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कन्हैया क्या बिहार कांग्रेस की नैया पार लगा पाएँगे?
- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
कन्हैया कुमार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के ज़मीनी कैडर के बावजूद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से क़रीब साढ़े चार लाख वोटों के भारी अंतर से हार गए थे.
क़रीब दो साल बाद उन्होंने सीपीआई का दामन छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया है और अब उन्हें लेकर दावा किया जा रहा है कि वो बिहार प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की नाव पार लगाएंगे.
कई लोग उन्हें राष्ट्रीय जनता दल के नेता और लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव के लिए चुनौती के तौर पर भी पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.
ताज़ा घटनाक्रम से इस नाते बिहार में महागठबंधन के सबसे बड़े दल राष्ट्रीय जनता दल में चिंता होनी चाहिए लेकिन पार्टी इसे कोई मुद्दा नहीं मानती. हालांकि, पार्टी इस पर सीधे तौर पर कुछ कहने से बचती दिखाई देती है.
चुनौती और दिक़्क़तों को लेकर सवाल पूछे जाने पर राजद के वरिष्ठ विधायक भाई वीरेंद्र उलटे सवाल दाग़ते हुए कहते हैं, "कन्हैया कौन हैं?"
वहीं, राजद के दो प्रदेश प्रवक्ताओं में से एक मृत्युंजय तिवारी जहां कन्हैया कुमार के दल-बदल को कोई मुद्दा ही नहीं मानते, तो चित्तरंजन गगन कहते हैं कि कन्हैया कुमार पहली पार्टी यानी सीपीआई में रहते हुए भी महागठबंधन का हिस्सा थे और कांग्रेस के साथ जाकर भी वो महागठबंधन के साथ ही हैं.
उनके अनुसार महागठबंधन के सभी दल तेजस्वी यादव को नेता मान चुके हैं. गगन कहते हैं कि किसको कहाँ की राजनीति सूट करती है यह व्यक्तिगत मामला है.
मगर यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि 2019 के चुनाव में आरजेडी और सीपीआई का गठबंधन नहीं हो पाया था और राजद ने उनके ख़िलाफ़ अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया था. तेजस्वी यादव ने यहाँ तक कह दिया था कि कन्हैया से उनकी तुलना नहीं की जा सकती.
पार्टी आज भी उसी लाइन पर खड़ी दिख रही है.
कांग्रेस को मिला मुखर नेता
कन्हैया कुमार को लेकर हुआ फ़ैसला कांग्रेस के लिए किस तरह के बदलाव लाएगा और महागठबंधन में किस तरह के विरोधाभास पैदा होंगे ये तो आगे कि बात है लेकिन इतना तय है कि बिहार कांग्रेस को कन्हैया कुमार के रूप में एक मुखर आवाज़ मिल गई है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते रहे हैं.
कांग्रेस पार्टी के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि कन्हैया कुमार को गुजरात में हार्दिक पटेल की तर्ज़ पर बिहार कांग्रेस ईकाई के नए कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय सचिव की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है.
हालांकि, बिहार कांग्रेस के नेता कन्हैया कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के सवाल को केन्द्रीय नेतृत्व का हवाला देकर टाल जाते हैं.
प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष और पूर्व विधायक अमिता भूषण कहती हैं कि जो भी होगा वह केन्द्रीय नेतृत्व तय करेगा जो हमें मान्य होगा.
कन्हैया कुमार के पार्टी में शामिल होने पर वो कहती हैं कि युवा उनसे प्रभावित हैं.
अमिता भूषण का कहना था, "कन्हैया कुमार हमारे नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में दल में शामिल हुए हैं और बतौर कांग्रेसी नेता कन्हैया कुमार महागठबंधन को भी स्वीकार्य होंगे."
पार्टी के पूर्व विधायक ऋषि मिश्रा कन्हैया कुमार को मज़बूत नेता मानते हैं और कहते हैं कि पार्टी को इसका लाभ मिलना तय है.
उधर सीपीआई कन्हैया कुमार के दल-बदल को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को साधने के लिए वैचारिक ढुलमुलापन और अवसरवाद को साधने वाला क़दम बता रही है.
सीपीआई में नाराज़गी
पार्टी महागठबंधन में व्यक्तित्वों के टकराव की सम्भावना की बात भी कह रही है.
सीपीआई के प्रदेश सचिव राम नरेश पांडेय कहते हैं, "उनके कांग्रेस में चले जाने से पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं डालेगा. उन्होंने पहले पूंजीवाद के ख़िलाफ़ नारा लगाया और अब उसी पूंजीवादी दल कांग्रेस के साथ चले गए हैं. पार्टी ने उनको सर पर बिठाया, केन्द्रीय कमेटी का सदस्य तक बनाया, लेकिन शपथ लेने के बावजूद उन्होंने क्या किया, सब देख रहे हैं."
