प्रहलाद सिंह राजपूत: पाकिस्तान की जेल से 24 साल बाद लौटे लेकिन...

प्रहलाद सिंह राजपूत

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    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, सागर से, बीबीसी हिन्दी के लिए

मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के प्रहलाद सिंह राजपूत पाकिस्तान की जेल से 24 साल बाद वापस अपने घर आ चुके हैं लेकिन उनका पाकिस्तान पहुंच जाना अब भी एक पहेली बना हुआ है. उनकी वापसी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

परिवार और गांव के लोगों के मुताबिक प्रहलाद सिंह मानसिक रुप से अस्वस्थ हैं. वो 1998 में अचानक ग़ायब हो गए थे. दो दशक से ज़्यादा वक़्त बाद, 31 अगस्त, 2021 को वो पाकिस्तान से अपने गांव वापस लौटे हैं. इसके लिए उनके परिवार के लोगों, पुलिस अधिकारियों और समाजसेवियों ने दो साल से ज़्यादा वक़्त तक प्रयास किया.

एक बड़ा रहस्य उनके पाकिस्तान पहुंचने को लेकर है. सागर से लगभग 40 किलोमीटर दूर गौरझमर क्षेत्र में घोसी पट्टी गांव है. नेशनल हाईवे से इस गांव की दूरी लगभग दो किलोमीटर है. प्रहलाद सिंह राजपूत इसी गांव से ग़ायब हो गए थे. तब उनकी उम्र 33 साल थी.

उस वक़्त न तो अच्छी सड़क थी और न ही आवागमन का अच्छे साधन थे लेकिन तब भी प्रहलाद सीमा पार पाकिस्तान पहुंच गए.

रहस्य इसलिए भी नहीं सुलझ रहा क्योंकि वो कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं.

प्रहलाद के पाकिस्तान से लौटने के बाद हम उनके भाई के घर उनसे मिलने पहुंचे. वो कुछ बोल नहीं रहे थे. जब उनसे पूछा गया कि वो पाकिस्तान कैसे पहुंच गये, तो जवाब में वो सिर्फ़ मुस्कुराते रहे.

प्रहलाद पाकिस्तान कैसे पहुंचे, इसका जवाब उनके परिवार के पास भी नहीं है.

उनके छोटे भाई वीर सिंह राजपूत ने बताया, "हमें इस बात की जानकारी नहीं है कि वो वहां पहुंचे कैसे. हमने उनसे पूछा तो वो कुछ भी नहीं बता पा रहे हैं. उनकी मानसिक स्थिति शुरू से ही ठीक नहीं रही है. इसलिए उनसे ज़्यादा पूछने का भी कोई मतलब नहीं है."

वीर सिंह ने बताया, "लोग कहते हैं कि इस क्षेत्र से पहले प्याज़ और टमाटर पाकिस्तान भेजे जाते थे और ट्रक से सामान सीमा तक भेजा जाता था. मुमकिन है कि वो किसी ऐसी ही ट्रक में बैठ कर निकल गये हों या ड्राइवर ने अपना काम करने के लिए उन्हें बैठा लिया हो और वहीं से उन्होंने सीमा पार कर ली हो."

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इमेज कैप्शन, उनके भाई के मुताबिक़, मां गुलाब रानी की अंतिम इच्छा थी कि वो अपने पुत्र को एक बार ज़रूर देखे.

पाकिस्तान में होने की ख़बर 2014 में मिली

परिवार को प्रहलाद के पाकिस्तान में होने की सबसे पहली ख़बर 2014 में मिली. तबब पुलिस ने उनकी मां गुलाब रानी से पूछताछ की थी.

प्रहलाद के भाई के मुताबिक़, मां गुलाब रानी उन्हें लगातार याद करती थी और उनकी अंतिम इच्छा थी कि वो उन्हें एक बार ज़रूर देखे. लेकिन 2016 में गुलाब रानी की मौत हो गई.

