अफ़ग़ानिस्तान में भारत के निवेश का क्या होगा पर बोले अफ़ग़ान राजदूत- प्रेस रिव्यू

इमेज स्रोत, TWITTER/@FMamundzay
भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत फ़रीद मामुन्दज़ई ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा बिगड़ती स्थिति और इन हालात में दूसरे देशों की भूमिका को लेकर बात की.
उन्होंने भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर भारत से सैन्य मदद माँगने पर हामी भरी, लेकिन फ़िलहाल तालिबान पर शांति के लिए दबाव डालने में भारत की भूमिका को अहम बताया.
अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा स्थिति को लेकर फ़रीद मामुन्दज़ई ने कहा कि हालात बहुत मुश्किल और डरवाने हैं. 150 ज़िलों में संघर्ष चल रहा है. कुछ ज़िले तालिबान के कब्ज़े में चले गए हैं. पिछले 10 हफ़्तों में 3,600 लोगों की जान जा चुकी है. देश के अंदर ही दो लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं.
उन्होंने कहा, ''आम अफ़ग़ान नागरिकों में ये डर है कि अफ़ग़ानिस्तान फिर से 90 के दशक की तरफ़ लौट रहा है. अगर हमें उस स्तर तक सहायता नहीं दी जाती कि हम अफ़ग़ानिस्तान को पूरी तरह से सुरक्षित कर सकें और तालिबान से लड़ सकें तो हम निश्चित रूप से उस दिशा में वापस चले जाएंगे.''
हाल ही में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने वाणिज्यिक दूतावास से अपने राजनयिकों और स्टाफ़ को वापस बुला लिया है.
क्या अफ़ग़ानिस्तान में उनके लिए कोई ख़तरा था? इसे लेकर फ़रीद मामुन्दज़ई ने कहा, ''हमें कंधार या हेरात में किसी ख़तरे का पता नहीं चला है, लेकिन सामान्य सुरक्षा स्थिति अस्थिर है. ऐसे में जान-माल को लेकर किसी भी संभावित दुर्घटना से हम बचना चाहते हैं.''

इमेज स्रोत, PRAKASH SINGH
अफ़ग़ानिस्तान की भारत से उम्मीदें
एक लंबे समय से भारत और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते बहुत मज़बूत रहे हैं. भारत ने कई विकास परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है. ऐसे में अब अफ़ग़ानिस्तान भारत से क्या चाहता है और भारत के इस निवेश का क्या होगा?
फ़रीद मामुन्दज़ई कहते हैं, ''भारत का निवेश दो क्षेत्रों में था एक हल्का बुनियादी ढांचा जैसे शिक्षा और दूसरा ठोस बुनियादी ढांचा जैसे सड़कें और इमारतें. अगर देश में सुरक्षा हालात ख़राब होते हैं तो दोनों तरह के बुनियादी ढांचे ख़तरे में पड़ सकते हैं.''
''हमने भारत से अभी तक सैन्य सहायता के लिए आधिकारिक रूप से कोई अनुरोध नहीं किया है. ये मदद हमें नेटो और अमेरिका से पहले ही मिली है जो काफ़ी है. हमारे पास उन संसाधनों और संपत्तियों का उपयोग करने की क्षमता है. अगर हमें और मदद की ज़रूरत होगी तो हम निश्चित रूप से भारत सरकार से मांगेंगे लेकिन अभी तक ऐसा नहीं है.''
''लेकिन निश्चित रूप से, भारत की ओर से दिया गया कड़ा संदेश तालिबान पर क्षेत्रीय आतंकी समूहों से संबंध तोड़ने के लिए दबाव बनाने में मदद करेगा. भारत की तरफ़ से ऐसा संदेश कि भारत अफ़ग़ानिस्तान को सहयोग करना जारी रखेगा और तालिबान को मुख्यधारा के समाज का फिर से हिस्सा बनना चाहिए. भारत अफ़ग़ानिस्तान की शिक्षा, राजनीतिक और राजनयिक तौर पर मदद करना जारी रख सकता है.''
हालांकि, उन्होंने भारत-पाकिस्तान तनाव के अफ़ग़ानिस्तान पर असर से साफ़ तौर पर इनकार कर दिया.
फ़रीद मामुन्दज़ई ने कहा, ''मेरे पास इसका ठीक जवाब नहीं है. आपको दोनों देशों के अधिकारियों से पूछना चाहिए. हम नहीं चाहेंगे कि अफ़ग़ानिस्तान को भारत और पाकिस्तान के बीच के मुद्दों से जोड़ा जाए. हम चाहते हैं कि हमारे मामले और मुद्दे क्षेत्रीय राजनीति और कश्मीर में सुरक्षा स्थिति के इतर स्वतंत्र रूप से देखे जाएं.''

