राहुल गांधी की दोबारा ताजपोशी की गुहार तेज़, लेकिन कहाँ फँसा है पेच?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चाहे केंद्र सरकार की नीतियों और फ़ैसलों की आलोचना की बात हो या फिर संसद में विपक्ष को एकजुट करने की या फिर केंद्र की नीतियों के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने की बात हो, हर तरफ़ कांग्रेस की ओर से एक चेहरा जो सामने दिखता है, वो है राहुल गांधी का.
लेकिन बात जब अध्यक्ष पद की आती है, तो वही चेहरा फ़िलहाल कहीं दूर नज़र आता है.
कांग्रेस के अध्यक्ष पद की रेस में भीड़ में कहीं दूर खड़े इसी चेहरे को आगे लाने की एक बार फिर कोशिश की गई है.
इस बार ये कोशिश भारतीय युवा कांग्रेस (आईवाईसी) ने की है. गोवा में हाल ही में संपन्न हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आईवाईसी ने प्रस्ताव पारित किया है कि राहुल गांधी दोबारा से कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद ग्रहण करें.
इस प्रस्ताव को पास करने के पीछे की मंशा ज़ाहिर कहते हुए युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास ने कहा, "राहुल गांधी के अध्यक्ष पद संभालने से केंद्र की जनविरोधी सरकार से लड़ने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को ताक़त मिलेगी."
लेकिन क्या राहुल गांधी फिर इस ज़िम्मेदारी को लेने के लिए तैयार हैं? यही है यक्ष प्रश्न?

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राहुल गांधी का राजनीतिक सफ़र
साल 2004 का वक़्त था. राहुल गांधी केवल 34 साल के थे, जब अमेठी से पहली बार लोकसभा चुनाव जीत कर उन्होंने राजनीति में क़दम रखा.
2007 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव नियुक्त किया गया.
2013 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया.
दिसंबर 2017 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.
2018 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की जीत का श्रेय राहुल गांधी को मिला.
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया और तब से अब तक पार्टी के आधिकारिक अध्यक्ष न होते हुए भी वे अध्यक्ष पद की ज़्यादातर ज़िम्मेदारियाँ निभाते सार्वजनिक मंच पर नज़र आते हैं.
इन मौक़ों के अलावा भी वो कई बार चर्चा में रहे. फिर चाहे वो साल 2013 में भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सज़ायाफ़्ता सांसदों पर यूपीए सरकार के ही अध्यादेश को फाड़ने की बात हो या फिर महत्वपूर्ण मौक़ों पर विदेश चले जाने की बात हो.
राजनीतिक सफ़र की शुरुआत किए हुए अब उन्हें 17 साल से ज़्यादा वक़्त गुज़र गया. पार्टी के अध्यक्ष को जो कुछ करना चाहिए वो सब करते नज़र आ रहे हैं.
चाहे पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की खींचतान हो या फिर छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस में चल रही रस्साकशी, हर जगह वास्तविक अध्यक्ष वही नज़र आते हैं - तो फिर आधिकारिक तौर पर अध्यक्ष पद स्वीकार करने में उन्हें हिचक कैसी?

