कोरोना वायरस: भारत में सीवर के पानी में मिले कोरोना वायरस के अंश

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- Author, बाला सतीश
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तेलुगू
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के सीवर के पानी में कोरोना वायरस के अंश मिले हैं. यह दावा हैदराबाद में मौजूद सेंटर फ़ॉर मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) की हालिया रिपोर्ट में किया गया है.
हालांकि सीसीएमबी का ये भी कहना है कि वायरस के जो अंश पाए गए हैं वो संक्रामक नहीं हैं.
भारत के अग्रणी बायोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट में से एक सीसीएमबी का कहना है कि इस मामले में किसी ख़ास इलाक़े के सीवर के पानी के पूरी जांच करने पर संक्रमण के फैलने को लेकर सटीक जानकारी हासिल हो सकती है.
बीबीसी ने सीसीएमबी के निदेशक राकेश मिश्रा से कोरोना वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन यानी प्रकार, कोरोना की वैक्सीन और कोरोना वायरस की संक्रमण क्षमता समेत कई मुद्दों पर बात की.
सर्वे क्यों किया गया?
सीसीएमबी ने हाल में एक रिपोर्ट जारी की है जिसके अनुसार वायरस के अंश हैदराबार के सीवर के पानी में मिले हैं. लेकिन सीसीएमबी ने ये सर्वे क्यों किया?
राकेश मिश्रा कहते हैं, "सेरोलॉजिकल टेस्ट, रैपिड एंटीजेन टेस्ट या फिर किसी और कोरोना टेस्ट से ही व्यक्ति के संक्रमित होने की जानकारी मिल सकती है. लेकिन इसके लिए आपको प्रत्येक व्यक्ति का सैंपल लेना होता है."

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"लेकिन सीवर के पानी से भी आप वायरस का पता कर सकते हैं, हम इसी की संभावना तलाश कर रहे थे. हम सीवर के पानी में वायरस के अंश देखने में कामयाब हुए और साथ ही ये भी पता लगा सके कि पानी में वायरस की मात्रा कितनी है."
"इस तरीके का फ़ायदा ये है कि आपको लोगों के पास जाने की बजाय सीवर पा पानी कई बार इकट्ठा कर उसका टेस्ट करना है. इसमें मौजूद वायरस का लोड आपको इस बात का इशारा देगा कि इलाक़े में संक्रमण कितना अधिक है और शहर के इस इलाक़े में वायरस लोड कितना है."
कितना भरोसेमंद है तरीक़ा
सीसीएमबी ने अपनी रिसर्च में पाया है कि जिस इलाक़े में सीवर के पानी का टेस्ट किया गया वहां क़रीब छह लाख लोग संक्रमित हो सकते हैं. ये आंकड़ा तेलंगाना सरकार के जारी किए आंकड़ों से मेल नहीं खाते, ऐसे में ये कितना सटीक है?
राकेश मिश्रा कहते हैं, "नहीं सरकार के जारी किए गए आंकड़े अलग नहीं हैं. आप देखिए, सरकार ने 24,000 टेस्ट किए जिनमें से 1,700 लोगों के नतीजे पॉज़िटिव आए हैं. जो टेस्ट किए गए हैं वो रैपिड एंटीजेन टेस्ट हैं जो कम सेन्सिटिव माने जाते हैं. इसका मतलब ये है कि आरटी-पीसीआर टेस्ट का तरीका अपनाया जाता तो टेस्ट का नतीजा शायद 2,000 से 2,400 तक होता."

