झारखंड के सिंहभूम में समुद्र से पहली बार बाहर निकली थी धरती- नए शोध का दावा

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए

क्या सिंहभूम दुनिया का पहला क्रेटोन (महाद्वीप) था? क्या झारखंड का सिंहभूम और इससे सटे ओडिशा के कुछ इलाके सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले?

पृथ्वी के जन्म के बाद क्या सिंहभूम ही वह पहली जगह थी, जहां समुद्र में डूबी धरती का पहला टुकड़ा क्रेटोन के रूप में पानी से बाहर आया?

एक नए शोध के मुताबिक़, इन सभी सवालों के जवाब 'हां' में है.

अमेरिका के विज्ञान के चर्चित जर्नल 'प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी आफ साईंस (पीएनएएस)' में पिछले सप्ताह प्रकाशित एक शोध के मुताबिक़, आज से 310 करोड़ साल पहले सिंहभूम क्रेटोन का जन्म हुआ, यानी यह क्षेत्र पहली बार पानी से बाहर आया.

उस समय ज़मीन का अस्तित्व समुद्र के अंदर हुआ करता था. लेकिन, धरती के 50 किलोमीटर भीतर हुए एक बड़े ज्वालामुखी विस्फोट के कारण पृथ्वी का यह हिस्सा (सिंहभूम क्रेटोन) समुद्र से बाहर आ गया.

शोध में कौन-कौन शामिल?

यह शोध आलेख ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अमेरिका के आठ शोधकर्ताओं ने लंबे रिसर्च के बाद लिखा है. इनमें से चार विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के हैं. इसके प्रमुख लेखक ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित मोनाश विश्वविद्यालय के रिसर्च फ़ेलो डॉ. प्रियदर्शी चौधुरी हैं. वे वहां के स्कूल ऑफ अर्थ एटमॉस्फ़ेयर एंड इनवायरमेंट से जुड़े हैं.

33 साल के डॉ. चौधुरी भारतीय मूल के हैं. उनके परिजन पश्चिम बंगाल के आसनसोल शहर में रहते हैं. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई आसनसोल और कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय से की. साल 2013 से 2018 तक वे जर्मनी में रहे. वहां से उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की. पिछले तीन साल से वे ऑस्ट्रेलिया में हैं और पृथ्वी पर महाद्वीपों की उत्पति पर शोध कर रहे हैं.

डॉ. प्रियदर्शी चौधुरी ने बीबीसी से कहा, ''सिंहभूम क्षेत्र में ढाई साल तक चले ग्राउंड रिसर्च और बाद में किए गए तकनीकी शोधों के बाद हम ये दावे के साथ कह सकते हैं कि सिंहभूम ही दुनिया का पहला क्रेटोन था. सिंहभूम से हमारा मतलब सिर्फ़ झारखंड का सिंहभूम न होकर एक विस्तृत इलाक़ा है. इसमें ओडिशा के धालजोरी, क्योंझर, महागिरि और सिमलीपाल जैसी जगहें भी शामिल हैं.''

वे आगे कहते हैं, ''हमने यहां मिले ख़ास तरह के अवसादी चट्टानों से उनकी उम्र का पता लगाकर जान पाए कि ये 310 से 320 करोड़ साल पुराने हैं. हमें यहां मिले सैंड स्टोन (बलुआ पत्थर) से हमारे शोध में मदद मिली. उसके बाद हमने यह लेख लिखा. उसे मार्च में दाख़िल किया. फिर रिव्यू की लंबी प्रक्रिया के बाद पिछले हफ़्ते हमारा लेख प्रकाशित हुआ और इस तरह हमारे शोध को मान्यता मिली.''

इस शोध में डॉ. प्रियदर्शी चौधुरी के साथ सूर्यजेंदु भट्टाचार्यी, शुभोजीत राय, शुभम मुखर्जी(सभी भारतीय मूल के), जैकब मल्डर, पीटर केवुड, ऐशली वेनराइट (सभी ऑस्ट्रेलिया) और ओलिवर नेबेल (जर्मनी) शामिल थे.

ऐसे पता चली पत्थरों की उम्र

डॉ. प्रियदर्शी ने बताया, ''अवसादी चट्टान और बलुआ पत्थर की उम्र पता करना बड़ा कठिन काम है. हम सिंहभूम इलाक़े में मिले ऐसे बलुआ पत्थरों को अपने विश्वविद्यालय लेकर आए और उसे बारीकी से पीसा. छलनी से बाल के बराबर के महीन टुकड़ों को अलग कर माइक्रोस्कोप से उसकी जांच की.''

वे कहते हैं, ''उसके बाद तकनीकी मानदंडों पर रासायनिक तरीक़ों से उसे परखा और फिर उसकी उम्र पता की. हमें इन अवसादी चट्टानों में मिले जिरकॉन नामक खनिज से उसकी उम्र का सही अंदाज़ा लगाने में मदद मिली.''