इमेज स्रोत, KAY NIETFELD/POOL VIA REUTERS
पाकिस्तान, चीन और रूस की भूमिका
फ़रीद मामुन्दज़ई कहते हैं कि तालिबान भी अफ़ग़ान ही हैं. आज या कल वो हमसे बात करेंगे. वो अफ़ग़ान के लोगों से, अफ़ग़ान सरकार से बात करेंगे. हम चाहते हैं कि तालिबान हिंसा छोड़े दे, अंतरराष्ट्रीय आंतकी समूहों से संबंध तोड़ दे और देश की मुख्यधारा की राजनीति से शांतिपूर्ण तरीक़े से जुड़े.
इसमें वो पाकिस्तान, चीन और रूस की भूमिका भी अहम मानते हैं.
उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान तालिबान पर काफ़ी प्रभाव रखता है और तालिबान भी अफ़ग़ान समाज का हिस्सा ही हैं. हमारा पाकिस्तान से अनुरोध है कि तालिबान को शांति वार्ता तक लाने के लिए तालिबान पर अपने प्रभाव का उत्पादक इस्तेमाल करे जिससे कि ये इलाक़ा बेहतर बन सके.''
''इस क्षेत्र की बड़ी शक्तियां होने के नाते रूस और चीन तालिबान को शांतिवार्ता तक लाने के लिए काफ़ी दबाव डाल सकते हैं. जब तक तालिबान वार्ता के लिए सहमत नहीं हो जाता, हम इस क्षेत्र के प्रमुख देशों से कोई सैन्य समर्थन नहीं चाहते हैं.''
मौजूदा स्थिति में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका को लेकर उन्होंने कहा कि दोनों देश बहुत रचनात्मक रहे हैं. हाल ही में उलेमा शूरा का आयोजन किया गया था.
उलेमा सम्मेलन में सऊदी अरब ने फतवे के ज़रिए हिंसा की निंदा की. इसमें कहा गया कि अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा सही नहीं है, ये धार्मिक तौर पर न्यायसंगत नहीं है और तालिबान को इसे ख़त्म करना चाहिए. पवित्र शहर मक्का से आया ये एक महत्वपूर्ण बयान है.

इमेज स्रोत, AFP
धीमी हुई टीकाकरण की रफ़्तार
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' की ख़बर के अनुसार भारत में कोरोना टीकाकरण ने 21 जून से जो रफ़्तार पकड़ी थी अब उसमें 60 प्रतिशत तक कमी आ गई है.
कई राज्य वैक्सीन की कमी होने की बात कह रहे हैं.
21 जून के बाद से सरकार ने टीकाकरण की पूरी व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया था. इसी दिन पूरे भारत में 91 लाख लोगों को वैक्सीन दी गई थी और 27 जून तक चार करोड़ लोग का वैक्सीनेशन हो गया था.
लेकिन, इसके बाद के हफ़्ते में रफ़्तार धीमी पड़ती गई और 5 से 11 जुलाई के बीच केव 2.3 करोड़ वैक्सीन ही दी गईं. अब तक देशभर में 38 करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है.
21 जून के बाद से हर दिन 60 लाख के करीब वैक्सीन दी जा रही थीं लेकिन अब आंकड़ा वहां तक नहीं पहुंच रहा है. तीन जुलाई को आख़िरी बार इतनी वैक्सीन दी गई थीं.
इस साल के अंत तक सभी व्यस्कों का वैक्सीनेशन करने के सरकार के लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक दिन में 80 लाख वैक्सीन दी जानी ज़रूरी हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
कोरोना की पहली मरीज़ फिर हुईं संक्रमित
अंग्रेज़ी अख़बार मिंट के मुताबिक भारत में पिछले साल मिलीं कोरोना की पहली मरीज़ अब फिर से कोरोना संक्रमित हो गई हैं.
केरल की मेडिकल स्टूडेंट भारत की पहली करोना मरीज़ थीं.
अख़बार ने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के हवाले से लिखा है कि डीएमओ त्रिशूर ने बताया, ''वो कोविड-19 से फिर से संक्रमित हो गई हैं. उनकी आरटी-पीसीआर रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है, एंटीजन नेगेटिव है. वो एसिम्पटोमैटिक हैं.''
30 जनवरी 2020 को वुहान यूनिवर्सिटी में तीसरे साल में पढ़ रहीं एक मेडकिल स्टूडेंट कोरोना सक्रमित हुई थीं. वो छुट्टियों पर भारत में अपने घर आई हुई थीं.
तब त्रिशूर कॉलेज हॉस्टिपल में तीन हफ़्तों तक चले इलाज के बाद वो पूरी तरह ठीक हो गईं. उनकी रिपोर्ट दो बार नेगेटिव आई थी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