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"हमारे टेस्टिंग के तरीके से पॉज़िटिव की संख्या कम ही है. हमारी स्टडी के अनुसार दो लाख तक लोग कोरोना संक्रमित हैं यानी ये कुल आबादी का पांच फीसदी है. अगर आप दिल्ली, मुंबई और पुणे में किए गए सेरोलॉजिकल टेस्ट को देखें तो इसमें बीस फीसदी से अधिक संक्रमित पाए गए थे. पुणे में कुछ इलाक़ों में तो पचास फीसदी से अधिक संक्रमित बताए गए थे."
"मैं आपको ये कह सकता हूं कि वो सर्वे छोटे समूहों में किए गए थे लेकिन उन आंकड़ों पर बढ़ाचढ़ा कर चर्चा हुई. हम सीवर के पानी में जो वाकई में मिल रहा है उसकी बात कर रहे हैं. ये उस आधार पर है जो वाकई में पानी में है."
"ये टेस्टिंग का सस्ता और भरोसेमंद तरीका है और आपको शहर के दस हज़ार लोगों के सैम्पल टेस्ट करने की ज़रूरत नहीं. आपको केवल दस सीवर प्लांट में जाकर सैम्पल टेस्ट करना होता है और आप पूरे शहर को लेकर जानकारी दे सकते हैं. ये सटीक और असरदार तरीका है और शहर में संक्रमण का पता लगाने के लिए यूरोप, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में इस तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है. "
और कहीं भी होगा ऐसा टेस्ट?
लेकिन क्या हैदराबाद के सीसीएमबी किसी दूसरे शहर में इसी तरह के टेस्ट की योजना बना रहा है?
राकेश मिश्रा कहते हैं कि वो भारत के दूसरे शहरो में भी इसी तरह सीवर के पानी की टेस्टिंग से शहर में कोरोना का असर समझा जा सकता है.
वो कहते हैं, "चंडीगढ़ जैसे शहरों में हमारे साथ ऐसी संस्थाए जुड़ी हैं भी जिनके पास इस तरह का टेस्ट करने की क्षमता है और इसके लिए हम उनके साथ जानकारी साझा कर रहे हैं. "
"नागपुर के एनईईआरआई के पास भी सीवर के पानी पर रीसर्च करने की क्षमता है लेकिन अभी वो इस तरह की रिसर्च नहीं कर सकते. हम चाहते हैं कि देश के बड़े शहरों में इस तरह का सर्वे किया जाए. इस मामले में तकनीक के बारे में जानकारी साझा करने के लिए हम तैयार हैं. केवल कोरोना वायरस की ही बात नहीं है, किसी और बीमारी के बारे में भी सीवर के पानी से जाना जा सकता है."
इस तरह से सस्ते उपायों से ये पता चल सकता है किस तरह के विषाणु शहर में हैं और हम आने वाले वक्त के लिए तैयारी कर सकते हैं.
लेकिन क्या सीवर के पानी में कोरोना वायरस के होने से लोगों के लिए संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है?
राकेश मिश्रा कहते हैं कि हमें पानी में वायरस के अंश ज़रूर मिले हैं लेकिन वो आरएनए के टूटे हुए टुकड़े हैं. ये कतई संक्रामक नहीं है और इस कारण चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है. ये वायरस एक व्यक्ति से दूसरे को फैलता है, आपको बारिश के पानी या फिर सीवर के पानी से डरने की ज़रूरत नहीं है.
सीवर में मिला वायरस ज़्यादा घातक है?
अब तक कोरोना वायरस के बारे में जो जानकारी सामने आई है इसके अनुसार इस वायरस के कई स्ट्रेन यानी प्रकार मौजूद हैं. इनमें कोई ख़ास स्ट्रेन अधिक घातक बताया जाता है तो कोई कम घातक बताया जाता है. लेकिन क्या सीवर के पानी में वायरस के जिस स्ट्रेन के अंश मिले हैं वो घातक है?
राकेश मिश्रा ये मानते हैं कि वायरस बार-बार म्यूटेट हो रहा है, हालांकि वो कहते हैं कि उन्होंने इस वायरस पर कई परीक्षण किए हैं और इसकी सीक्वेन्सिंग भी देखी है, इस वायरस से जितनी उम्मीद थी ये उतना ही म्यूटेट कर रहा है. सच कहूं तो ये कम म्यूटेट कर रहा है लेकिन हर म्यूटेशन घातक नहीं.
कई म्यूटेशन को खुद वायरस के लिए ही घातक होते हैं और इस तरह ये हमारे लिए अच्छी ख़बर है. आमतौर पर ऐसा होता है कि वायरस म्यूटेट करता रहता है और धीरे-धीरे इंसान के लिए कम घातक होता जाता है.
हालांकि फिलहाल कोरोना वायरस में ये नहीं कहा जा सकता. हमें दक्षिण पूर्व एशिया और ख़ासकर दक्षिण भारत में कोरोना वायरस का A3i स्ट्रेन मिला है जो शायद कमज़ोर वायरस है. वहीं दुनिया भर में कोरोना का एक और प्रकार A2A देखा जा रहा है. हम कह सकते हैं कि वायरस अधिक ख़तरनाक नहीं बन रहा बल्कि फ़िलहाल स्थिर है.
वो कहते हैं कि वायरस हवा से कैसे फैलता है और ख़ासकर अस्पताल जैसी जगहों पर कितना संक्रामक हो सकता है इसे लेकर भी रिसर्च जारी है. इससे वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है.
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