कोरोना महामारी के दौर में कैसे फल-फूल रहा है ठगों का धंधा?

कोरोना मरीज़

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मेरे एक दोस्त के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत थी. मैंने व्हाट्सएप मैसेज भेजा, तो कई दोस्तों ने ऑक्सीजन उपलब्धता के 'वेरिफ़ाइड लीड' भेजे.

इनमें से एक नंबर पर कॉल किया. कॉल तो नहीं उठा लेकिन कुछ मिनट बाद ही एक दूसरे नंबर से फ़ोन आया और कहा गया कि ऑक्सीजन की होम डिलीवरी हो जाएगी, पेमेंट ऑनलाइन करनी होगी.

वो जल्द से जल्द अपने अकाउंट में पैसा ट्रांसफ़र करवाना चाहते थे. पीछे से और लोगों के फ़ोन पर बात करने की आवाज़ें आ रहीं थीं. मानो कोई कॉल सेंटर ही चल रहा हो. वो पूरे प्रोफ़ेशनल तरीक़े से बात कर रहे थे, घर का पता लिया, डिलीवरी का टाइम बताया और सिलेंडर दो घंटे में पहुँचने का भरोसा दिया.

7500 रुपए में जंबो सिलेंडर की होम डिलीवरी की डील पक्की होने के बाद मैंने रिकॉर्ड के लिए एक रुपया ट्रांसफ़र किया, जो उस अकाउंट में पहुँच गया. जब मैंने उनसे डिलीवरी के बारे में पूछा तो उन्होंने पूरी रक़म की माँग रखी, जब उन्हें लगा कि मैं उसकी चाल समझ गया हूँ तो उन्होंने मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया.

कोविड महामारी के दौर में ठगी की ये कोशिश सिर्फ़ मेरे साथ नहीं हुई है. हज़ारों लोग इस तरह फ़र्ज़ीवाड़े के शिकार हो रहे हैं. अपराधियों ने लोगों की ज़रूरत को धोखाधड़ी करने का ज़रिया बना लिया है.

फलता-फूलता धंधा

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर गंगा सहाय मीणा के साथ भी ऑक्सीजन के नाम पर ऐसी ही धोखाधड़ी की कोशिश हुई. फ़ोन करने वाले ने उन्हें कथित तौर पर अपना आधार कार्ड और दूसरे फ़ोन नंबर भी दिए. लेकिन प्रोफ़ेसर मीणा भी फ़ोन नंबरों की पड़ताल करके समझ गए कि कि कोई ठग धोखाधड़ी कर रहा है.

प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं, "लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं, ऐसे में परेशान लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर कुछ लोग मुनाफ़ा कमा रहे हैं. ज़रूरी मेडिकल वस्तुओं को मनमाने दाम में बेच रहे हैं. इससे भी आगे बढ़कर कुछ फ्रॉड लोग मरीज़ों के परिजनों को बेड, ऑक्सीजन, दवाई आदि के नाम पर उनसे पैसे ऐंठ रहे हैं. सोचिए, कोई चोर मरीज़ की दवा के पैसे लेकर भाग जाए तो कैसा लगेगा?"

लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाने की कोशिश

इमेज स्रोत, Facebook/Ganga Sahay Meena

लेकिन हर किसी के पास इतना समय नहीं होता कि वो पड़ताल कर पाए. जब किसी अपने की साँस अटकी हो तो परिजन किसी भी क़ीमत पर ऑक्सीजन ख़रीदने का रिस्क उठा रहे हैं. अंकित पांडे ऐसे ही ठगों का शिकार हो गए और 30 हज़ार रुपए गंवा बैठे. ऑक्सीजन सिलेंडर भेजने का दावा करने वालों ने अब फ़ोन बंद कर लिया है.

दिल्ली की किरण बेनीवाल ने ऑक्सीजन ख़रीदने की कोशिश में 8000 रुपए गँवा दिए. उन्होंने दिल्ली पुलिस में एफ़आईआर करानी चाही तो उन्हें एक थाने से दूसरे थाने भेज दिया गया.

हालांकि दिल्ली पुलिस का कहना है कि वो ऐसे मामलों पर कार्रवाई कर रही है.

ऑक्सीजन सिलेंडर के नाम पर फ़र्ज़ीवाड़ा

इमेज स्रोत, Facebbok/Ankit Pandey

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता चिन्मय बिस्वाल ने बीबीसी से कहा, "हमने ठगी की रिपोर्ट के लिए एक हेल्पलाइन भी जारी की है. कल ही दिल्ली पुलिस ने दस एफ़आईआर दर्ज की हैं. एंबुलेंस के अतिरिक्त किराया वसूलने पर भी हम कार्रवाई कर रहे हैं. अगर दिल्ली में कोई इस तरह की ठगी का शिकार हुआ है तो वो हमारे नंबर 011-23469900 पर संपर्क करके जानकारी दे सकता है."

