भारत में ई-कॉमर्स को लेकर नए क़ानून की तैयारी, बड़ी कंपनियों की क्या है मुश्किलें

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- Author, अरुणोदय मुखर्जी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
ऑनलाइन कारोबार यानी ई-कॉमर्स सुविधाजनक और सस्ता है, साथ ही कोरोना महामारी के दौर में इसके चलते लाखों लोगों को ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए बाहर निकलने से बचाया भी.
इन सबके बाद भी ई-कॉमर्स को अपने सबसे तेज़ी से बढ़ रहे बाज़ार यानी भारत में विवादों का सामना करना पड़ रह है.
ई-कॉमर्स को लेकर क्या-क्या विवाद हैं?
इस पर बात करने से पहले ध्यान देना होगा कि ई-कॉमर्स ने भारत में ख़रीदारी के मायने बदल दिए हैं, अगले तीन साल के दौरान इसका भारतीय बाज़ार 99 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.
कोविड महामारी के संकट के दौर में जब सब कुछ ठहर गया, तब ई-कॉमर्स तेज़ी से बढ़ा है. इस कामयाबी के बाद भी भारत में ई-कॉमर्स के बड़े प्लेयर अमेज़ॉन और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाले फ़्लिपकार्ट के बीच विवाद देखने को मिले हैं.
वह भी ऐसे समय में जब भारत में हर साल लाखों लोग ऑनलाइन से जुड़ रहे हैं. इन कंपनियों पर छोटे कारोबारी लगातार कुछ विक्रेताओं को देने और बाक़ियों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते रहे हैं.
इसके अलावा भारत के लाखों परंपरागत दुकानदार भी सालों से दावा करते आए हैं कि बिना किसी नियंत्रण वाली ई कॉमर्स वेबसाइटें उन्हें कारोबार से बाहर धकेल रही हैं.

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मोदी सरकार ने किन नियमों का प्रस्ताव रखा है?
21 जून को नियमों में सख़्ती लाते हुए उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने ई-कॉमर्स को लेकर मौजूदा नीतियों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है.
इन प्रस्तावों में एक प्रस्ताव उत्पादों की सेल बिक्री पर पाबंदी लगाने का भी है जबकि ई-कॉमर्स की वेबसाइटों पर त्योहार के समय में ऐसे सेल काफ़ी लोकप्रिय हैं.
प्रस्तावित नए नियमों में कहा गया है, "ई-कॉमर्स संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अनुचित कारोबारी लाभ लेने के लिए अपने मंच के माध्यम से संबंधित पक्षों और संबद्ध उद्यमों से एकत्र की गई किसी भी जानकारी का उपयोग न करें. इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनसे संबंधित पक्षों या संबंधित उद्यमों में से कोई भी विक्रेता के रूप में सूचीबद्ध नहीं हो."
नए प्रस्तावों के ज़रिए सरकार रिटेल और ई-कॉमर्स को बाज़ार में एक बराबरी की स्थिति मुहैया कराना चाहती है. इन प्रस्तावों पर छह जुलाई तक विचार विमर्श किया जाएगा.

