केरल विधानसभा चुनाव: मोदी और अमित शाह बीजेपी को कितनी सीटें दिलवा पाएँगे

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तिरुवनंतपुरम, केरल
केरल भर में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के लगे चुनावी पोस्टर, बड़े और ऊँचे कटआउट्स और दीवारों पर पेंट किए नेताओं के चेहरे अगर अच्छे प्रदर्शन के संकेत हैं, तो बीजेपी को इस विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करके दिखाना चाहिए.
केरल कई जगह भगवा रंग में रंगा दिखता है. सत्तारूढ़ लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट के झंडे और पोस्टर बीजेपी के मुक़ाबले कम दिखाई देते हैं. लेकिन इन सबके बीच फ़िलहाल वाम मोर्चा मज़बूत दिखाई देता है. भले ही उनकी सीटें कुछ कम हो जाएँ. साथ ही मुक़ाबला एलडीएफ़ और यूडीएफ़ के बीच ही नज़र आता है.
बीजेपी केरल विधानसभा चुनाव में अपना सिक्का जमाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है. दिल्ली से पार्टी के कई बड़े नेता रैलियों में शामिल हो रहे हैं और स्थानीय नेताओं का मनोबल बढ़ा रहे हैं. लेकिन राज्य में पार्टी के नेता जानते हैं कि केरल में चुनाव जीतना और सरकार बनाना फ़िलहाल संभव नहीं है.
नेमम के नतीजे पार्टी के भविष्य से जुड़े हैं
कांग्रेस के नेता शशि थरूर 2019 का लोकसभा चुनाव तिरुवनंतपुरम से जीते थे. लेकिन इस लोकसभा सीट में नेमम विधानसभा चुनावी क्षेत्र से उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी से 12,000 वोट कम पड़े थे.
लगभग दो लाख वोटरों के साथ नेमम केरल में बीजेपी का गढ़ माना जाने लगा है. 2016 में पार्टी के वरिष्ठ नेता ओ राजगोपाल यहाँ से विजयी हुए थे. इनका नाम पार्टी के इतिहास में सुनहरे शब्दों में लिखा जाएगा क्योंकि केरल विधान सभा के इतिहास में वो पार्टी के अब तक के अकेले निर्वाचित विधायक हैं.

ओ. राजगोपाल को इस कामयाबी के लिए वर्षों इंतज़ार करना पड़ा था. वो कहते हैं, "राजनीति संभावनाओं की एक कला है."
मज़ाक़ के अंदाज़ में वो बोले कि जनता ने रहम खाकर उन्हें चुन लिया, "मैंने इतनी बार चुनाव लड़ा कि मैं लोगों में परिचित हो चुका था. लोगों ने मेरे प्रति सहानुभूति महसूस की. उन्होंने कहा कि बेचारा चुनाव लड़ता ही जा रहा है तो उसे एक मौक़ा दे दो."
लेकिन फिर वो गंभीर अंदाज़ में कहते हैं, "मोदी के पीएम बनने के बाद बीजेपी ख़ासतौर से यहाँ आगे बढ़ रही है."
ओ. राजगोपाल अब 93 वर्ष के हैं और इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. लेकिन वो अभी भी पार्टी के मार्गदर्शक मंडली में शामिल होने को तैयार नहीं. वो पूरी तरह से स्वस्थ हैं और अपने साथी और नेमम से पार्टी के उम्मीदवार कुम्मनम राजशेखरन के लिए दिन-रात चुनावी प्रचार कर रहे हैं.

नेमम के एक पब्लिक पार्क में ऐसे ही एक प्रचार में मैंने देखा कि दोपहर की कड़ी धूप में वो कुम्मनम राजशेखरन के साथ मंच पर देर तक बैठे रहे. थोड़ी देर तक जनता को संबोधित भी किया और उनसे अपने साथी को वोट देने की अपील की. इस सभा में आम जनता से अधिक पार्टी कार्यकर्ता उपस्थित थे. लेकिन कार्यकर्ताओं में ज़बरदस्त उत्साह था.
क्या कहते हैं बीजेपी समर्थक
राजू नामी पेशे से एक ड्राइवर हैं. वो बीजेपी के समर्थक हैं. वे कहते हैं कि वो बीजेपी को तीसरी शक्ति के रूप में उभरते देखना चाहते हैं और इसी कारण वो बीजेपी का समर्थन करते हैं.
वो कहते हैं, "मेरा पूरा परिवार एलडीएफ़ को आँख बंद करके वोट देता है. केरल में लोग बीजेपी और एनडीए को बिल्कुल पसंद नहीं करते. लेकिन मैं एलडीएफ़ और यूडीएफ़ दोनों से तंग आ गया था. एक बार एलडीएफ़ सत्ता में आती है, तो दूसरी बार यूडीएफ़. किसी तीसरे पक्ष को अवसर ही नहीं मिलता. मैं इन दोनों की सियासत से तंग आ गया था, इसीलिए मैंने घर वालों से बग़ावत करके बीजेपी को सपोर्ट करना शुरू कर दिया."
नेमम विधानसभा क्षेत्र घनी आबादी वाला शहर है और यहाँ की जनता शत प्रतिशत शिक्षित है. केरल में हिंदू समुदाय की आबादी 55 प्रतिशत है, लेकिन नेमम में 66 प्रतिशत. यहाँ के लोग बीजेपी के उम्मीदवार राजशेखरन को जानते हैं.