पुलिस का कार्रवाई करने का दावा

चिन्मय बिस्वाल ने बीबीसी से कहा, "ब्लैक मार्केटिंग, ठगी या दूसरे फ़र्ज़ीवाड़ों की हर सूचना पर दिल्ली पुलिस त्वरित कार्रवाई कर रही है. हम लोगों से सावधान रहने की अपील भी करते हैं."

बिस्वाल के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस और नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने सोमवार को एक आपात बैठक भी की है, जिसमें ऐसे अकाउंटों को तुरंत बंद करने का निर्णय लिया गया है जिनके बारे में ठगी करने की जानकारी मिलती है.

बिस्वाल कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि त्वरित कार्रवाई करके हम ठगी के 40 फ़ीसदी मामलों को तो रोक ही पाएँगे. अगर किसी के साथ ठगी होती है तो उसे तुरंत पुलिस को जानकारी देनी चाहिए. ऐसा करके वो दूसरे के साथ ठगी को रोक सकते हैं."

अमेरिका में रह रहे आशीष दास का परिवार लखनऊ में रहता है. घर में बीमार बुज़ुर्गों को ऑक्सीजन देने के लिए उन्होंने 50 हज़ार रुपए में ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर ख़रीदने का सौदा किया. ऑनलाइन पेमेंट करने के बाद डीलर का फ़ोन ही बंद हो गया.

आशीष या उनके परिवार में किसी के पास इतना समय नहीं था कि वो इस मामले की शिकायत पुलिस से करा सकें.

ऑक्सीन की कमी

इमेज स्रोत, Getty Images

लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाने की कोशिश

वो अपना एक-एक मिनट बीमार परिजनों की जान बचाने में लगा रहे हैं. उनके लिए हालात इतने मुश्किल थे कि कई दिन उन्होंने 30 हज़ार रुपए की दर से एक सिलेंडर ऑक्सीजन गैस ख़रीदी. अब वो किसी तरह अमेरिका से एक कॉन्सेंट्रेटर लखनऊ भेज पा रहे हैं.

कोरोना महामारी के दौर में जहाँ बहुत से लोग किसी भी तरह से अनजान लोगों की मदद करने में जुटे हैं, वहीं कुछ अपराधी ऐसे भी हैं जो अलग-अलग तरीक़ों से लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे हैं.

कानपुर के पुलिस कमिश्नर असीम अरुण के मुताबिक़ साइबर अपराधी लोगों की आइडेंडिटी क्लोन करके बीमारी के नाम पर दोस्तों और रिश्तेदारों से पैसे भी माँग रहे हैं.

असीम अरुण कहते हैं, "ऐसे साइबर अपराधियों से सिर्फ़ सावधानी से ही बचा जा सकता है. जो लोग मदद भी करना चाहते हैं वो पहले अपने स्तर पर चीज़ों को वेरिफ़ाई करें. जब लोग डिस्ट्रेस में होते हैं या भावनात्मक होते हैं तो उन्हें आसानी से शिकार बना लिया जाता है. पुलिस के पास भी ऐसे अपराधों की सूचनाएँ पहुँचनी चाहिए ताकि अपराधियों को पकड़ा जा सके."

ऑक्सीजन कॉन्सेनट्रेटर की बिक्री में फ़र्ज़ीवाड़ा सिर्फ़ ऑनलाइन ठगी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को नक़ली या कम क्षमता के कॉन्सेंट्रेटर भारी दाम पर बेच दिए जा रहे हैं.

ऑनलाइन ऐसे ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर बेचे जा रहे हैं जिनकी क्षमता एक से पाँच लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन की बताई जाती है लेकिन वास्तविकता में वो इतनी ऑक्सीजन नहीं दे पाते.

ऑक्सीन की कमी

इमेज स्रोत, Getty Images

दिल्ली के दवा मार्केट के मेडिकल इक्विपमेंट इंपोर्टर अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, "बहुत ही घटिया क्वालिटी के कॉन्सेंट्रेटर और ऑक्सीमीटर बाज़ार में आ गए हैं. ऐसे प्रॉडक्ट से मरीज़ की जान तो नहीं बचनी है बस दिलासा ही मिलना है."

वो कहते हैं, "इस मुश्किल वक़्त को कुछ लोग पैसा कमाने के अवसर पर देख रहे हैं. दुखद ये है कि ऐसे लोगों पर कोई कंट्रोल नहीं है. कम से कम बड़े कारोबारियों को तो ब्लैक मार्केटिंग का हिस्सा नहीं बनना चाहिए."

कोविड महामारी के इस दौर में रेमडेसिविर दवा की भी बेहद माँग है. ये दवा भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं है. ऐसे में ज़रूरतमंद सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं. इस इंजेक्शन की कालाबाज़ारी तो हो ही रही है, कुछ ठग नक़ली इंजेक्शन भी बेच रहे हैं. मध्य प्रदेश के इंदौर में पुलिस ने ऐसे आठ लोगों को गिरफ़्तार किया है जो नक़ली रेमडेसिविर बेच रहे थे.

