कोरोना से हांफ रहा है पश्चिम बंगाल, कोलकाता की स्थिति गंभीर

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मैं किसी तरह एक एंबुलेंस को 10 हज़ार रुपए देकर तीन दिन पहले अपने भाई को कोलकाता ले आया था. पूरे दिन तमाम सरकारी अस्पतालों का चक्कर लगाने के बावजूद जब कहीं कोई बेड नहीं मिला, तो मैंने एक निजी अस्पताल में उनको दाखिल कराया. लेकिन वहाँ रोजाना क़रीब एक लाख रुपए का बिल भरने की मेरी औकात नहीं थी. उसके बाद मैं उसे घर ले आया और इलाक़े के एक डॉक्टर की सलाह पर घर पर ही ऑक्सीजन देने लगा. लेकिन सिलेंडर का जुगाड़ करना अस्पताल में बेड का जुगाड़ करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है. एक ख़ाली सिलेंडर के लिए 25 हज़ार रुपए मांगे जा रहे हैं."
उत्तर 24-परगना ज़िले के बांग्लादेश से सटे अशोक नगर इलाक़े के मोइनुल इस्लाम जब अपनी आपबीती सुनाते हैं, तो उनके चेहरे पर हताशा और सिस्टम के प्रति नाराज़गी साफ़ नज़र आती है. दरअसल, यह तो महज एक मिसाल है.
पश्चिम बंगाल में जिस तेज़ी से कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा है, वह बेहद चिंताजनक है. ख़ासकर राजधानी कोलकाता और उसके आसपास के इलाक़ों में तो हालात बेहद गंभीर है. आँकड़े ख़ुद अपनी कहानी कहते हैं. रविवार देर रात तक चौबीस घंटों के दौरान क़रीब 16 हजार नए मामले आए और 57 लोगों की मौत हो गई.
इनमें से अकेले कोलकाता में ही चार हज़ार मामले सामने आए हैं. दो सप्ताह पहले जहाँ राज्य में दैनिक संक्रमण 8,398 और मौतों की संख्या औसतन 10 थी, वहीं दो सप्ताह में यह कई गुना बढ़ गई है. पहले रोजाना अगर 100 लोगों की जाँच होती थी, तो एक व्यक्ति पॉजिटिव निकलता था.
यह आँकड़ा पहले 25 फ़ीसदी पहुँचा यानी हर चार में से एक पॉजिटिव. और अब तो यह दर 28.58 फ़ीसदी के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गई है.

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कोलकाता की स्थिति सबसे ख़राब
राजधानी कोलकाता में तो हालत यह है कि जाँच कराने वाला हर दूसरा व्यक्ति कोरोना संक्रमित मिल रहा है. राज्य सरकार के आँकड़ों के मुताबिक़, बीते साल अक्तूबर में जब कोरोना की पहली लहर चरम पर थी, तब भी राज्य में पॉजिटिविटी रेट 9.70 फ़ीसदी ही थी.
सरकारी दावों के बावजूद मरीज़ों को अस्पतालों में न तो बेड मिल रहा है और न ही पर्याप्त इलाज. मरीज़ों की तादाद लगातार बढ़ने की वजह से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराने लगी है.
कोरोना के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने निजी अस्पतालों को कोरोना के मरीज़ों के लिए 60 फ़ीसदी बेड आरक्षित करने की सिफारिश की थी. लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण की तेज़ दर को ध्यान में रखते हुए यह भी काफी नहीं है.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए राज्य सरकार ने 10 ज़िलों के 24 निजी अस्पतालों के 1387 बेडों के अधिग्रहण करने का आदेश जारी किया है.
कोरोना से संक्रमित होकर मुर्शिदाबाद ज़िले की जंगीपुर और शमशेरगंज सीट के संयुक्त मोर्चा उम्मीदवारों की मौत तो पहले ही हो गई थी. अब ताज़ा मामले में उत्तर 24 परगना ज़िले की पानीहाटी सीट, जहाँ 22 अप्रैल को मतदान हुआ, वहाँ के टीएमसी उम्मीदवार काजल सिन्हा की मौत भी इसी संक्रमण की वजह से हो गई है.
कम से कम एक दर्जन उम्मीदवार इसकी चपेट में हैं.

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ख़तरनाक है ये लहर
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर (डॉक्टर) सौगत घोष कहते हैं, "इस बार संक्रमण पहली लहर के मुक़ाबले ज़्यादा ख़तरनाक है. परिवार के एक व्यक्ति के इसकी चपेट में आते ही पूरा परिवार संक्रमित हो जाता है. बीते साल ऐसा देखने को नहीं मिला था. लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि लोग अब भी कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर रहे हैं. अगर इन नियमों का पालन किया गया होता, तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती."
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ के पूर्व निदेशक गिरीश कुमार पांडेय कहते हैं, "चुनाव प्रचार के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने की वजह से तीन-तीन उम्मीदवारों की मौत की बात तो सब जानते हैं. लेकिन उन रैलियों में होने वाली लापरवाही की वजह से कितने लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है, इसका कोई ठोस आँकड़ा नहीं है. लेकिन यह तादाद हज़ारों में है. लेकिन अब भी कुछ लोग कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रहे हैं."
राज्य में फ़िलहाल ऑक्सीजन की किल्लत तो में नहीं है. लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ख़ाली सिलेंडरों का भारी अभाव है. लोग आतंकित होकर मुंह मांगी क़ीमत पर सिलेंडर ख़रीद कर अपने घर में स्टॉक कर रहे हैं.

