सीवर साफ़ करनेवालों की माँग, ठेकेदारी प्रथा ख़त्म हो

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की राजधानी दिल्ली में संविदा यानी कॉन्ट्रैक्ट पर सीवर सफाई का काम करने वालों पर भारतीय श्रम कानून के बुनियादी मानदंड भी लागू नहीं होते हैं.
उन्हें भविष्य निधि से लेकर ईएसआई एवं बीमा आदि की सुविधा नहीं मिलती है.
ये जानकारी दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आई है.
दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच ने गुरुवार शाम अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि "सीवर साफ़ करने का काम स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद हानिकारक है. इसे करते हुए मौत भी होती है. ऐसे में सरकार को इस तरह के कामों में ठेकेदारी की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करके सभी सीवर सफाई कर्मियों का नियोजन करना चाहिए."

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सरकार की देखरेख में हो काम
इस रिपोर्ट को जारी करते हुए मंच से जुड़ीं ईना ज़फ़र कहती हैं कि 'सीवर की सफ़ाई का काम करने वाले लोगों को होने वाली बीमारियाँ दीर्घकालिक और घातक होती हैं. इसलिए ये ज़रूरी है कि ये काम सरकार की देखरेख और नियंत्रण में ही किया जाए न कि इसे ठेकदारों पर छोड़ दिया जाए.'
मंच के राष्ट्रीय समन्वयक अशोक कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ठेकेदारों के अधीन कर्मचारियों को ना ही किसी तरह का पहचान पत्र दिया जाता है और ना ही इनका कोई रोस्टर ही बनाया जाता है. इसलिए अगर काम करते हुए किसी की तबियत ख़राब भी हो जाती है तो उसका कोई रिकार्ड मौजूद नहीं रहता.
वो कहते हैं, "अगर इस दौरान सीवर सफाईकर्मी की मौत हो जाती है तो उसके परिवार को कोई मुआवजा इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि प्रमाणित करने के लिए दस्तावेज़ ही मौजूद नहीं होते."
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जातिगत भेदभाव और कम मजदूरी
मंच की रिपोर्ट में ये दावा भी किया गया है कि जातिगत भेदभाव के साथ-साथ इन्हें निर्धारित मजदूरी से 25 से 35 प्रतिशत तक कम तनख्वाह मिलती है. साथ ही इन्हें सप्ताह में एक दिन की छुट्टी भी नहीं मिलती है. और अगर कोई बीमार पड़ जाता है तो उसके वेतन में कटौती कर दी जाती है.
हालांकि 'मैन्युअल स्कैवेंजेर' के काम को ग़ैर क़ानूनी करार दिया गया है, लेकिन मंच के सर्वे में पाया गया है कि ये प्रथा दिल्ली में बदस्तूर जारी है. उस पर सबसे गंभीर बात जो सामने आई है कि इन सफाईकर्मियों को किसी भी तरह के सुरक्षा उपकरण जैसे ऑक्सीजन मास्क, गम बूट, एयर ब्लोअर, सेफ्टी बेल्ट आदि उपलब्ध नहीं कराये जाते हैं.
मंच ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है और उसमें गुजरात उच्च न्यायलय के वर्ष 2006 के उस अंतरिम आदेश का हवाला भी दिया है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि "इस तरह के जोख़िम वाले कामों को ठेकेदारों के ज़रिये नहीं कराया जाना चाहिए".
इसी अंतरिम आदेश में उपकरण उपलब्ध कराने के अलावा ये भी कहा गया है कि "व्यावसायिक रोगों के मामले में नियुक्ति देने वाला ही मुआवज़े के लिए प्रत्यक्ष रूप से ज़िम्मेदार होगा."
दिल्ली की बढ़ती आबादी और घटते सफाईकर्मी
दिल्ली सरकार के सूत्रों का कहना है कि हाल ही में सरकार ने सीवर सफाई के लिए टेंडर में उन कर्मचारियों के परिवारों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया है जिनकी काम के दौरान मौत हुई है.
सूत्रों का ये भी कहना है कि पिछले माह की 6 अक्टूबर से ही सीवर की सफाई में लगे कर्मचारियों को 'रिवाइज्ड' वेतन दिया जाने लगा है.
लेकिन मंच से जुड़े वेद प्रकाश बिड़ला का आरोप है कि जिस टेंडर की बात सरकार कर रही है उसमें मृतक सीवरकर्मियों के परिवार के लोगों को शामिल करने की जिस प्रक्रिया का दावा किया जा रहा है, वही दोषपूर्ण है.
सत राम जल मॉल कामगार संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष हैं.
उनका कहना है कि 'जहां दिल्ली की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है वहीं सीवर की सफाई करने वाले स्थायी कर्मचारियों की संख्या 8000 से घटकर 2300 के आस पास ही रह गयी है जबकि सारा काम ठेकेदारी प्रथा के ज़रिये कराया जा रहा है. इसलिए इन कर्मचारियों की सही संख्या का आकलन संभव नहीं है.'
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