पीएम मोदी का पोप फ्रांसिस को न्योता- सिर्फ़ शिष्टाचार या राजनीतिक मायने?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बैंगलोर से, बीबीसी हिंदी के लिए
रोम में पोप फ्रांसिस के साथ पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात और उन्हें भारत आने का निमंत्रण वैसे तो महज औपचारिकता के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन ईसाई समुदाय के बीच इसे एक राजनीतिक लीपापोती भी माना जा रहा है.
हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण के आरोप में कई राज्यों में चर्च के प्रतिनिधियों पर हिंदुवादी संगठनों के हमले की ख़बरों के बाद ईसाई समुदाय में इसे लेकर संदेह की स्थिति है.
जी20 शिखर सम्मेलन के लिए रोम के दो दिनों के दौरे पर गए प्रधानमंत्री मोदी ने जी20 देशों के प्रमुखों से मुलाक़ात की थी. प्रोटोकॉल के अनुसार उन्होंने वैटिकन के प्रमुख पोप फ्रांसिस से भी मुलाक़ात की.
पीएम मोदी रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप फ्रांसिस से मिलने वाले भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री बन गए हैं.
उनसे पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, आईके गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी पोप फ्रांसिस से मिल चुके हैं.
इरुदया जोती पश्चिम बंगाल के पादरी हैं और फिलहाल त्रिपुरा में काम करते हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "पोप से मिलना और उन्हें न्योता देना एक एजेंडे का हिस्सा है. ये राजनीति और धर्म का जहरीला मिश्रण है. इसे राजनीतिक लीपापोती भी कहा जा सकता है."
गुवाहाटी में नॉर्थईस्ट कैथोलिक के प्रवक्ता ऐलन ब्रूक्स कहते हैं, "इसे केवल एक देश के प्रमुख के दूसरे प्रमुख को दिए गए न्योते के तौर पर नहीं देखा जा सकता. इसके परिणाम आगे देखने को मिलेंगे. क्या ईसाइयों पर हो रहे हमले रुकेंगे? मुझे नहीं लगता. मैं इसे सिर्फ़ एक जनसंपर्क के तरीक़े के तौर पर देखता हूं."
ऐलन ब्रूक्स असम अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं.
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जोती मानते हैं कि इससे चर्च, उसके संस्थानों और कर्मचारियों पर हमले में कोई कमी नहीं आने वाली है.
ऐलन ब्रूक्स कहते हैं, "तुम मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करके कहते हो कि हिंदू ख़तरे में है. आज आप कर्नाटक के ईसाई संस्थानों पर सर्वे करना चाहते हो. दूसरे राज्यों में समुदाय को दबाया जा रहा है."
हालांकि, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने बीबीसी हिंदी से कहा, "वैटिकन एक देश है और समावेश के लिए भारत का पूरी दुनिया में सम्मान किया जाता है. वो बैठक दो देशों के प्रमुखों के बीच थी. हमारे देश के मूल मूल्य केवल सहिष्णुता ही नहीं बल्कि समानता की स्वीकृति है."

