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कोरोना: 'किसी हॉरर फ़िल्म के सीन जैसे हालात', विदेशों में बसे भारतीयों का दर्द
- Author, रितु प्रसाद और सैम कैबराल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ संवाददाता
भारत में कोरोना वायरस की कई ज़िन्दगियां ले रहा है और डर फैला रहा है. ऐसे हालात में विदेशों में रहने वाले भारतीय एक अलग तरह की मानसिक स्थिति से गुज़र रहे हैं.
लेकिन जब आपके परिजन आपसे कोसों दूर दूसरे देश में हों तो संकट के ऐसे दौर में आप उनकी कैसे मदद कर सकते हैं?
भारत के कई हिस्सों में अस्पताल मरीज़ों से भरे पड़े हैं, कई जगहों से दवाओं, वेन्टिलेटर और ऑक्सीजन की कमी की ख़बरें लगातार मीडिया में बनी हुई हैं.
इन हालातों के बीच ऐसे लाखों परिवार हैं जो दूर बैठे अपने शहर और गांव की हालत देख कर ख़ुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. बीबीसी ने ऐसे कुछ परिवारों से बात की और उनकी मजबूरियां समझने की कोशिश की.
'सब कुछ हॉरर फ़िल्म के सीन जैसा था'
जॉर्जिया के अटलांटा में रहने वाले श्री रंगनाथन का घर वहां से तेरह हज़ार मील दूर भारत के अहमदाबाद में है जहां उनके परिजन रहते हैं. वो कहते हैं महामारी ने शहर में कहर बरपाया है.
उनके चाचा की पत्नी इसी साल साठ साल की हुई हैं. अपनी गर्भवती बहू की मदद करने के लिए उनके चाचा-चाची दोनों अपने बेटे-बहू के पास अहमदाबाद आ गए थे.
रंगनाथन कहते हैं कि सभी लोग कोरोना वैक्सीन की एक-एक डोज़ ले चुके हैं, लेकिन "पूरा परिवार ही अब कोरोना संक्रमित हो गया है."
परिवार को इस बात की जानकारी थी कि मरीज़ों की अधिक संख्या के कारण अस्पताल फिलहाल बेहद दबाव में हैं, इसलिए परिवार ने पूरी कोशिश की कि जितना संभव हो उन्हें अस्पताल न जाना पड़े. लेकिन बाद में उनके चाचा, चाची और उनकी बहू सभी को अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ गई. तीनों को अलग-अलग अस्पताल में जगह मिली.
रंगनाथन बताते हैं कि इसके बाद "जो कुछ हुआ वो एक हॉरर फ़िल्म के सीन जैसा था".
अप्रैल महीने के आख़िर में उनकी चाची का देहांत हो गया. बीते मंगलवार उनकी भाभी यानी चाचा की बहू की भी मौत हो गई. उस वक्त वो सात महीने की गर्भवती थीं.
रंगनाथन बताते हैं कि डॉक्टरों की कोशिश थी कि वो मां और बच्चा दोनों को बचा लें. इन परिस्थितियों में वो कौन-सी दवा लें इसे लेकर स्थिति जटिल हो गई थी.
वो कहते हैं, "जब भाभी की तबीयत बिगड़ने लगी तो डॉक्टरों ने कोशिश की कि वो उन्हें बचा लें, लेकिन शायद तब तक देर हो चुकी थी और करने को कुछ बचा नहीं था."
"हम अमेरिका में रहते हैं लेकिन हमने पूरी कोशिश की कि अपने संपर्कों के ज़रिए उन्हें आईसीयू में भर्ती करा सकें और उनके लिए वेन्टिलेटर, ऑक्सीजन और दवाओं का बंदोबस्त करा सकें. कुछ कोशिश में हम सफल भी हुए थे.
वो कहते हैं कि दवा खरीदने की कोशिश में उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया. आख़िर में उन्हें मस्कट से दवा मिली लेकिल इसके पहले कि वो दवा भिजवा पाते उनकी भाभी की मौत हो गई.
वो कहते हैं कि पूरे परिवार के लिए कोरोना किसी डरावने सपने की तरह है.
दुनिया भर में विदेश में रहने वालों में भारतीयों की संख्या किसी और देश के मुक़ाबले कहीं अधिक है. संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार क़रीब एक करोड़ 80 लाख भारतीय विदेशों में हैं.
सेन्सस ब्यूरो के एक अनुमान के अनुसार साल 2019 में अमेरिका में 46 लाख भारतीय थे. इस आंकड़े के अनुसार अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय भारतीयों का है.
इधर अमेरिका की सीमा के पार कनाडा में सात लाख के क़रीब भारतीय प्रवासी हैं और ये आंकड़ा भी बढ़ रहा है.
'ये इमरजेंसी है और मुझे वहां होना चाहिए'
29 साल की पूजा (बदला हुआ नाम) अमेरिका के न्यू जर्सी में काम करती हैं. वो मानती हैं कि उनका नसीब अच्छा था कि यात्रा पर बैन लगने से पहले वो अपने घर हैदराबाद आ सकीं.
