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'यहां ऊंची जाति के लोगों का बाल कटता है' कह कर बाल कटाने पहुंचे दलित युवकों की पिटाई
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
"उन्होंने हमसे कहा कि तुम चाहे जहां हो हम तुम्हें ज़िंदा जला देंगे. हम चाहे जहां रहें, हम चाहे जो करें, हम पर लगातार ख़तरा मंडराता रहता है. इसलिए हमने ख़ुदकुशी का फ़ैसला किया."
बीते सोमवार को कर्नाटक के एक गांव में अपनी जान देने की कोशिश करने वाले हनुमंता बता रहे थे कि आखिर उन्होंने ख़ुदकुशी के बारे मे क्यों सोचा. 27 बरस के हनुमंता के साथ उनके 22 साल के भतीजे बसवा राजू ने भी आत्महत्या का प्रयास किया लेकिन दोनों की जान बच गई.
पुलिस के मुताबिक जिस विवाद को लेकर उन्होंने जान देने की कोशिश की, उसकी शुरुआत बाल कटवाने को लेकर हुई थी. पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार किया है.
यह घटना कर्नाटक के कोप्पल ज़िले के होसाहल्ली गांव की है. उस दिन रविवार था. सबसे पहले बाल काटने वाले व्यक्ति ने उन्हें पूछा, "तुम यहां क्यों आए हो? हम सिर्फ़ लिंगायात (ऊंची और दबंग माने जाने वाली जाति) के बाल काटते हैं. ये जगह होलेयाओं (दलित समुदाय) के लिए नहीं है. "
इसके बाद गांव के लोग अपने घरों से बाहर आ गए.
हनुमंता ने बताया, "वो हम पर चीखने लगे- तुम यहां क्यों आए हो? ये हमारी जगह है. हमारी निजी जगह है. जब हमने पूछा कि हम बाल क्यों नहीं कटा सकते हैं तो वो हमें धक्के देने लगे और उसके बाद उन्होंने हमारी पिटाई की."
उन्होंने बताया "वो संख्या में हमसे काफी ज़्यादा था. वो 20 से ज़्यादा लोग थे. हम सिर्फ़ दो लोग थे. जब हमने कहा कि हम शिकायत करेंगे तो वो बोले जो करना चाहते हो कर लो."
हनुमंता ने जो कहा उसकी पुष्टि एक वीडियो से भी होती है. इसमें ये घटना दर्ज है. यह वीडियो वायरल हो गया था.
हनुमंता ने बीबीसी को बताया, "हमारे एक लड़के ने घटना का कुछ हिस्सा अपने मोबाइल फ़ोन पर रिकॉर्ड कर लिया था."
दलितों के सिर्फ़ 20 घर, लिंगायतों के 500
हनुमंता और बसवाराजू एक ही गांव में रहते हैं. हनुमंता बताते हैं कि वो दलित कॉलोनी में रहते हैं. यहां सिर्फ़ 20 घर हैं जबकि लिंगायतों के 500 मकान हैं. गांव में मुसलमान भी रहते हैं लेकिन उनकी आबादी ज़्यादा नहीं है और वो किसी बात में दखल नहीं देते हैं.
बाल कटाने के लिए हनुमंता और उनके भतीजे पहले पास के तालुका येलबुर्गा पहुंचे लेकिन वहां लॉकडाउन की वजह से सबकुछ बंद था. वो वापस गांव लौटे और एक बड़े घर के पास बाल काट रहे व्यक्ति के पास गए.
कोप्पल के पुलिस अधीक्षक टी. श्रीधर ने बीबीसी को बताया, "ये दोनों युवा बाल कटाना चाहते थे और इसी वजह से बहस शुरू हुई. मकान के मालिक ने कहा कि जहां बाल काटने वाले काम कर रहे हैं, वो उनकी निजी जगह है और वहां उनका कोई काम नहीं है. "
मामूली नहीं है मुद्दा
बाल कटाने का मुद्दा भले ही कितना 'मामूली' लगे लेकिन ऐसा है नहीं.
दलित संघ रायचूर के एमआर भेरी ने बीबीसी से कहा, "गांव में दलितों के लिए बाल कटाना एक समस्या की बात रहा है. पिछड़ी जाति में आने वाले नाई इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि अगर ये पता चले कि वो दलितों के बाल काटते हैं तो दूसरे ग्राहक नहीं आएंगे. "
भेरी याद दिलाते हैं कि एक वक़्त एक ही कुएं से पानी लेने को लेकर झगड़ा हो जाता था
वो कहते हैं, "जब पाइप के जरिए पानी सप्लाई शुरू हुई तब से ये समस्या कम हो गई है. लेकिन अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि अधिकतर ग्रामीण इलाकों के किसी भी होटल में आज भी दलितों को पानी या चाय प्लास्टिक के कप में दी जाती है. लेकिन ऊंची या दबंग जातियों के साथ ऐसा नहीं होता है. "
बाल काटने वालों की ही तरह दूसरी पिछड़ी जातियों के लोग और मुसलमान या तो गांव के ऊंची जाति के लोगों का समर्थन करते हैं या फिर मूक दर्शक बने रहते हैं.
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
दलित संघ के कार्यकर्ता कहते हैं कि ऐसी ही घटनाएं रायचूर ज़िले के मान्वी तालुका, बगलकोट ज़िले के हुंगुंड तालुका और दूसरी जगहों पर भी हो चुके हैं.
दिसंबर 2020 में मैसूर ज़िले के नांजंगुड तालुका में नायक समुदाय के लोगों ने इसी तरह की आपत्ति की थी. नायक समुदाय अनुसूचित जनजाति में आते हैं लेकिन मैसूर ज़िले में ये एक दबदबे वाला यानी दबंग समुदाय है. गांव की अन्य पिछड़ा जातियों के लोगों ने नायक समुदाय के लोगों का समर्थन किया था.
भेरी कहते हैं, "इसीलिए दलित समुदाय के युवा लड़कों को सलाह दी जाती है कि वो शहर जाकर अपने बाल कटवाएं. वो कोई भेदभाव नहीं है. लेकिन दलित युवाओं में आ रही जागृति की वजह से वो पुरानी प्रथाओं को लेकर सवाल उठाते हैं."
हनुमंता और भतीजे के साथ हुई मारपीट के मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार रोकने के लिए बने क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया है.
लेकिन ज़मीन पर जो स्थिति है, उसे बयान करते हुए हुनमंता कहते हैं, "आज, दलित गांव में इधर-उधर नहीं जा सकते हैं. दूसरे समुदाय के लोग हमसे बात नहीं कर रहे हैं. हम रोज़ कमाई करने वाले लोग हैं. हम खेत मजदूर हैं. कमाई के लिए हमारे समुदाय के लोग पास के गांवों में जा रहे हैं "
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नोट: दवा और थेरेपी के ज़रिएमानसिक बीमारियों का इलाज संभव है. इसके लिए आपको किसी मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए. अगर आपमें या आपके किसी करीबी में किसी तरह की मानसिक तकलीफ़ के लक्षण हैं तो इन हेल्पलाइन नंबरों पर फ़ोन करके मदद ली जा सकती है:
- सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय-1800-599-0019
- इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज़- 9868396824, 9868396841, 011-22574820
- नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज़- 080 - 26995000
- विद्यासागर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड एलाइड साइंसेज़, 24X7 हेल्पलाइन-011 2980 2980
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