जानकारों के अनुसार पिछले साल दिसंबर में हैदराबाद में आयोजित पार्टी की नेशनल काउंसिल की बैठक में कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव लाया गया था जिसे मुद्दा बना कर कन्हैया कुमार ने अपने समर्थकों में भ्रान्ति फैलाई और फिर उसे कांग्रेस में जाने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया.
पार्टी के राज्य सचिव मंडल के सदस्य राम बाबू कुमार साफ़ तौर पर कहते हैं कि मनमौजी व्यवहार करने वाले राजनेता की गुंजाइश किसी भी वामदल में नहीं हो सकती है.
हालांकि, वो मानते हैं कि कन्हैया के पार्टी छोड़ने से सीपीआई को "लॉस ऑफ़ फ़ेस'' ज़रुर हुआ है यानी एक जाना-माना चेहरा पार्टी से अलग हो गया.
राम बाबू कुमार कहते हैं कि पार्टी ने उनके प्रोजेक्शन के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाया था और उनसे ऐसा किए जाने की अपेक्षा नहीं थी.
वो कहते हैं, "भाजपा और संघ परिवार को शिकस्त देने के लिए व्यापक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष एकता की ज़रुरत है. यह सिर्फ़ वामपंथ के बूते की बात नहीं है. इस लिहाज़ से बड़े प्लेटफ़ॉर्म की तलाश में वह वहां गए होंगे. हालाँकि, महागठबंधन पर उनके इस क़दम का कोई असर नहीं पड़ेगा."
उनका कहना है कि 'भाजपा के विरोध में पार्टी व्यापक विपक्षी एकता की पक्षधर है और उसमें कन्हैया होते हैं या नहीं ये हमारे लिए मायने नहीं रखता है. कांग्रेस पार्टी का होना या नहीं होना यह मायने रखता है. वैसे भी कन्हैया कुमार के पार्टी में रहने से संगठन के स्तर पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ, कुछ हद तक छवि बनाने में पार्टी को मदद ज़रूर मिली."
कांग्रेस पर कितना असर
वरिष्ठ पत्रकार इंद्रजीत सिंह का मानना है, "कन्हैया कुमार के कांग्रेस में आने के निर्णय से बिहार की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा, न ही कांग्रेस की सेहत पर."
वे कहते हैं, "राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का हाल बिना पतवार की नाव की तरह हो गया है. जिस जाति से कन्हैया आते हैं उस जाति की निष्ठा एनडीए के साथ पहले से जुड़ी हुई है. दूसरी ओर, ख़ुद कांग्रेस में ऐसे लोग बैठे हुए हैं जो संगठन के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते लेकिन डुबाने के लिए सब कुछ कर देंगे. कन्हैया के लिए ये एक बड़ी चुनौती होगी."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ तिवारी का कहना है, "दलबदल से कन्हैया कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता में कमी आई है. लोग उन्हें अब शक भरी निगाहों से देखेंगे. उनके इस राजनीतिक क़दम से उनके व्यक्तित्व पर दाग़ लगा है. दलबदल के बाद महागठबंधन में व्यक्तित्वों के टकराव की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता ".
शिक्षाविद पंकज झा का कहना है, "कन्हैया कुमार कांग्रेस में आकर राजनीतिक संदर्भ में कोई बड़ा बदलाव लायें यह तभी संभव है जबकि उनके पास लॉन्ग रन का कोई रोड मैप तैयार हो. वे छात्र राजनीति से सीधे राष्ट्रीय राजनीति में कूद पड़े हैं जहाँ उनकी पहले से कोई पैठ नहीं है. बिहार के संदर्भ में जातिगत समीकरण इनके अनुकूल नहीं है.''
पंकज झा आगे कहते हैं, ''कन्हैया व्यापक स्तर पर युवाओं पर ये असर नहीं डाल पायेंगे क्यूंकि वो पहले से ही ब्रांडेड हैं. एक युवा नेता के रूप में अपने आप कन्हैया कुमार कुछ विशेष कर पायेंगे यह अभी संभव नहीं है. वे राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ना चाह रहे हैं. कांग्रेस के अंदर अगर यह लॉन्चिंग पैड उन्हें मिल जाता है तो हो सकता है कि वो व्यक्तिगत भविष्य ज़रुर बना लें, लेकिन कांग्रेस की व्यापक चुनावी राजनीति में उनका कोई असर नहीं दिखने वाला है."
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