अप्रैल महीने में पूजा की मां-पिता और उनकी बहन सभी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए.
पूजा कहती हैं, "मैं कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहती थी. मैंने कोरोना से भयावह हालात के बारे में कई कहानियां पढ़ी थीं और समझती थी कि यात्रा बैन लगा तो मैं यहां लंबे समय के लिए फंसी रह सकती हूं या फिर मेरा पूरा परिवार कोविड-19 के कारण ख़तरे में पड़ सकता है."
वो कहती हैं "मैंने तुरंत कोरोना टेस्ट करवाया, उसकी रिपोर्ट निगेटिव आई. मेरे पास वक़्त नहीं था कि मैं नौकरी जाने या फिर वीज़ा के बारे में सोचूं. मैंने तुरंत वापसी की फ्लाइट ली. मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात घूम रही थी कि, ये इमरजेंसी का वक़्त है और मुझे अपने परिवार के साथ होना चाहिए."
पूजा दो सप्ताह तक अपने परिजनों की तीमारदारी में लगी रहीं. आख़िर में परिवार के सभी लोगों का स्वास्थ्य ठीक होने के बाद वो वापिस अमेरिका लौट गईं. उनके भारत छोड़ने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का लागू किया गया यात्रा बैन प्रभावी हुआ.
वो कहती हैं कि न्यू जर्सी में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग यात्रा बैन के कारण काफी परेशान हैं. वो कहती हैं, "वो भारत जाना चाहें तो भी नहीं जा सकते. क्या हो अगर आपके परिवार में किसी को कुछ हो जाए? अब हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है."
पूजा कहती हैं कि वो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर एंबुलेंस, ऑक्सीजन, दवा और अस्पताल में बेड की गुहार लगाते देख रही हैं. वो कहती हैं, "ये एक अलग तरह का मानसिक तनाव है और इसे देखना बेहद मुश्किल है."
सोशल मीडिया पर भारतीय अमेरिकियों का नेटवर्क भारत में कोविड-19 से जूझ रहे परिवारों की मदद के लिए आईसीयू बेड, दवाएं और राशन के सामान की व्यवस्था कर रहा है. साथ ही ये नेटवर्क महामारी के बारे में जानकारी साझा कर रहा है और स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिल कर ज़रूरी आर्थिक मदद भी जमा कर रहा है.
भारत में ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए 23 अप्रैल को फ़ेसबुक पर शुरू किए गए एक फंडरेज़र ने अब तक 75 लाख डॉलर जमा कर लिए हैं.
विदेश से मदद ले रहे फंडरेज़र ग्रुप्स और स्वयंसेवी संस्थाओं के बारे में एक गूगल स्प्रेडशीट पर इतना अधिक ट्रैफिक है कि इस स्प्रेडशीट को खुलने में एक मिनट से अधिक वक़्त लगता है.
'आप हमेशा दूसरों के लिए ज़्यादा करना चाहते हैं'
28 साल की रुचिका तलवार ऐसी ही एक साझी कोशिश में शामिल हैं जो भारत में रह रहे लोगों के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था कर रहा है. वो दिल्ली से हैं और फिलहाल अमेरिका के पेन्सिल्वेनिया में रहती हैं.
रुचिका कहती हैं, "हमें लगातार फ़ोन कॉ़ल आ रहे हैं, कोई घर पर है और उसे ऑक्सीजन चाहिए, कोई अस्पताल में भर्ती नहीं हो पा रहा है, कहीं किसी की मौत हो गई है."
जब भारत में कोरोना महामारी की स्थिति बिगड़ी, तब तलवार और उनकी मां ने दिल्ली में ज़रूरतमंदों तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए उनकी मां के मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्रों से संपर्क किया.
इसकी शुरुआत उस मेल से हुई जिसमें रुचिका ने अपने परिवार और दोस्तों से मदद की गुहार लगाई थी. किसी ने उनका ये मैसेज इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया और जल्द ही दूसरों की मदद के लिए उन्होंने 10,000 डॉलर इकट्ठा कर लिए.
इसके बाद उन्होंने GoFundMe पर एक कैंपेन शुरू किया और धीरे-धीरे क्राउडसोर्स से 90,000 डॉलर तक जमा किए. रविवार को उन्होंने भारत के पांच शहरों के लिए दो सौ ऑक्सीजन कन्सेन्ट्रेटर भेजे हैं.
साल 2020 में जब अमेरिका में कोरोना वायरस ने कहर ढाया था तब रुचिका ने कई मरीज़ों का इलाज किया था.
वो कहती हैं, "अमेरिका में काफी उम्मीद है और लोग ठीक हो रहे हैं. लेकिन जब मैं अपने शहर की बात सोचती हूं तो दुख होता है कि वहां लोगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है."
उनके मंगेतर के परिवार के तीन लोगों की मौत कोरोना से हो चुकी है. रुचिका के परिजनों में कई संक्रमित हैं और घरों पर हैं क्योंकि उन्हें अस्पताल में बेड नहीं मिला.