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राहुल की ताजपोशी की तैयारी के संकेत
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार जतिन गांधी कहते हैं, "राहुल गांधी में किसी तरह की कोई हिचक नहीं है. दरअसल जब से उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ा है तब से वो दोबारा अध्यक्ष बनना चाहते हैं. लेकिन हालात बस उनका साथ नहीं दे रहे."
जतिन गांधी ने वीनू संधू के साथ मिलकर राहुल गांधी पर 'राहुल' नाम से किताब लिखी है.
वो आगे कहते हैं, "2019 में जब उन्होंने लोकसभा चुनाव में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए चार पेज की चिट्ठी लिखी थी, तो उसका मूल भाव यही था कि अगर मैं हार की ज़िम्मेदारी ले रहा हूँ तो कांग्रेस के अंदर और कई नेता हैं जिन्हें ये ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. उस चिट्ठी में केवल दो पैराग्राफ़ राहुल ने अपनी ज़िम्मेदारी पर लिखे थे."
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लेकिन उस चिट्ठी के बाद राहुल गांधी के अलावा पार्टी में किसी और ने न हो हार की ज़िम्मेदारी ली और न ही पद छोड़ा.
इसलिए जतिन कहते हैं कि उनकी ताजपोशी की अब दोबारा से तैयारी शुरू हो गई है, जैसा कि कांग्रेस में बरसों पुरानी प्रथा भी है.
जतिन गांधी, अपनी बात के समर्थन में तर्क भी देते हैं.
वो कहते हैं, "साल 2007 में जब पहली बार राहुल गांधी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया था, तो 2006 से ही उनको बड़ी ज़िम्मेदारी देने की भूमिका बनाना शुरू कर दिया गया था. 2006 में हैदराबाद में हुए महाधिवेशन में इसकी शुरुआत हो गई थी. राहुल गांधी को बड़ी ज़िम्मेदारी देनी चाहिए- इस बारे में बड़े नेताओं के बयान आए थे."
दूसरा उदाहरण साल 2020 का है. फरवरी के महीने में केरल से लेकर राजस्थान तक में जन आक्रोश रैली का आयोजन किया गया. वो भी राहुल को अध्यक्ष बनाने की तैयारी की ही एक कड़ी थी. लेकिन फिर कोरोना महामारी फैल गई. इसलिए सब कुछ रुक गया. वरना बहुत संभव था कि राहुल 2020 में ही दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बन गए होते. कांग्रेस के भीतर 'विद्रोही नेताओं' के गुट की चिट्ठी सामने आने के बाद मामला थोड़ा खटाई में पड़ गया.
कुल मिला कर कहें, तो युवा कांग्रेस का प्रस्ताव हो या हाल ही में दूसरे प्रदेश कांग्रेस की ओर से पास किया गया प्रस्ताव हो - सभी बातें बस अध्यक्ष बनाने की दिशा में ज़मीन तैयार करने की कोशिश है. ऐसा जतिन गांधी का मानना है.
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ताजपोशी के लिए राहुल कितने तैयार हैं?
एक सच्चाई ये भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को लगातार विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा रहा है.
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन भले ही अच्छा न रहा हो, लेकिन उनका वोट शेयर 2014 की ही तरह 20 प्रतिशत के क़रीब ही रहा था.
पर पिछले एक साल में बिहार, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनका प्रदर्शन काफ़ी खराब रहा. गठबंधन के पार्टी के फ़ैसलों को पार्टी के अंदर ही चुनौतियाँ भी मिली.
ऐसे में क्या एक बार दोबारा से इस समय राहुल गांधी ताजपोशी के लिए तैयार होंगे?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार पल्लवी घोष कहती हैं कि राहुल गांधी औपचारिक रूप से ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं दिखते. पल्लवी घोष सीएनएन न्यूज़ 18 में सीनियर एडिटर हैं और तक़रीबन दो दशक से कांग्रेस पार्टी को कवर कर रही है. राहुल गांधी के राजनीतिक करियर को उन्होंने शुरुआत से देखा है.
वो कहती हैं, "राहुल गांधी का मानना है कि पार्टी के लिए काम करने के लिए उन्हें अध्यक्ष पद पर रहने की ज़रूरत नहीं है. उनकी इसी हिचक की वजह से कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं हो रहा है और दो बार इसे टाला जा चुका है. दूसरी बात ये है कि वो चाहते हैं कि अपनी नई टीम के साथ वो अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठें, जिसके लिए सोनिया गांधी तैयार नहीं हो रही है."
कांग्रेस के अंदर और बाहर सब जानते हैं कि राहुल कांग्रेस जवान नेताओं की टीम बनाना चाहते हैं. सुष्मिता देव, जतिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया को वो अपनी टीम में रखना चाहते थे. लेकिन एक-एक कर सब कांग्रेस छोड़ कर चले गए. अब जिन नेताओं को वो अपनी टीम में रखना चाहते हैं उसमें एनएसयूआई के अध्यक्ष नीरज, युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास, मणिकम टैगोर, केसी वेणुगोपाल के नाम सबसे आगे हैं.
पल्लवी घोष के मुताबिक़, " राहुल गांधी के राजनीतिक सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी है कि अध्यक्ष पद स्वीकार करने का सही समय अभी नहीं है. आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में चुनाव है. इनमें से जीत की थोड़ी संभावना पंजाब में थी. लेकिन वहाँ अंदरूनी कलह बहुत ज़्यादा है. इस वजह से राहुल सही समय का इंतज़ार करें."
इस वजह से कयास लगाए जा रहे हैं कि राहुल गांधी आने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव तक अध्यक्ष पद नहीं संभालेंगे.

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अध्यक्ष बनने की शर्तें?
राहुल कितने तैयार हैं? इस पर जतिन गांधी कहते हैं, "उनको कांग्रेस पार्टी चलाने के लिए बहुत ही अनुकूल परिस्थितियाँ चाहिए. जैसे आप नई गाड़ी ख़रीदने जाते हैं तो गाड़ी कितने का एवरेज देती है, उसके नीचे छोटे अक्षरों में लिखा होता है, ये 'टेस्ट कंडीशन' में ही लागू है. असल में जब गाड़ी सड़क पर निकलती है, तो एवरेज कहीं ज़्यादा कम होती है. राहुल को कांग्रेस चलाने के लिए वही 'टेस्ट कंडीशन' चाहिए. सड़क पर उतरते ही एवरेज कम हो जाए, उन्हें वैसी गाड़ी चलाने के लिए नहीं चाहिए."
जतिन गांधी के मुताबिक़, "राहुल के अनाधिकारिक नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी 2008 वाली लेफ़्ट पार्टी की तरह बर्ताव कर रही है, जहाँ वो जनता की नब्ज़ और उनके मुद्दे नहीं पकड़ पा रही है. राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के लिए पार्टी पर पूरी तरह से नियंत्रण चाहते हैं. उन्हें पार्टी के कामकाज में सीनियर नेताओं की दख़लअंदाज़ी नहीं चाहिए. साथ ही वो ये भी चाहते हैं कि अध्यक्ष बनने से पहले एक दो राज्यों में कांग्रेस पार्टी का चुनाव में बेहतर प्रदर्शन दिखे. अगर ये न हो सके तो कम से कम बीजेपी का ही प्रदर्शन थोड़ा ख़राब हो, ताकि कुछ क्रेडिट राहुल गांधी को विरोध प्रदर्शन का ही मिल जाए. इसके अलावा वो ये भी चाहते हैं कि जिस जिस राज्य में उनकी सरकार है, वहाँ भी उनकी बात सुनी जाए."
यानी युवा कांग्रेस के प्रस्ताव पर राहुल अमल तो कर सकते हैं, लेकिन साथ में कुछ शर्तें भी लागू होंगी. अध्यक्ष पद पर दोबारा आसीन होने में देरी इस वजह से हैं.
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