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चर्च के नेता हुए सर्तक
चर्च के प्रमुख खासतौर पर शीर्ष और अहम पद रखने वाले लोग पीएम मोदी के पोप फ्रांसिस से गले मिलने और तोहफे देने को लेकर सर्तक हो गए हैं.
कुछ चर्चों के प्रवक्ता और प्रमुख पोप को दिए गए न्योते को "बहुत अच्छा" और "सकारात्मक" मान रहे हैं क्योंकि 2017 में वो इस बात से "थोड़े दुखी" थे कि म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका में आने पर भी पोप फ्रांसिस को भारत नहीं बुलाया गया था.
केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) के पादरी जैकब पलकापिल्ली बताते हैं कि काउंसिल इस बात से खुश है क्योंकि "हमारे पादरियों ने प्रधानमंत्री मोदी से इस साल जनवरी में अनुरोध किया था कि वो पोप फ्रांसिस को भारत आने का न्योता दें."
हालांकि, चर्च और उनके पादरियों पर हमले को लेकर भी चर्च के प्रमुख चिंता व्यक्त करते हैं.
केरल में जेकोबाइट चर्च के प्रवक्ता पादरी डॉक्टर कुरियाकोज़ थियोफिलज कहते हैं, "कभी-कभी, हम बुरी घटनाओं को सुनते हैं जो सभी समुदायों के बीच मौजूद धर्मनिरपेक्षता, सद्भाव और आपसी सम्मान के लिए खतरा पैदा करती हैं."
वह कहते हैं, "हम हमेशा दिखावा नहीं कर सकते. यह एक मौका होगा जब भारत के सभी लोगों के समान अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर ज़ोर दिया जाएगा."
हालांकि, डॉक्टर कुरियाकोज़ केंद्र सरकार पर इस बात का आरोप नहीं लगाते कि हमला करने वालों को रोकने के लिए सरकार ने कोई निर्देश नहीं दिया है.
वह कहते हैं, "ये दौरा उन लोगों के लिए एक संदेश है कि वो विचार करें कि क्या हो रहा है. हमें उम्मीद है कि अगर कुछ बिगड़ गया तो ये दौरा उसे ठीक करने का एक मौका होगा."

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राजनीतिक मायने
जैकोबाइट चर्च के विचार बहुत मायने रखते हैं क्योंकि पीएम मोदी ने केरल विधानसभा चुनाव से पहले जैकोबाइट और रुढ़िवादी धड़े के नेताओं से मुलाक़ात की थी ताकि उनके आपसी मतभेदों को सुलझाया जा सके.
जैकोबाइट धड़े को सुप्रीम कोर्ट ने अपने चर्चों और कब्रगाहों को रूढ़िवादी धड़े को सौंपने का निर्देश दिया था.
चर्च के इन दो धड़ों के बीच आरएसएस का दखल ईसाई वोटों में बीजेपी की सेंध की कोशिशों का पहला ठोस संकेत था. इन वोटों पर अभी तक कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) का एकाधिकार रहा है.
केरल में ईसाई वोट बहुत मायने रखता है जो 18.6 प्रतिशत है. ईसाई और मुस्लिम वोटों से यूडीएफ़ सत्ता में जगह बना पाई थी लेकिन पिछले चुनाव में ये वोट सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) के खाते में चला गया.
इसे न्योते के मायने को इस बात से भी समझा जा सकता है कि पीएम मोदी और पोप फ्रांसिस की मुलाक़ात के बाद केरल बीजेपी के नेताओं ने उत्साहित होकर बयान दिये हैं.
केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने कहा था कि पीएम और पोप के बीच हुई बैठक दिखाती है कि बीजेपी सरकार ईसाई समुदाय की कितनी चिंता करती है.
हालांकि, कर्नाटक में बीजेपी सरकार के धर्मांतरण-रोधी क़ानून लाने के रुख की ईसाई समुदाय ने कड़ी आलोचना की है.

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चर्चों, पादरियों और अन्य लोगों पर हमला करने वाले कुछ असामाजिक तत्वों के पुलिस थाने के सामने प्रदर्शन करने और ``जबरन धर्मांतरण'' का आरोप लगाने को देखते हुए यह घोषणा की गई है.
पोप फ्रांसिस को न्योता देने को गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखे जाने को लेकर बेंगलुरू क्षेत्र के प्रमुख पादरी रेव पीटर मचादो कहते हैं, "इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा. मुझे यकीन है कि प्रधानमंत्री वैटिकन के दौरे को वोटों पर प्रभाव के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. इसके बजाय वो लोगों के भले के लिए किए गए कामों के आधार पर अल्पसंख्यकों से वोट मांगेंगे."
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर पीएम मुख्यमंत्रियों को धर्मांतरण-रोधी क़ानूनों पर जोर ना देने के लिए नहीं कहते हैं तो यह ठीक नहीं होगा.
केसीबीसी के प्रवक्ता फादर जैकब कहते हैं, "हमें संविधान के अनुसार अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है. हम किसी को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं. लोगों की सुरक्षा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है."

