छत्तीसगढ़: पुलिस कैंप के ख़िलाफ़ उतरे 40 गाँवों के लोग, क्या है पूरा मामला?

इमेज स्रोत, BASTAR TALKIES
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, रायपुर से
माओवाद प्रभावित सुकमा ज़िले के सिलगेर में पुलिस फ़ायरिंग में तीन आदिवासियों की मौत के बाद लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारियों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है.
रविवार को बीजापुर और सुकमा ज़िले के कलेक्टरों के साथ बैठक के बाद भी आदिवासी अपनी ज़मीन से कैंप हटाए जाने की माँग पर डँटे हुए हैं.
सिलगेर पंचायत के तीन गाँवों के अलावा आस-पास के कम से कम 40 गाँवों के लोग केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ़) की 153वीं बटालियन के कैंप के ख़िलाफ़ सड़कों पर हैं.
प्रदर्शनकारियों में शामिल अरलमपल्ली गांव के सोडी दुला कहते हैं, "सरकार कहती है कि सड़क बनाने के लिए पुलिस का कैंप बनाया गया है लेकिन इतनी चौड़ी सड़क का हम आदिवासी क्या करेंगे?"
वो कहते हैं, "हमें हमारी सुविधा के लायक़ सड़क चाहिए, आंगनबाड़ी चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए, हैंडपंप चाहिए. क्या इसके लिए पुलिस कैंप की ज़रुरत होती है?"

इमेज स्रोत, Alok Putul
'हमारे भले के लिए कैंप है तो हमें गोली क्यों मारी?'
सोडी दुला की बात ख़त्म भी नहीं होती कि पीछे से एक और आवाज़ आती है, "हमारे भले के लिए कैंप बनाया जा रहा है तो हमें ही गोली क्यों मारी जा रही है? तीन लोगों को पुलिस ने गोली क्यों मारी?"
वहीं, जगदलपुर में पुलिस के आला अधिकारी यह बात बताते नहीं थकते कि 'माओवादियों के बहकावे' में आदिवासी किसान, सुरक्षाबल के कैंप का विरोध कर रहे हैं.
बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी. का कहना है कि पुलिस कैंप के कारण माओवादियों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ रहा है इसलिए वो गाँव वालों को दबाव डालकर कैंप का विरोध करने के लिए बाध्य करते हैं.
पुलिस का कहना है कि 17 मई की फ़ायरिंग में मारे गए तीनों लोग भी माओवादी संगठन से जुड़े हुए थे.
हालाँकि पुलिस के दावे के उलट शनिवार को गोली कांड की जाँच के लिए पहुँचे सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर का दावा है कि मारे गये सभी तीन लोग और गोली कांड में घायल लगभग दो दर्जन लोगों में से कोई भी माओवादी नहीं था.
प्रकाश ठाकुर का कहना है कि इस इलाक़े से लोग बड़ी संख्या में पड़ोसी राज्य तेलंगाना में मिर्ची तोड़ने के काम में जाते हैं. मारे गये लोग भी कुछ दिन पहले ही मिर्च तोड़ कर लौटे थे.

इमेज स्रोत, Alok Putul
'पुलिस की गोली सिर्फ़ माओवादियों को कैसे लगी?'
प्रकाश ठाकुर ने मीडिया से बातचीत में कहा, "पुलिस अपने बचाव के लिए झूठ बोल रही है. पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई और गोली सीधे सिर्फ़ माओवादियों को लगी, ऐसा कैसे हो सकता है? मारे गए लोग किसान मज़दूर थे."
शनिवार को ही आदिवासी महासभा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम भी प्रदर्शनकारियों के बीच पहुँचे और उन्हें गाँव वालों ने बताया कि मारे गए तीनों आदिवासियों के परिजनों को ज़िला प्रशासन की ओर से 10-10 हज़ार रुपये के तीन लिफ़ाफ़े दिये गये थे.
अब ग्रामीण इन लिफ़ाफ़ों को सरकार को वापस करना चाहते हैं.
ग्रामीणों का सवाल है कि अगर मारे गये लोग माओवादी थे तो सरकार ने मुआवज़ा क्यों दिया और अगर मारे गये लोगों को सरकार आदिवासी किसान मानती है तो फिर उन्हें माओवादी के तौर पर ग़लत ढंग से क्यों प्रचारित किया गया?