इंदौर के आईजी हरिनारायण चारी ने बीबीसी से कहा, "हमने नक़ली दवा बेचने वाले आठ लोगों पर एनएसए लगाया है. लोगों में जागरुकता के लिए भी अभियान चलाया गया है. हम कालाबाज़ारी की हर सूचना पर कार्रवाई कर रहे हैं."

हरिनारायण चारी कहते हैं, "जनता की भागीदारी से ही इस तरह के अपराधों को रोका जा सकेगा. बहुत से लोग जिनके साथ ठगी हो रही है वो शिकायत भी दर्ज नहीं करवा रहे हैं."

उत्तर प्रदेश के अमरोहा में अपने बीमार दादा के लिए ब्लैक मार्केट से 25 हज़ार में ऑक्सीजन सिलेंडर ख़रीदने वाले एक युवा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "जब अपनों की साँस अटकी हो, तो क़ीमत नहीं देखी जाती. जैसे-तैसे करके, उधार लेकर सिलेंडर ख़रीदने के लिए पैसे जुटाए हैं."

पुलिस से शिकायत करने के सवाल पर उन्होंने कहा, "अभी दादा की जान बचानी है, किसी पचड़े में नहीं फँसना है. पुलिस को काला-बाज़ारी करने वाले लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए."

उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक क़ानून व्यवस्था प्रशांत कुमार के मुताबिक़ यूपी में ज़िला स्तर पर पुलिस ने हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं जिन पर फ़ोन करके लोग कालाबाज़ारी और ठगी की जानकारी दे सकते हैं.

यूपी पुलिस ने अब तक 1082 अलग-अलग इंजेक्शन, 531 ऑक्सीमीटर और 1120 ऑक्सीजन सिलेंडर और 52 लाख से अधिक रुपए कालाबाज़ारी करने वालों से बरामद किए हैं.

प्रशांत कुमार कहते हैं, "यूपी पुलिस कालाबाज़ारी और ठगी की हर शिकायत पर कार्रवाई कर रही है. हम लोगों से पुलिस को ऐसे मामलों की जानकारी देने की अपील करते हैं."

क़ानूनी पहलू

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस के ये प्रयास ठगी को रोकने में नाकाफ़ी होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता कहते हैं, "ऑनलाइन ठगी लोगों के साथ पहले भी होती रही है. अब ठग मरीज़ों के परिजनों को शिकार बना रहे हैं. अपराधियों से मानवीय होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. हमें सिस्टम को ही सशक्त करना होगा. जो हमारी मौजूदा व्यवस्था है वो इस तरह के अपराध से लड़ने में सक्षम नहीं हैं."

ऑक्सीन की कमी

इमेज स्रोत, Getty Images

इसकी वजह बताते हुए विराग गुप्ता कहते हैं, "अधिकतर फ्रॉड बैंकिंग सिस्टम के ज़रिए हो रहे हैं. जब तक इस सिस्टम को मज़बूत नहीं किया जाएगा और बैंकों की आपराधिक ज़िम्मेदारी तय नहीं की जाएगी तब तक ये अपराध होते रहेंगे. इस तरह के आर्थिक अपराधों का शिकार होने वाले 99 प्रतिशत लोग शिकायत नहीं दर्ज करा पाते हैं. जो एक प्रतिशत लोग हिम्मत करके शिकायत दर्ज कराते हैं उनमें भी कुछ ठोस कार्रवाई नहीं होती."

गुप्ता कहते हैं, "ठगी में दो चीज़ें इस्तेमाल होती हैं. मोबाइल फ़ोन और बैंक अकाउंट. ये हैरत की बात है कि लोगों को फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों से मोबाइल नंबर भी मिल जाते हैं और बैंक अकाउंट भी."

लोगों के साथ फ़र्ज़ीवाड़ा कर रहे अपराधी अलग-अलग लोकेशन से इन अपराधों को अंजाम देते हैं. वो बैठे कहीं होते हैं, बैंक अकाउंट कहीं और होता है और पैसा पहुँचते ही वो किसी और अकाउंट में ट्रांस्फ़र कर देते हैं.

विराग गुप्ता कहते हैं, "पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ज्यूरिस्डिक्शन की होती है. अपराध कहीं होता है और अपराधी कहीं और होता है. स्थानीय थाने की पुलिस के पास इतने अधिकार ही नहीं हैं कि वो दूर बैठे अपराधी पर त्वरित कार्रवाई कर सकें."

जिन पुलिस अधिकारियों से बीबीसी ने बात की, उन सबका यही कहना था कि सावधानी बरतकर ही इस तरह की ठगी रोकी जा सकती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)