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क्या कहती है बीजेपी
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि धर्मांतरण को लेकर चर्च के प्रमुखों से अलग राय रखते हैं.
वह कहते हैं, "भारत का इसलिए सम्मान होता है क्योंकि ये सभी धर्मों को समान रूप से देखता है. अगर हम किसी के प्रति सहिष्णु हैं तो समय के साथ आप असहिष्णु हो सकते हैं. इसलिए देश में समानता का पालन किया जाता है."
उनके सहकर्मी और कर्नाटक में पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉक्टर वामन आचार्य ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमें किसी भी धर्म को माने जाने से कोई दिक्कत नहीं है. अगर कोई 10 हिंदू भगवानों के साथ ईसा मसीह की तस्वीर रखता है तो कोई समस्या नहीं है. हम ईसाई या इस्लाम धर्म मानने वालों से कोई परेशानी नहीं है. हम दुनिया के सभी धर्मों का सम्मान करते हैं."
सीटी रवि का कहना है, "समस्या तब आती है जब कोई कहता है कि सिर्फ़ ईसाई या इस्लाम धर्म को मानना चाहिए क्योंकि वो ही सबसे बेहतर धर्म है."
वह कहते हैं, "धर्मांतरण के ख़िलाफ़ क़ानून अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए है और सभी को इसका स्वागत करना चाहिए. बहुसंख्यक समुदाय धर्मांतरण नहीं कर रहा है और इसलिए अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न नहीं हो रहा है. इसका मतलब है कि वो सुरक्षित हैं. लेकिन, धर्मांतरण के लिए धोखाधड़ी का तरीक़ा नहीं अपनाना चाहिए."
डॉक्टर वामन आचार्य साफ़तौर पर कहते हैं, "पोप फ्रांसिस को बुलाने में पीएम मोदी के लिए कोई चुनावी हित नहीं है. हमें नहीं लगता कि इस तरह की बैठक से हमें कोई राजनीतिक फायदा उठाने की ज़रूरत है."

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इसके बावजूद चर्च और ईसाई संगठनों के बीच इस तरह की चर्चा है कि देश में चर्च और पादरियों पर हुए हमलों की ख़बर विदेशों तक पहुंचने के कारण पोप फ्रांसिस को न्योता दिया गया है.
फादर मैथ्यू कहते हैं, "तथ्यों की जांच करने वाली एक कमिटी ने चर्च और उसकी संस्थाओं पर हुए हर हमले की जांच की थी. बैठक का असर जमीनी स्तर पर होने वाली घटनाओं से देखा जाना चाहिए. शीर्ष नेतृत्व ने अभी तक ईसाइयों और उनकी संस्थाओं पर हमले रोकने के लिए निर्देश नहीं दिए हैं."
वह कहते हैं, "अगर पोप और मोदी की मुलाक़ात देश को उसके धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर ले जाती है और हिंदू राष्ट्र के रास्ते से दूर करती है तो ये वैटिकन में हुई मुलाक़ात की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी."
वहीं, मैटर्स इंडिया के संपादक जोस कवि कहते हैं, "अगर उन्होंने (पीएम मोदी) पोप फ्रांसिस से मुलाक़ात नहीं की होती तो ये उनकी छवि के उलट जाता क्योंकि जी20 देशों के प्रमुखों ने भी पोप से मुलाक़ात की थी. अब यह देखना है कि क्या प्रधानमंत्री केवल रस्म अदायगी करके आ गए हैं या वो पोप को औपचारिक न्योता भी देंगे."
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