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कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने सरकार के प्रस्तावों का स्वागत करते हुए कहा कि नए प्रावधानों के ज़रिए ई-कॉमर्स कंपनियों को जवाबदेय बनाया जा सकेगा. नए प्रस्ताव एक लंबी लड़ाई के बाद आए हैं, यह संघर्ष तीन साल से चल रहा था लेकिन प्रस्ताव जून में सामने आए हैं.
बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी के ख़िलाफ़ मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने क्या किया?
2019 में दिल्ली की ट्रेडर्स एसोसिएशन ने कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया (सीसीआई) के पास शिकायत की कि अमेज़ॉन और फ़्लिपकार्ट जैसी कंपनियाँ कारोबार के अनुचित तौर तरीके अपना रही हैं.
इस साल जून में, कर्नाटक हाईकोर्ट ने अमेज़ॉन और फ़्लिपकार्ट की याचिका को ख़ारिज करते हुए सीसीआई को अरबों डॉलर की इन कंपनियों के ख़िलाफ़ जाँच शुरू करने का आदेश दिया.
हाईकोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के खंडेलवाल कहते हैं, "अदालत का आदेश हमारी बात की पूरी तरह से पुष्टि करता है, हम लोग कह रहे हैं कि अमेज़ॉन और फ़्लिपकार्ट का कारोबारी मॉडल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी नीतियों और दूसरे क़ानून का पूरी तरह से उल्लंघन है."
सीएआईटी का दावा है कि वह देश के क़रीब आठ करोड़ रिटेल दुकानदारों का प्रतिनिधित्व करती है, इस संगठन ने 2020 की शुरुआत में जेफ़ बेज़ोस की भारत यात्रा का विरोध किया था.
भारत सरकार से अपनी अपीलों में खंडेलवाल ने लगातार यही कहा कि सरकार ई-कॉमर्स को कारोबारी आतंकवाद से मुक्त कराए. वैसे कर्नाटक हाईकोर्ट में चल रहे मामले की सुनवाई में शामिल वकीलों ने मामले में कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है.
वहीं कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया ने जांच के आदेश दिए हैं, जिसकी प्रति बीबीसी के पास मौजूद है. फ़्लिपकार्ट और अमेज़ॉन पर आरोप है कि उनकी सूची में पंसदीदा विक्रेता शामिल हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में इन्हीं कारोबारी कंपनियों से संबंद्ध हैं या नियंत्रण में हैं.
कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया के आदेश में उन आरोपों की बात भी है, जिसमें कहा गया है कि इन कंपनियों ने स्मार्टफ़ोन कंपनियों से एक्सक्लूसिव समझौते किए हैं जिसके चलते ये उपभोक्ताओं को बेहद आकर्षक डिस्काउंट मुहैया कराते हैं और इसके चलते दूसरे कारोबारियों के सामने बाज़ार से बाहर होने का ख़तरा है. कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया के मुताबिक ऐसे आरोपों के चलते ही जाँच की जा रही है.

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क्या कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया इन बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई कर सकता है?
प्रावधानों के मुताबिक, जाँच के आदेश जारी होने के बाद सीसीआई के महानिदेशक एक विस्तृत जाँच करेंगे और अपनी रिपोर्ट सीसीआई के सदस्यों को सौंपेंगे. सीसीआई इसके बाद सबूतों की समीक्षा करेगी और इसके बाद तय किया जाएगा कि कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन किया है या नहीं. इसमें कितना वक्त लग सकता है, यह निश्चित नहीं है.
अगर कंपनियाँ दोषी साबित हईं तो इन कंपनियों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. एज़ेबी एंड पार्टनर से संबंद्ध कंपीटिशन लॉ की जानकार अदिति गोपालकृष्णन का मानना है कि इन कंपनियों को पिछले तीन सालों के औसत सालाना कारोबार का अधिकतम 10 प्रतिशत तक जुर्माना देना पड़ सकता है.
अदिति के मुताबिक, "भारत में प्रतिस्पर्धा क़ानून नागरिक संहिता है और यह अपराधिक मामलों के दायरे में नहीं आता है लेकिन आयोग प्रतिस्पर्धी क़ानूनों के उल्लंघन की स्थिति कंपनी और इस उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार कर्मचारी पर वित्तीय जुर्माना लगा सकता है. इतना ही नहीं, यह ज़्यादा पारदर्शिता के लिए अनुबंध वाले साझेदारों के साथ कारोबारी समझौते के नियम और शर्तों में बदलाव के आदेश भी दे सकती है."
मौजूदा एफ़डीआई क़ानून इसके बारे में क्या कहते हैं?
भारतीय नियमों के मुताबिक उदारवादी नीतियों वाले आटोमेटिक रूट के तहत 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है. लेकिन ई कॉमर्स में इन्वेंटरी बेस्ड मॉडल जहां उत्पाद ई कॉमर्स कंपनी की हो और उसे सीधे उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा हो, वहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति नहीं है.
ई कॉमर्स कंपनियों को अपनी बिक्री का एक चौथाई यानी 25 प्रतिशत या उससे ज़्यादा किसी एक वेंडर या कंपनी से बेचने की अनुमति भी नहीं है. नियमों के मुताबिक उत्पादों या सेवाओं की बिक्री की क़ीमतों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव भी नहीं डाल सकती हैं, ताकि रिटेल से बराबरी की स्थिति बनी रहे.
खंडेलवाल इन्हीं आधारों पर इन ई कॉमर्स कंपनियों को चुनौती देते आए हैं. वे दावा करते हैं कि इन कंपनियों ने कुछ विक्रेताओं को तरज़ीह दी है, ये काफ़ी ज़्यादा डिस्काउंट देते हैं और उत्पादों की इन्वेंटरी पर नियंत्रण रखते हैं, कीमत के साथ मनमाने बदलाव करते हैं और इन सबके ज़रिए कारोबार में अनुचित लाभ लेते हैं.
उनका कहना है कि बीते तीन सालों के दौरान उन्होंने भारत सरकार के सामने इन कंपनियों के तौर तरीकों को कई बार रखा है, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है.
दूसरी ओर विदेशी कंपनियां भारत के बड़े बाज़ार को देखते हुए काफ़ी निवेश कर रही हैं. यही वजह है कि मई, 2018 में वालमार्ट ने फ़्लिपकार्ट को 16 अरब डॉलर में अधिगृहित किया, ई कॉमर्स के क्षेत्र में यह दुनिया की सबसे बड़ी डील है.
लेकिन बड़ी कंपनियों को खुला बाज़ार देने की रणनीति को लेकर कई लोगों ने चेताया भी है. क्योंकि इन बड़ी कंपनियों पर जो आरोप लग रहे हैं, वे नए नहीं हैं. आलोचक हमेशा यह आरोप लगाते आए हैं कि ये कंपनियां कारोबार पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए गैर प्रतिस्पर्धी तौर तरीके अपनाती हैं. हालांकि टेक्नोपैक एडवाइज़र्स में कंज्यूमर एंड रिटेल के प्रमुख और सीनियर वाइस प्रेसीडेंट अंकुर बिसेन कहते हैं, "उंगलियां उठाना आसान है लेकिन कंपनियों को दोष नहीं दिया जा सकता. वे पहले आयीं और नीतियां बाद में बनी हैं."
अंकुर बताते हैं कि सरकार ने चुनौतियों से भरा एक जटिल ढांचा बनाया है. विशेषज्ञों के मुताबिक नए प्रस्तावों से कई समस्याएं दूर होंगी लेकिन अभी तक इन प्रस्तावों को अधिसूचित नहीं किया गया है. अंकुर के मुताबिक इसमें देरी इसलिए हो रही है क्योंकि सभी साझेदारों से राय ली जा रही है, सबों की सहमति से सभी के लिए नीतियां तय करना बड़ी चुनौती है.
हालांकि क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कंपीटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया को नेतृत्व की स्थिति में आना चाहिए. अदिति गोपालकृष्णन के मुताबिक आयोग को कंपनियों को यह बताना चाहिए कि कौन कौन सी बातें गैर प्रतिस्पर्धी माहौल बनाती हैं.
अदिति ने बताया, "सीसीआई की जांच कंपनियों पर बड़ा वित्तीय बोझ डाल सकती है, उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है ऐसे में जांच का आदेश देने से पहले कुछ हद तक निश्चितता का होना भी ज़रूरी है."