इमेज स्रोत, Alok Putul
क्या है पूरा मामला?
सुकमा और बीजापुर के सिलगेर में जब सीआरपीएफ़ का कैंप बनाए जाने की ख़बर इस महीने के शुरुआत में सामने आई तो गाँव वाले विरोध के लिए पहुँचे. उनसे कहा गया कि अभी कोई कैंप स्थापित नहीं किया जा रहा है लेकिन 12 मई को कैंप बन गया.
इसके दो दिन बाद आस-पास के कुछ गाँवों के आदिवासी विरोध प्रदर्शन के लिए कैंप के पास सड़क पर बैठ गये. उनका आरोप था कि जहाँ कैंप बनाया गया है, वहाँ ग्रामीणों की ज़मीन है.
ग्रामीणों का कहना है कि 17 मई को आदिवासियों और सुरक्षाबल के जवानों के बीच बहस शुरू हुई और सुरक्षाबल के जवानों ने लाठी चार्ज कर दिया. गाँव के लोगों का आरोप है कि लाठी चार्ज के बाद भी जब वो वा नहीं माने और कैंप की ओर बढ़े तो जवानों ने फ़ायरिंग शुरु कर दी.
हालाँकि पुलिस का दावा है कि पहले भीड़ में शामिल माओवादियों ने फ़ायरिंग की जिसके जवाब में सुरक्षाबलों ने बाद में फ़ायरिंग की.
पुलिस की इस गोलीबारी में तीन प्रदर्शनकारी मारे गए और दो दर्जन से अधिक लोग घायल हो गये. इसके अलावा पुलिस ने आठ लोगों को हिरासत में भी लिया.
ग्रामीणों ने मीडिया को बताया कि आठ लोगों को पुलिस ने तीन दिन तक अपने क़ब्ज़े में रखा. गाँव वालों का आरोप है कि पुलिस ने उन पर दबाव बनाया कि जब वे आंदोलन ख़त्म करेंगे तभी ग्रामीणों को छोड़ा जाएगा.
हालांकि इस बारे में पूछे जाने पर बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी. ने मीडिया से कहा कि ग्रामीणों को पूछताछ के लिए रखा गया है.

इमेज स्रोत, Vijayanand Gupta/Hindustan Times via Getty Images
'नाम तक नहीं पता था तो मरने वालों को माओवादी कैसे बता दिया'
आदिवासी महासभा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम कहते हैं, "प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की घटना बहुत दर्दनाक है. इस घटना को टाला जा सकता था लेकिन सुरक्षाबल के लोगों ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की."
"असल में नक्सल मुद्दे पर काम करने वाले पुलिस अधिकारियों की यह धारणा है कि इस तरफ़ जितने भी लोग हैं, वो सब माओवादी हैं. इस ख़तरनाक धारणा के आधार पर ही पुलिस आदिवासियों के साथ ऐसा बर्ताव कर रही है."
मनीष कुंजाम की माँग है कि पूरे मामले की न्यायिक जाँच हो और दोषी पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया जाये.
बिलासपुर हाईकोर्ट की अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला का आरोप है कि पुलिस ने बिना जाँच के घटना की शाम को ही कह दिया कि तीन माओवादी मारे गये लेकिन उनका नाम तक नहीं बता सकी.
उन्होंने पूछा, "अगर नाम तक नहीं पता था तो निहत्थे आदिवासियों को किस आधार पर पुलिस ने माओवादी बता दिया?"
प्रियंका कहती हैं, "बस्तर में यह रटा रटाया जवाब है कि गोली मारो और माओवादी बता दो. माओवादी बता देने के बाद सभ्य समाज की ओर से भी कोई सवाल नहीं पूछा जाता और आदिवासी किसान की मौत को किसी माओवादी की मौत मान कर चुप्पी साध ली जाती है."