उन्होंने बताया, ''अपने रिसर्च से हम ये पता लगा सके कि सिंहभूम क्रेटोन क़रीब 310 करोड़ साल पहले बना. उस समय ज्वालामुखी विस्फोटों के चलते धरती का यह हिस्सा हल्का हो गया और हिमशैल की तरह तैरते हुए समुद्र के बाहर आ गया. इसके बाद के सालों में दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी कई क्रेटोन बने. सिंहभूम क्रेटोन दरअसल दक्षिण अफ्रीका और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में मिले क्रेटोन की तरह के हैं. इनमें काफी समानता है.''

क्या है क्रेटोन?

अवसादी चट्टान और बलुआ पत्थर अक्सर छिछली नदियों के मुहानों और समुद्री बीच पर बना करते हैं.

सिंहभूम में मिली चट्टानों पर समुद्री लहरों के निशान देखे जा सकते हैं. ये सालों तक समुद्र से टकराने के कारण बने होंगे, जो जाते-जाते इन पर अपना निशान छोड़ गए. सिंहभूम के चाईबासा और सारंडा के जंगलों में ऐसी चट्टानें मिलती रही हैं, लेकिन इन पर ऐसा शोध पहली बार हुआ है.

वहीं क्रेटोन दरअसल ग्रीक शब्द है. इसका अर्थ है महाद्वीप. भूवैज्ञानिकों के मुताबिक़, दुनिया में 30 क्रेटोन हैं और उनमें से 10 बड़े आकार के हैं. इन 10 बड़े क्रेटोन में से 4 भारत में हैं.

डॉ. प्रियदर्शी ने बताया कि भारत में सिंहभूम के अलावा बस्तर, बुंदेलखंड और धारवाड़ के क्रेटोन हैं. मतलब ये पृथ्वी के सबसे पुराने महाद्वीप हैं. जाहिर है कि पृथ्वी पर सभ्यता का विकास इन जगहों पर सबसे पहले हुआ. ऐसे क्रेटोन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में भी हैं.

पृथ्वी की उम्र क़रीब 450 करोड़ साल है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़, अपने जन्म के वक़्त पृथ्वी काफी गर्म थी. लाखों साल बाद यह ठंडी हुई और यहां पानी बना. धूमकेतुओं के कारण समुद्र बने. फिर 310 करोड़ साल पहले भौगोलिक परिवर्तनों के कारण महाद्वीपों का बनना शुरू हुआ.

सिंहभूम धरती का ऐसा पहला महाद्वीप बना. इन महाद्वीपों के अस्तित्व में आने से वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा भी बढ़ी और समुद्र के पानी में फॉस्फोरस और दूसरे खनिज लवणों का समावेश हुआ.

शोध का फायदा?

डॉ. प्रियदर्शी कहते हैं कि अब जब पूरी दुनिया क्लाइमेट चेंज पर बहस कर रही है, तो यह जानना बहुत ज़रूरी है कि हमारा वातावरण, समुद्र, महाद्वीप और जलवायु कैसे अस्तित्व में आए. हमें यह जानना ही चाहिए कि किन भौगोलिक प्रक्रियाओं के चलते पृथ्वी मनुष्यों या जंतुओं के निवास लायक बन सकी.

उन्होंने कहा कि यह शोध हमारी बड़ी परियोजना का एक हिस्सा भर है. अभी विस्तृत शोध किया जाना है. संभव है कि इससे पृथ्वी के कई रहस्यों का पता चले.

क्या कहते हैं दूसरे जानकार?

रांची विश्वविद्यालय में भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने बीबीसी से कहा कि इस नए शोध से दुनिया के भूगर्भ विज्ञान के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को काफ़ी फ़ायदा होगा.

उन्होंने कहा, "यह साफ़ है कि झारखंड का इलाक़ा सबसे पुरानी भूगर्भीय घटनाओं का गवाह रहा है. डॉ. प्रियदर्शी चौधरी और उनके सहयोगियों ने सिंहभूम क्रेटोन को लेकर जो दावे किए है, वे दरअसल पुराने शोधों का ही विस्तार हैं. इनके शोध ने इसका समय ज़्यादा प्रामाणिक तरीक़े से बतायी है.''

वे कहते हैं, ''इन्होंने महाद्वीपों की उत्पत्ति के अब तक के दावों से अलग और ज़्यादा प्रामाणिक तरीक़े से कहा है कि सिंहभूम क्रेटोन की उत्पत्ति 310 करोड़ साल पहले हुई. इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी पर क्रेटोन का बनना हमारी अब तक की जानकारी से कई सौ साल पहले शुरू हो चुका था."

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने यह भी कहा, "इससे पहले साल 2006 में पोलैंड, भारत और जापान के कुछ भूगर्भ विज्ञानियों ने अपने शोध के बाद दावा किया कि धरती का पहला भूकंप और सूनामी 160 करोड़ साल पहले झारखंड इलाक़े में आए. मतलब कि यहाँ समुद्र थे. उस शोध आलेख के प्रमुख लेखक रजत मजूमदार थे. उनका शोध 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी' नामक रिसर्च जर्नल में छपा था. उसे 'चाईबासा फ़ार्मेशन' कहा गया."

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