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ई-कॉमर्स कंपनियों का क्या कहना है
बीबीसी ने जब इस मामले में अमेज़ॉन और फ़्लिपकार्ट से बात करने की कोशिश की तो इन लोगों ने मामले के अदालत में होने की बात कहते हुए प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है.
वैसे अतीत में ये कंपनियां लगातार यह कहती रही हैं कि खुद बढ़ने के साथ साथ इन्होंनें भारत के ग्रोथ में योगदान दिया है. दोनों कंपनियों ने भारत में ज़्यादा नौकरियों और छोटे और मंझोले उद्योग धंधों को काम देने का भरोसा दिया है

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पिछले साल अमेज़ॉन ने घोषणा की थी कि 2025 तक वह भारत में दस लाख नौकरियां सृजित करेगा. 2020 में भारत दौरे के दौरान जेफ़ बेज़ोस ने एक करोड़ नए भारतीय कारोबार को ऑनलाइन लाने का उद्देश्य रखते हुए एक अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी.
इसी साल अप्रैल में कंपनी ने दावा किया है कि भारतीय विक्रेताओं से निर्यात तीन अरब डॉलर को पार कर गया है.
2019 में वालमार्ट के स्वामित्व वाली कंपनी फ़्लिपकार्ट ने समर्थ कार्यक्रम शुरू किया है जिसमें वे कम सुविधा वाले कारोबारियों की मदद कारोबार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं. इसके तहत वे ग्रामीण महिलाओं, स्थानीय दस्तकारों और दूसरे सामाजिक उद्दयमियों की मदद कर रहे हैं.
इसी साल फरवरी में फ़्लिपकार्ट ने स्थानीय दस्तकारों और छोटे एवं मंझोले कारोबारियों को मुख्य धारा में लाने के लिए महाराष्ट्र स्टेट खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड के साथ समझौता किया है. दोनों कंपनियों ने कर्नाटक हाईकोर्ट के जांच के आदेश वाले फ़ैसले को क़ानूनी चुनौती भी दी है.
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