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC
ज्यां द्रेज़, बेला भाटिया और सोनी सोरी को सिलेगर जाने से रोका
पिछले कई सालों से बस्तर में रह रही जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और वकील डॉक्टर बेला भाटिया और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ जब घटना के दूसरे दिन सिलगेर जाने के लिए रवाना हुए तो सुरक्षाबलों के जवानों ने उन्हें वहाँ जाने से रोक दिया.
यहाँ तक कि उन्हें बीजापुर के सर्किट हाउस में ताला बंद कर के रोकने की कोशिश की गई और तीन दिन तक सिलेगर नहीं जाने दिया गया.
आरोप है कि आम आदमी पार्टी की पाँच सदस्यीय टीम को भी एक थाने में रोका गया और उनकी गाड़ी की चाबी छीन ली गई. आदिवासी महासभा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम को भी गाँव में जाने से रोकने की कोशिश की गई.
जानी-मानी आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी जब सिलगेर जाने के लिए निकल रही थीं तो पुलिस ने उन्हें घर से ही बाहर नहीं निकलने दिया गया.
राज्य में जन संगठनों के समूह 'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' के संयोजक आलोक शुक्ला का कहना है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सिलगेर जाने से रोकने की कोशिश से लगता है कि राज्य सरकार कुछ छिपाने की कोशिश कर रही थी.
वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुराने बयान देखें तो वो बस्तर में इसी तरह की कार्रवाइयों के विरोध से भरे हुए हैं. लेकिन अब जब भूपेश बघेल सत्ता में हैं तो वे पिछली सरकार का अनुसरण करते नज़र आ रहे हैं."
यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ हमला: बीजापुर में सुरक्षा बलों पर नक्सलियों के हमले से जुड़े सवाल और उनके जवाब

इमेज स्रोत, Bhupesh Baghel/Facebook
गोली कांड पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों चुप
आलोक शुक्ला का मानना है कि यह अकारण नहीं है कि इस गोली कांड पर भाजपा और कांग्रेस की तरफ़ से किसी एक भी नेता का अब तक कोई बयान सामने नहीं आया है.
उनका मानना है कि आदिवासी किसानों को माओवादी बताना इन आदिवासियों को माओवादियों के पाले में धकेलने की तरह है.
शुक्ला कहते हैं, "एक क्षण के लिए मान लें कि कैंप का विरोध माओवादियों के इशारे पर हो रहा था तो सरकार को तो ख़ुश हो जाना चाहिए कि माओवादियों के इशारे पर लोकतांत्रिक तरीक़े से आंदोलन हो रहा है. कैंप के लोकतांत्रिक विरोध को तो सरकार को अवसर की तरह देखना चाहिए."
बस्तर में पिछले साल भर में सुरक्षाबलों के कैंप के ख़िलाफ़ दर्जन भर से अधिक आंदोलन हो चुके हैं. कई-कई दिनों तक चलने वाले इन प्रदर्शनों में हर बार पुलिस यही आरोप लगाती है कि यह माओवादियों के इशारे पर हो रहा है.
साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में नक्सल समस्या के समाधान के लिए नीति तैयार करने और वार्ता शुरू करने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास करने की बात कही थी.
अब सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार माओवादियों से नहीं सिर्फ़ पीड़ितों से बात करेगी.
हालाँकि आज ढ़ाई साल बाद भी नक्सल मुद्दे पर सरकार की नीति का कहीं अता-पता नहीं है. पीड़ितों से बातचीत भी कहीं नज़र नहीं आती.
चुनाव से पहले माओवाद को केवल क़ानून-व्यवस्था का मसला मानने से इनकार करने वाले भूपेश बघेल के कार्यकाल में भी भाजपा सरकार की तर्ज़ पर सुरक्षाबलों के कैंप बनाने और माओवादियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन में तेज़ी आई है.

