स्टैन स्वामी का निधन, भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में लगा था यूएपीए

स्टेन स्वामी

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फ़ादर स्टैन स्वामी का सोमवार दोपहर निधन हो गया. 84 साल के स्टैन स्वामी भीमा कोरेगाँव मामले में न्यायिक हिरासत में थे. उन पर हिंसा भड़काने का मामला चल रहा था.

मुंबई के होली फैमिली अस्पताल के डॉक्टर डिसूजा ने बताया, "शनिवार तड़के साढ़े चार बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद उनकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ. "

उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने सोमवार दोपहर 1.30 बजे उन्हें मृत घोषित किया. हालात बिगड़ने के बाद उन्हें लाइफ़ सपोर्ट पर रखा गया था.

इसके पहले झारखंड जनाधिकार महासभा के सिराज दत्ता ने बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रवि प्रकाश को स्टेन की मौत की पुष्टि की.

भीमा कोरगॉंव हिंसा मामले में स्टैन स्वामी को एनआईए ने राँची से पिछले साल हिरासत में लिया था.

इसी बीच सोमवार यानी आज उनकी याचिका पर बंबई हाई कोर्ट में सुनवाई भी हो रही थी. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक अस्पताल प्रशासन ने हाई कोर्ट को उनकी मौत की जानकारी दी है.

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इस बीच कई लोगों ने उनके निधन पर दुख जताया है और उनके काम को याद किया है.

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विटर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, "वो न्याय पाने के हक़दार थे."

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इतिहासकार रामचंद्र गुहा, वामपंथी नेता सीताराम येचुरी, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने भी फ़ादर स्टैन स्वामी के निधन पर दुख जताया है और मानवाधिकार के क्षेत्र में किए उनके कामों को याद किया है.

स्टेन स्वामी

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तमिलनाडु से झारखंड की यात्रा

तमिलनाडु में जन्मे फ़ादर स्टेन स्वामी के पिता किसान थे और उनकी माँ गृहणी थीं.

उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक बेंगलुरु में हाशिए पर मौजूद समुदायों के नेताओं के प्रशिक्षण के लिए एक स्कूल चलाया.

स्टैन स्वामी के दोस्त और एक्टिविस्ट ज़ेवियर डायस बताते हैं, "उनके लिए किसी भी चीज़ की तुलना सबसे ज़्यादा ज़रूरी लोग थे. उन्होंने लोगों की सेवा के लिए चर्च की मान्यताओं की भी परवाह नहीं की."

स्वामी मृदुभाषी व्यक्ति के रूप में चर्चित थे. उन्हें जानने वाले लोग बताते हैं कि 1991 में झारखंड आने के बाद से वे आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करते रहे.

फ़ादर स्टैन स्वामी के एक सहयोगी ने बीबीसी को बताया था कि वो लगातार आदिवासियों के लिए संघर्ष करते रहे.

नक्सली होने के तमगे के साथ जेलों में सड़ रहे 3000 महिलाओं और पुरुषों की रिहाई के लिए वो हाई कोर्ट गए. वो आदिवासियों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के लिए दूरदराज़ के इलाक़ों में गए.

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