंबर को ख़त्म होंगे.
सोमवार को पटना पहुंचने के बाद आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने गठबंधन के सवाल पर कहा, "इसमें ग़लत क्या है? सबके साथ गठबंधन होना चाहिए. कांग्रेस पार्टी भी है. हम सब एक साथ है."
लालू प्रसाद यादव के इस बयान में 'लोजपा' से ज्यादा महत्व 'कांग्रेस' को दिया जा रहा है जिसके साथ अक्टूबर में विधानसभा की दो सीटों के उपचुनाव में वाकयुद्ध हुआ था.

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'भकचोन्हर' से 'हम सब साथ है'
लालू प्रसाद यादव के स्वर में नरमी और उनकी अपने भाषाई अंदाज में 'भकचोन्हर' से 'हम सब एक साथ हैं' तक की यात्रा के मायने अक्टूबर में हुए उपचुनाव में महागठबंधन की सभी पार्टियों की हार में समझी जा रही है.
लालू यादव ने उपचुनाव से पहले बिहार में कांग्रेस के प्रभारी और पार्टी के वरिष्ठ नेता भक्त चरण दास को भकचोन्हर (स्थानीय शब्द,जिसका मतलब है बेवकूफ) कहा था.
तारापुर और कुशेश्वर स्थान - इन दोनों सीटों पर सत्ताधानी दल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के उम्मीदवार जीते. लेकिन इस जीत को वोटों की संख्या से देखा जाना भी ज़रूरी है.
कुशेश्वर स्थान का ही उदाहरण लें तो जेडीयू के अमन भूषण हजारी 12,698 वोटों के अंतर से जीते है. उन्हें 59,882 वोट मिले थे, जबकि आरजेडी उम्मीदवार गणेश भारती को 47 हजार से ज्यादा और एलजेपी की अंजू देवी और कांग्रेस के अतिरेक कुमार को साढ़े पांच हजार से ज्यादा वोट मिले है.
इसी तरह तारापुर में भी देखें तो जेडीयू उम्मीदवार को राजद उम्मीदवार अरुण कुमार साह से महज 3,852 वोट ही ज्यादा मिले है. यहां जेडीयू को 78,966 वोट मिले जबकि आरजेडी (75,145), कांग्रेस (3,590), एलजेपी (5,364) को मिले वोटों को जोड़ दिया जाए तो ये 84,099 वोटों में तब्दील हो जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत चंदन कहते है, "वोट की संख्या के नज़रिए से देखें तो ये तीनों दल (आरजेडी, कांग्रेस, लोजपा) अगर साथ लड़ते तो नतीजे कुछ और आ सकते है. साफ है कि इन तीनों दलों ने जो प्रयोग उपचुनाव में किया, वो असफल रहा."
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20 साल के गठबंधन का नुकसान हुआ
अभी विधानसभा में आरजेडी के 75, बीजेपी के 74, जेडीयू के 45, कांग्रेस 19, भाकपा (माले) के 12 विधायक हैं.
तारापुर की सीट जेडीयू विधायक मेवालाल चौधरी और कुशेश्वर स्थान की सीट जेडीयू विधायक शशि भूषण हजारी की मौत के बाद खाली हो गई थी. इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस की ज़मानत ज़ब्त हो गई.
कांग्रेस और आरजेडी के बीच तनातनी 2020 विधानसभा चुनाव के बाद से ही सामने आने लगी थी. महागठबंधन में 70 सीटों पर लड़ी कांग्रेस महज 19 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी.
बिहार कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी बीबीसी से कहते हैं, "बीते 20 साल के गठबंधन से बिहार कांग्रेस को सिर्फ नुकसान हुआ है. आरजेडी की शर्तों पर पार्टी नहीं चलेगी. लालू जी अभी बैकफुट पर है तो उन्हें गठबंधन की बात याद आ रही है. लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गठबंधन चलाते रहने के मूड में नहीं है. उपचुनाव में हम लोगों को नहीं समझा पाए कि हम लालू जी से अलग है लेकिन हम ये जल्द कर लेगें."
उपचुनाव से पहले जब सीपीआई नेता कन्हैया कुमार ने कांग्रेस का दामन थामा, तो भी ये तनातनी बढ़ी. कहा जाता रहा है कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, कन्हैया कुमार को लेकर सहज नहीं है. ऐसे में कन्हैया को बिहार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है जैसी अटकलों ने इस तनातनी को विस्तार दिया.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कांग्रेस को 'परजीवी' बताते हुए कहते हैं, "लालू की राजनीति कांग्रेस विरोध की बुनियाद पर खड़ी हुई. राष्ट्रीय राजनीति के लिए लालू को कांग्रेस की ज़रूरत है, लेकिन वो बिहार में किसी दूसरी पार्टी को माइलेज (बढ़त) और बारगेन (सौदेबाज़ी) करने की स्थिति में नहीं आने देना चाहते है. बाकी कन्हैया कुमार उपचुनाव में आए, लेकिन वो सब बेअसर रहा."
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आरजेडी-एलजेपी गठबंधन
लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना साल 2000 में राम विलास पासवान ने की थी. बीते साल उनकी मौत के बाद से ही लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव बार बार ये कहते रहे कि वो चिराग पासवान के साथ गठबंधन चाहते है. खुद चिराग पासवान भी बीते एक साल से कई मौकों पर ये कहते रहे है कि लालू उनके लिए अभिभावक समान हैं.
आरजेडी और लोजपा के पूर्व गठबंधनों की बात करें तो साल 2005 (फरवरी) और 2009 के विधानसभा चुनावों में दोनों पार्टियों ने एक साथ चुनाव लड़ा वहीं लोकसभा चुनावों में ये गठबंधन साल 2009 में था.
स्थानीय निकाय कोटे के चुनाव को लेकर एलजेपी प्रवक्ता राजेश भट्ट ने बीबीसी से कहा , "गठबंधन पर विचार किया जा रहा है. लेकिन हमारी बात कई दलों से चल रही है. गठबंधन कैसा हो, इसके स्वरूप पर अभी पार्टी में मंथन चल रहा है."
इस सवाल पर कि क्या इसमें पारस गुट भी शामिल है, उन्होंने इस संभावना को खारिज करते हुए कहा, "उस गुट से समन्वय की कोई उम्मीद नहीं."
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चिराग पासवान किसके साथ
राम विलास पासवान की मौत के बाद दो गुटों में बंटी एलजेपी में से चिराग गुट ने राजनीतिक रूप से अपने विकल्प खुले रखे हैं.
प्रदेश स्तर पर वो आरजेडी के साथ गठबंधन कर रहे है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन्होने एनडीए से भी खुद को अलग करने का कोई स्पष्ट ऐलान नहीं किया है.
हाल ही में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और फिलहाल केन्द्र में इस्पात मंत्री आरसीपी सिंह के मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति में चिराग पासवान को शामिल किया गया है.
हालिया दिनों में आरसीपी सिंह और चिराग पासवान के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रिश्तों की खटास किसी से छिपी हुई बात नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कहते है, "चिराग कंफ़्यूज़ हैं. उनको ये उम्मीद है कि जेडीयू बीजेपी का गठबंधन टूटेगा जो उन्हें बीजेपी के साथ ज्यादा स्पेस शेयर करने का मौका देगा."
वहीं, महागठबंधन में चल रही इस अस्पष्ट राजनीतिक स्थिति पर बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद कहते है, "आरजेडी चाहे किसी के साथ गठबंधन कर लें, सारे फ़्यूज़ बल्ब एक साथ मिलकर रोशनी नहीं कर सकते."
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