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उत्तर प्रदेश के बहराइच में दलित प्रधान की हत्या के मामले में गरमाई राजनीति
- Author, अज़ीम मिर्ज़ा
- पदनाम, बहराइच से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश के ज़िला बहराइच के करनई गाँव से दूसरी बार ग्राम प्रधान बने द्वारिका प्रसाद अपने मकान के बरामदे में आम दिनों की तरह 16/17 जून की रात को सो रहे थे, तभी कुछ लोगों ने उनके सिर पर वार कर दिया, जिससे वे बुरी तरह घायल हो गए.
उनके पुत्र राम मनोरथ राव उन्हें करनई गाँव, जरवल से बहराइच ज़िला अस्पताल लेकर आए, जहाँ डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें लखनऊ रेफ़र कर दिया, लेकिन चार दिनों के बाद 20 जून को उनकी मौत हो गई.
द्वारिका प्रसाद 2016 में पहली बार ग्राम प्रधान बने थे. उस समय यह सीट अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व थी.
साल 2021 में यह सीट सामान्य कर दी गई थी, लेकिन अप्रैल, 2021 में हुए चुनाव में भी द्वारिका प्रसाद इसी सीट से लड़े और जीत गए.
द्वारिका प्रसाद की मौत के 46-47 दिनों बाद इस घटना का ज़िक्र इसलिए हो रहा है, क्योंकि इस घटना ने अब राजनीतिक रूप लेना शुरू कर दिया है.
घटना में नामज़द अभियुक्त की गिरफ़्तारी की माँग को लेकर पिछले पाँच दिनों से धरने पर बैठे परिजनों का उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने ट्वीट करके समर्थन किया है.
मायावती ने मंगलवार को अपने ट्वीट में कहा- बहराइच में सामान्य सीट से नवनिर्वाचित दलित प्रधान की हत्या के नामित लोगों की गिरफ़्तारी की माँग को लेकर उनके परिवार के लोग ज़िला कलेक्ट्रेट के सामने लगातार धरने पर बैठ रहे हैं लेकिन यूपी सरकार ख़ामोश है, यह अति-दुःखद है."
बुधवार को बहराइच की पूर्व सांसद सावित्रीबाई फुले भी धरना स्थल पर पहुँची.
पूर्व सांसद का कहना है कि पुलिस अधीक्षक स्वयं धरना स्थल पर आकर समस्याओं को सुनें क्योंकि पुलिस अधीक्षक ने परिवार से मिलने के बाद मीडिया से जो बातें कहीं थीं, उससे वो लोग सहमत नहीं हैं.
पूर्व में भाजपा से सांसद रही सावित्री बाई ने काशीराम बहुजन मूल निवासी पार्टी के नाम से अपनी पार्टी बना ली है और अब वह भजपा को दलित विरोधी पार्टी बता रही हैं.
इसके अलावा समाजवादी पार्टी के ज़िला स्तर के कई नेता धरना स्थल पर परिवार वालों के समर्थन में बैठे हैं.
मृतक द्वारिका प्रसाद पिछला चुनाव सुरक्षित सीट से जीते थे. लेकिन इस वर्ष वह सामान्य सीट से दोबारा चुनाव जीते थे. जिसके नाते पुलिस अपनी सुरक्षा में उनका अंतिम संस्कार कराना चाहती थी कि कहीं कोई अप्रिय घटना न हो जाए.
मृतक प्रधान के पुत्र राम मनोरथ राव ने बीबीसी को बताया कि जब उनके पिता का शव आया, तो पूरा गाँव छावनी में तब्दील हो गया था, 6-7 थानों की पुलिस और पीएसी की एक गाड़ी मौजूद थी और उन पर दबाव डाला जा रहा था कि रात्रि में ही दाह संस्कार कर दिया जाए.
फ़रार हैं अभियुक्त
इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है और मुख्य अभियुक्त संतोष सिंह उर्फ़ बृजेश सिंह फ़िलहाल फ़रार हैं.
लेकिन उन्होंने फ़ोन पर बीबीसी के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा, "प्रधान जी से कोई झगड़ा नहीं था. उनके लड़के राम मनोरथ एक दिन शराब के नशे में थे और हम भी पिए हुए थे तो वह गाली देकर कहने लगे कि तुमने वोट नहीं दिया, हम देख लेंगे. मेरे घर में राम बहादुर की पत्नी अनीता सिंह चुनाव लड़ रहीं थीं, मैंने उन्हीं को वोट दिया था जिसके लिए वो नाराज़ थे. हालांकि पिछले चुनाव में मैंने इनको वोट दिया था. इसी पर बातचीत बढ़ गई और उन्होंने मुझे दो डंडे भी मारे. मैं बिल्कुल निर्दोष हूँ और नार्को टेस्ट के लिए तैयार हूँ."
झगड़े की बात को राम मनोरथ राव भी मानते हैं लेकिन उनका कहना है कि उल्टे संतोष सिंह ने ही उन्हें मारा था और उनके पिता को रास्ते से हटाने की बात कही थी.
राम मनोरथ पुलिस के रवैए से भी ख़ासे नाराज़ हैं. राम मनोरथ इस मामले में कुछ और नामों को जोड़ना चाहते हैं और इसके लिए पुलिस को दूसरी शिकायत करना चाहते हैं, लेकिन उनके अनुसार पुलिस मामला दर्ज नहीं कर रही है.
धरना
राम मनोरथ और परिवार के दूसरे लोग पिछले पाँच दिनों से कलेक्टर ऑफ़िस के सामने धरने पर बैठे हैं लेकिन शाम होने पर पुलिस पीड़ित के परिवार को रुकने नहीं देती है. राम मनोरथ का कहना है कि पुलिस उन्हें और उनके परिवार को बेइज़्ज़त करके भगा देती है.
मंगलवार को मायावती के ट्वीट के बाद बहराइच पुलिस के ट्विटर हैंडल से पुलिस अधीक्षक सुजाता सिंह ने एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि "मुक़दमे की विवेचना के क्रम में साक्ष्य संकलन की कार्यवाही की जा रही है, उसी क्रम में वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा लेने के लिए डिप्टी डायरेक्टर मेडिको लीगल डॉ ग़यासुद्दीन को बहराइच बुलाया और सीन ऑफ़ क्राइम को रिक्रिएट किया गया.
"उसके बाद उन्होंने लिखित सुझाव दिया गया कि वादी और अभियुक्त दोनों का नार्को टेस्ट कराया जाय. उसी क्रम में विवेचक द्वारा न्यायालय में नार्को टेस्ट की अपील दायर की जिसमें अभियुक्च पक्ष की तरफ़ से सहयोग मिला. उन्होंने नार्को टेस्ट की सहमति दी लेकिन वादी पक्ष की तरफ़ से सहयोग नहीं मिल रहा और उनके वकील माननीय न्यायालय में कई बार डेट ले चुके हैं और वादी द्वारा कलेक्ट्रेट पर धरना दिया जा रहा है."
"तीसरी डेट के क्रम में उन्हें 10 अगस्त की डेट मिली है. उनसे अपेक्षा है कि पूरे घटना क्रम में वादी सहयोग करे और धरने पर न बैठें और अगली तिथि में ज़रूर उपस्थित हों और नार्को टेस्ट में सहयोग करे."
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