इमेज स्रोत, Alok Putul
छत्तीसगढ़ में पुलिस कैंपों की भरमार
सीआरपीएफ़ के ही कैंपों की बात करें तो कारली, बारसूर, नेरली, पतुरपारा, गीदम, फुंडरी, नयापारा, नैमेड, बीजापुर, बीजापुर घाटी, कमलापदर, सेवडा, गीदम नाला, कोंडागांव, जगदलपुर, इंजरम, दोरनापाल, सुन्नेमगुड़ा, कामेपेद्दागुड़ा,करनपुर, कोंटा, पैदागुड़ेम और फंदीगुड़ा जैसे कई इलाक़ों में सीआरपीएफ़ ने पिछले कुछ बरसों में एक के बाद एक कैंप बनाए हैं.
कैंपों के निर्माण से बस्तर के कई इलाक़ों में माओवादियों की समानांतर सरकार का मिथक भी टूटा है और सुरक्षाबलों ने उनकी गढ़ में सेंध भी लगाई है. लेकिन 'गुरिल्ला वॉर' की रणनीति में भरोसा रखने वाले माओवादी हर बार पीछे हटते हैं और फिर उसी तीव्रता से दुबारा हमला करके अपनी स्थिति को मज़बूत बताने की कोशिश करते रहते हैं.
आरगट्टा बोडडीगुड़ा गांव के सोयम सुब्बा कहते हैं, "कैंप नहीं, स्कूल और अस्पताल चाहिए. उसी से हमारा भला होगा. बस्तर पाँचवीं अनुसूची का क्षेत्र है जहाँ पंचायत क़ानून लागू है और ग्रामसभा की अनुमति के बिना कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद यहाँ किसी कैंप के लिए ग्रामसभा नहीं की गई."
'सर्व आदिवासी समाज' के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर का सिलेगर मामले में मानना है कि गांव के लोग अगर नहीं चाहते तो पुलिस कैंप हटाया जाना चाहिए. उनका कहना है कि अगर इलाक़े में शांति व्यवस्था चाहिए तो कैंप नहीं होना चाहिए.

इमेज स्रोत, Parwaz Khan/Hindustan Times via Getty Images
कैंप रहेगा या हटेगा? हर तरफ़ चुप्पी
सर्व आदिवासी समाज मारे गये लोगों को न्याय दिलाने के लिए अदालत जाने की भी तैयारी कर रहा है.
वहीं, बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी. की चिंता है कि फ़िलहाल किसी तरह से कैंप हटाने का आंदोलन टले.
उन्होंने रविवार को गांव वालों से अपील की कि मौसम ख़राब है और कोरोना के संक्रमण का भी ख़तरा है. ऐसे में प्रदर्शनकारियों को अपने-अपने गांव लौट जाना चाहिए.
सुकमा ज़िले के कलेक्टर विनित नंदनवार कहते हैं, "ग्रामीणों ने हमें जो भी बताया गया है, उससे राज्य सरकार को अवगत करा दिया जाएगा. जिन मसलों का हल ज़िला स्तर पर निकलना होगा, वो ज़िला स्तर पर निकलेगा."
सिलगेर में सुरक्षाबल का कैंप रहेगा या हटाया जाएगा? इस सवाल पर हर तरफ़ चुप्पी है.
उधर, तमाम विरोधों के बीच एक भी कैंप नहीं हटाये जाने के पुराने अनुभव के बाद भी सिलगेर में सुरक्षाबल के कैंप के ख़िलाफ़ आदिवासियों का नारा जारी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)