पांच भाई और तीन बहनों में प्रहलाद चौथे नंबर के है. उनके एक भाई की मौत हो चुकी है. गुज़र बसर के लिए परिवार के पास थोड़ी बहुत ज़मीन है. घर के लोग छोटे-मोटे कुछ और काम भी करते हैं.

उनके गांव घोसी पट्टी में 31 अगस्त को जश्न का माहौल था क्योंकि प्रहलाद 24 सालों बाद पाकिस्तान से लौट कर आए थे. पाकिस्तान से भारत के तल्ख़ रिश्तों की वजह से भी लोग उन्हें देखने चाहते थे कि कैसे वो पाकिस्तान की जेल में रहकर वापस लौट आए हैं.

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स्थानीय लोग और स्थानीय नेता उनसे मिलने आ रहे हैं. हालांकि स्थानीय मीडिया प्रहलाद के हवाले से कुछ चीज़ें छाप भी रहा है कि वो किन हालात में पाकिस्तान में रहते थे और उनके साथ किस तरह का सूलूक किया जाता था. लेकिन उनका परिवार ने कहा है कि प्रहलाद कुछ भी बता नहीं पा रहे हैं.

30 अगस्त को प्रहलाद को पाकिस्तान की जेल से रिहा कर शाम 5.10 बजे बाघा-अटारी बार्डर पर तैनात भारतीय सेना के सुपुर्द किया गया था. उसके बाद उन्हें सागर ज़िले के पुलिस अधिकारियों और भाई वीर सिंह के हवाले किया गया था.

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इमेज कैप्शन, उनका वापस आना भी एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा था जो 2019 में शुरु हुई.

रिकॉर्ड की तलाश

उनका वापस आना भी एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा था जो 2019 में शुरु हुई. परिवार ने उनके पाकिस्तान में होने की जानकारी मिलने के बाद उनकी वापसी के लिए कोशिश शुरु की थी. स्कूल से उनका रिकार्ड निकलवाया गया. प्रहलाद ने तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की है. स्कूल में मौजूद रिकार्ड से उनकी मार्कशीट निकाली गई.

प्रहलाद ने घोसी पट्टी के शासकीय प्राथमिक शाला में 1974-75 में पढ़ाई की थी. स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक कमलेश कुमार मिश्रा ने बताया, "इतनी पुराना रिकार्ड निकालना आसान नहीं था. लेकिन रिकार्ड मिल गया और परिवार ने इन काग़ज़ों को उपयोग किया अपनी अपील में की ताकि उसे आसानी से लाया जा सके."

गांव के लोग उन्हें एक 'परेशान करने वाला व्यक्ति' बताते हैं. गांव में नाई का काम करने वाले गजोधर सेन का कहना है कि वो उनकी हरक़तों से परेशान रहा करते थे. उन्होंने बताया, "वो दुकान में आकर तरह-तरह से परेशान करते थे. उनकी मानसिक स्थिति उस समय भी अच्छी नहीं थी."

वहीं गौरझमर में रहने वाले दीपक विश्वकर्मा का कहना है कि प्रहलाद का वापस लौट आना परिवार के लिए बड़ी बात है. उन्होंने कहा, "न यह व्यक्ति सही तरह से बात कर सकता है और न ही समझ सकता है उसके बावजूद वो पाकिस्तान की जेल से लौट आया है."

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इमेज कैप्शन, प्रहलाद सिंह का गांव घोसी पट्टी सागर से लगभग 40 किलोमीटर दूर गौरझमर थाना क्षेत्र में है.

आसान नहीं रही वापसी

गौरझमर थाना क्षेत्र के प्रभारी अरविंद सिंह ठाकुर ने बताया कि इस मामले में काफ़ी समय से पत्राचार किया जा रहा था. अरविंद सिंह ठाकुर ने बताया, "हमें समय-समय पर यहां से काग़ज़ों को भेजने के लिये बोला जाता था. ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह प्रहलाद वही है जो इस क्षेत्र से ग़ायब हुआ है."