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ख़ाली सिलेंडरों के लिए मारामारी
नतीजतन ऐसे ख़ाली सिलेंडर 25 से 40 हज़ार रुपए तक में बिक रहे हैं. सिलेंडर की कमी होने की वजह से यह मेडिकल ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में अस्पतालों तक नहीं पहुँच रही है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर बंगाल के ऑक्सीजन को उत्तर प्रदेश भेजने का आरोप लगाते हुए कहा है कि यहाँ तैयार होने वाले ऑक्सीजन को पहले राज्य में ही इस्तेमाल करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
सिलेंडरों की कालाबाज़ारी पर अंकुश लगाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अब बिना डॉक्टर की पर्ची के इनकी बिक्री पर रोक लगा दी है.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, "राज्य में फ़िलहाल रोज़ाना 450 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन होता है, जबकि मांग क़रीब 300 मीट्रिक टन ही है. बावजूद इसके ख़ाली सिलेंडरों की कमी के कारण अस्पतालों को पर्याप्त मात्रा में इसकी सप्लाई नहीं हो पा रही है."
इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी आरोप-प्रत्यारोप में उलझी है.
लेकिन आम लोग चक्की के दो पाटों के बीच पिसने पर मजबूर हैं. दो दिन पहले कोरोना के दो मरीज़ों की घर में मौत के बाद नौ घंटे तक उनके शव घर में ही पड़े रहे. बाद में नगर निगम के लोग ने वहाँ से शवों को हटाया.

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रिपोर्ट के लिए लंबा इंतज़ार
संक्रमितों की बढ़ती तादाद से एक समस्या और पैदा हो गई है. अब रोजाना इतने लोग कोरोना की जाँच के लिए सामने आ रहे हैं कि उनको रिपोर्ट के लिए एक-एक सप्ताह का इंतज़ार करना पड़ रहा है.
महामारी विशेषज्ञ प्रोफेसर निर्मल घोष बताते हैं, "इससे समस्या यह हो रही है कि रिपोर्ट नहीं आने तक कोई भी अस्पताल ऐसे मरीज़ों को भर्ती नहीं करता और तब तक यह लोग न जाने और कितने लोगों तक संक्रमण फैला रहे हैं. कई मामलों में तो इसी वजह से शवों के अंतिम संस्कार में भी देरी हो रही है."
स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आशंका है कि कोरोना संक्रमण के वास्तविक आँकड़े कहीं ज़्यादा हो सकते हैं.
कई बिना लक्षणों या कम लक्षणों वाले मरीज़ अपनी जाँच नहीं करा रहे हैं. राज्य में टेस्टिंग भी संतोषजनक नहीं हो रही है, जबकि टेस्टिंग ही कोरोना को रोकने का सबसे कारगर उपाय माना जाता है.
मेडिका सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल समूह के अध्यक्ष और न्यूक्लियर कार्डियोलॉजिस्ट आलोक रॉय बताते हैं कि टेस्टिंग लैब में अचानक पॉजिटिविटी रेट 50 फ़ीसदी तक बढ़ गई है. ऐसे में सैंपल की जाँच का दबाव बहुत ज़्यादा है. इसी वजह से रिपोर्ट मिलने में देरी हो रही है.

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सियासी रस्साकशी
पहले चुनावों को लंबा खींचने और उसकी वजह से संक्रमण बढ़ने के मुद्दे पर टीएमसी और बीजेपी में तकरार होती रही है. ममता ने तेज़ी से बढ़ते संक्रमण के लिए आठ चरणों में चुनाव को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इसके लिए बीजेपी और चुनाव आयोग पर निशाना साधती रहीं.
लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "सरकार कोरोना प्रबंधन में बीते साल भी नाकाम रही थी और इस साल भी फ़ेल है. राज्य में स्वास्थ्य का आधारभूत ढाँचा ही ढह गया है. नतीजतन मौतों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है."
एक अन्य महामारी विशेषज्ञ अनिर्वाण दलुई कहते हैं, "यह आरोप-प्रत्यारोप का नहीं बल्कि मिल कर महामारी का मुक़ाबला करने का वक़्त है. इसके साथ ही लोगों को सख़्ती से कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना होगा. इसके बिना तेज़ी से बढ़ते संक्रमण पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा."
अब बीते सप्ताह से पुलिस ने मास्क नहीं पहनने वालो के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू की है.
लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शुरू से ही चुनावी रैलियों, रोड शो और पदयात्राओं में कोविड प्रोटोकॉल को सख़्ती से लागू किया गया होता, तो हालात इतने नहीं बिगड़ते.
उत्तर बंगाल के एक निजी अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टर मनोजित भट्टाचार्य कहते हैं, "तीन-तीन उम्मीदवारों की मौत और दर्जनों उम्मीदवारों और नेताओं का संक्रमित होना इस बात का सबूत है कि बंगाल में संक्रमण बढ़ाने में चुनावी रैलियों और रोड शो का बहुत बड़ा हाथ है."
अब भी 29 अप्रैल को आख़िरी चरण का मतदान होना है. कई विशेषज्ञों ने पहले ही चेताया था कि अगर चुनावी रैलियों पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो मई में बंगाल में विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है. दोलुई कहते हैं कि अब वह चेतावनी सच साबित हो रही है.
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