वो कहती हैं, "अमेरिका के पास अधिक वैक्सीन है लेकिन भारत में वैक्सीन की कमी है. ये देखना दुखदायी है, लगता है कि काश, मैं कुछ और कर पाती."
'मेरे पिता अब नहीं रहे'
कनाडा में रहने वाले भारतीय भी इसी तरह की मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.
अश्विनी अग्रवाल मीडिया सेल्स और लोन में काम करते हैं. लेकिन आजकल वो भारत में रह रहे लोगों की मदद करने में लगे हुए हैं.
उन्होंने कनाडा में रह रहे 125 भारतीयों के साथ मिल कर माई इंडियन्स इन कनाडा एसोसिएशन नाम की एक संस्था बनाई है जिसके ज़रिए वो लोगों के लिए मदद इकट्ठा कर रहे हैं. वो फिलहाल दिल्ली और चंडीगढ़ में 100 ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाएं और राशन का सामान खरीदने के लिए ज़रूरी पैसे जमा करने में लगे हुए हैं.
वो कहते हैं, "मेरे पास टोरंटो से एक व्यक्ति का फ़ोन आया था. उसने बताया कि उसके माता-पिता चंडीगढ़ में हैं और कोरोना संक्रमित हैं. वो ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं कर पा रहे थे."
"हमने उनके लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था कर ली और उन्हें फ़ोन किया, लेकिन तब तक उनके पिता की मौत हो चुकी थी. ये दिल तोड़ने वाली घटना थी."
अमेरिका में रहने वाले भारतीयों के लिए स्थितियां धीरे-धीरे सामान्य की ओर जा रही हैं, वहां चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन में राहत दी गई और वैक्सीन भी तेज़ी से लगाई जा रही है.
लेकिन इसके मुक़ाबले भारत से मिल रही ख़बरों में उन्हें सोशल मीडिया पर या तो मदद की गुहार दिख रही है या फिर मौत की ख़बरें.
'हज़ारों मील की दूरी के बावजूद लोग साथ आ रहे हैं'
नम्रता नारंग ने अपने जीवन में पहली बार ज़ूम वीडियो लिंक के ज़रिए अंतिम संस्कार में भाग लिया.
वो कहती हैं कि उस बात को याद कर के उनेक रोंगटे खड़े हो जाते हैं. वो कहती हैं, "दुनिया के दूसरे कोने में बैठ कर अपनी स्क्रीन पर अंतिम संस्कार देखना, अपने परिवार के लोगों को रोते और एकदूसरे को ढांढस बंधाते देखना बेहद अजीब है. ये देख कर बेचैनी होने लगती है."
26 साल की नम्रता छह सालों से अमेरिका में हैं और बीते दो सालों से लॉस एंजेल्स में काम कर रही हैं.
उनके दो परिजनों की मौत भारत में कोरोना से हो गई. वो उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत नहीं आ सकीं.
बीते शुक्रवार नारंग जब इंटरनेट पर ऑक्सीजन सिलेंडर भारत भेजने में मदद करने वाली संस्थाओं के बारे में सर्च कर रही थीं, उन्हें इकोनोमिक्स एंड पॉलिसी के सेंटर फ़ॉर डीज़ीज़ डायनामिक्स की मुहिम के बारे में पता चला.
उन्होंने 50 डॉलर दान करने की बात की. इसके बाद उनकी एक दोस्त ने भी उनके बराबर, 50 डॉलर दान किए. नारंग कहती हैं, "जितना एक व्यक्ति दान करे, उतना ही दूसरा दान करे. इसी तर्ज पर हमने इंस्टाग्राम पर ये पोस्ट करने और अधिक पैसे इकट्ठा करने के बारे में सोचा."
रविवार सवेरे तक नारंग सौ डॉलर दान कर 12,000 डॉलर तक इकट्ठा कर चुकी थीं. बुधवार तक ये आंकड़ा 25,000 डॉलर हो चुका था. एक अज्ञात डोनर ने कहा है कि वो इतनी ही मैचिंग रक़म दान करेगा.
नारंग कहती हैं, "मैं ख़ुद को असहाय और डरा हुआ महसूस करती हूं. मैं अपनी उर्जा मदद के लिए पैसे जमा करने और लोगों तक मदद पहुंचाने में इस्तेमाल कर रही हैूं और ऐसा कर के मुझे अच्छा लग रहा है."
वो कहती हैं कि उनके कई अमेरिकी मित्र हैं जो अभी स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं लेकिन कई ऐसे हैं जो तुरंत मदद करने के लिए आगे आए हैं.
वो कहती हैं कि हज़ारों मील दूर बैठे लोग मदद के लिए एक साथ जुड़ रहे हैं और उनकी कोशिशें रंग भी ला रही हैं.
वो कहती हैं, "इस तरह के मुश्किल दौर में आपको अकेलापन लगता है और बंधा हुआ महसूस करते हैं लेकिन ये वक़्त आपके लिए साथ मिल कर काम करने के मौक़े भी पैदा करता है."
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