अरविंद सिंह ने बताया, "पुलिस अधीक्षक का दूतावास से लगातार कम्युनिकेशन हो रहा था. वहां से मेल के माध्यम से पत्राचार के माध्यम से वही पाकिस्तान में भारतीय दूतावास से भी लगातार संपर्क बना कर रखा गया था."

पुलिस अधीक्षक ने गौरझमर थाना प्रभारी को ही इसके लिए नोडल एजेंसी बनाया था. पुलिस के लिए भी यह लंबी प्रक्रिया थी क्योंकि उन्हें भी नहीं मालूम था कि जिस प्रहलाद की जानकारी वो भेज रहे हैं वो यही प्रहलाद है या कोई और. लेकिन अंत में उन्हें भरोसा हो गया कि यह वही प्रहलाद है.

पाकिस्तान को कैसे पता चला कि यह व्यक्ति मध्यप्रदेश के सागर का है, इस सवाल पर सागर के पुलिस अधीक्षक अतुल सिंह ने बताया, "जेल में पूछताछ के दौरान इसने सागर का नाम लिया था. इसके बाद वहां की सरकार ने यह जानकारी भारत सरकार को भेजी और उसके बाद सागर से लापता हुए लोगों में से प्रहलाद नाम के व्यक्ति की तलाश की गई."

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अधिकारियों ने क्या बताया?

अतुल सिंह ने बताया कि वो लगातार भारत सरकार की विभिन्न एजेंसियों के संपर्क में रहे. उन्होंने जो भी जानकारी मांगी उसे तुरंत उपलब्ध कराया गया ताकि प्रहलाद की रिहाई जल्द से जल्द कराई जा सके.

वहीं विदेश में फंसे लोगों को वापस वतन लौटने में मदद करने वाले समाज सेवी सैयद आबिद हुसैन का कहना है कि पाकिस्तान में हिंदुस्तान का व्यक्ति अगर फंसता है तो उसका वहां से जल्द निकलना आसान नही होता है.

पाकिस्तान सहित गल्फ़ देशों में फंसे कई लोगों को वापस लाने में कामयाब रहे सैयद आबिद हुसैन के मुताबिक़, 'पाकिस्तान में जब व्यक्ति फंसता है तो सबसे पहले वहां की सरकार उसे जासूस ही मानती है और उसे अपने आप को बेकसूर साबित करने में लंबा अरसा निकल जाता है.'

वीडियो कैप्शन, भारत-पाकिस्तान के वो लोग जिन्हें जंग ने अपनों से किया अलग

आबिद हुसैन का कहना है कि पहले पाकिस्तान की सीमा पर बाड़ नहीं थे और लोग भटकते हुए पहुंच जाते थे. उन्होंने कहा, "पाकिस्तान से किसी भी शख़्स को निकाल कर लाना आसान नही होता है. दूसरे देश से लेकर आना आसान होता है."

ऐसे में प्रहलाद ने पाकिस्तानी अधिकारियों को कैसे अपने निर्दोष होने का भरोसा दिलाया होगा, इसको लेकर केवल अंदाज़ा भर लगाया जा सकता है. आबिद अब तक पाकिस्तान से सुनील उईके और जितेंद्र अर्जुनवार को अपनी कोशिशों से भारत लाने में कामयाब रहे हैं वहीं वो एक अन्य शख़्स राजू लक्ष्मण को लाने के प्रयास में लगे हुए है.

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किसी व्यक्ति के पाकिस्तान में होने पर आबिद सबसे पहले इस्लामाबाद स्थित भारतीय हाईकमिश्नर को पत्र लिखकर उसके बारे में बताते हैं. उसके बाद आमतौर पर हाईकमिश्नर वहां की सरकार से बात करती है. उसके बाद दोनों मुल्कों के नियमों के मुताबिक़ मामला आगे बढ़ता है.

आबिद ने यह भी बताया कि जब कोई व्यक्ति पकड़ में आता है तो अवैध दस्तावेज़ या प्रवेश के नाम पर वहां पर चार साल की सज़ा होती है और उसे तक़रीबन सभी को मुकम्मल करना होता है, इसके बाद ही वापसी की बात शुरू हो पाती है.

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