राजशेखरन मिज़ोरम के राज्यपाल रह चुके हैं और लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं. ओ राजगोपाल कहते हैं, "वो वोटरों में लोकप्रिय हैं और बहुत अनुभवी भी."
बीजेपी के स्थानीय नेता मानते हैं कि नेमम से कुम्मनम राजशेखरन का जीतना और पार्टी के लिए सीट को दोबारा हासिल करना पार्टी के भविष्य के लिए बहुत ज़रूरी है. राजशेखरन के प्रचार से जुड़े एम राधाकृष्णन आरएसएस से भेजे गए हैं.
वो स्वीकार करते हैं कि नेमम इस बार बीजेपी के लिए न केवल प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है, बल्कि राज्य में अपने भविष्य का भी. नेमम में चुनावी मुक़ाबले का नतीजा ये फ़ैसला कर सकता है कि राज्य में पार्टी का विस्तार कितना संभव है.
इसीलिए विरोधी पार्टियाँ इस कोशिश में हैं कि यहाँ से इस बार कमल खिलने ना पाए. नेमम के पड़ोस वाले चुनावी क्षेत्र कोवलम से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार और विधायक एम विन्सेंट कहते हैं कि उनकी पार्टी नेमम पर ख़ास ध्यान दे रही है.

वो कहते हैं, "कांग्रेस का उम्मीदवार बहुत मज़बूत उम्मीदवार है. वे बहुत लोकप्रिय नेता हैं और हम इस निर्वाचन क्षेत्र को अधिक महत्व दे रहे हैं. इसलिए हमने के मुरलीधरन को वहाँ से खड़ा किया है और हमें यक़ीन है कि हम जीतेंगे."
के. मुरलीधरन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण के बेटे हैं और भीड़ जुटाने में माहिर माने जाते हैं. केरल कांग्रेस में उनका क़द काफ़ी ऊँचा है.
इसी तरह सत्तारूढ़ एलडीएफ़ ने पार्टी के मज़बूत नेता वी शिवंकुट्टी को मैदान में एक बार फिर उतारा है, जिन्होंने 2016 के चुनाव में बीजेपी के राजगोपाल से हारने से पहले 2011 में नेमम का प्रतिनिधित्व किया था.

बीजेपी की ज़मीनी हक़ीक़त
पश्चिम बंगाल की तरह बीजेपी ने केरल में जीत के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया है. गृह मंत्री अमित शाह राज्य में कई चुनावी रैलियाँ की हैं और आगे कई रैलियाँ करने वाले हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय नेता केरल में भाजपा की जीत का दावा कर रहे हैं. लेकिन पार्टी के राज्य स्तर के नेता ज़मीनी हक़ीक़त से मुँह नहीं मोड़ सकते.
ओ. राजगोपाल कहते हैं, "मेरा आकलन है कि हम दोहरे अंक को पार कर लेंगे. 10 से अधिक सीटें आएँगी. ये पार्टी के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होगा. पार्टी के समर्थकों का विश्वास बढ़ेगा कि उनकी पार्टी आगे बढ़ रही है."
विरोधी पार्टियाँ कहती हैं कि भाजपा वाले नेमम सीट को ही बचा लें, तो ये उनकी एक बड़ी उपलब्धि होगी. लेकिन विशेषज्ञ कहते कि बीजेपी को भले ही सीटें अधिक न मिलें, लेकिन पार्टी का वोट शेयर ज़रूर बढ़ेगा.
डॉक्टर जे प्रभाष केरल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रो वाइस चांसलर हैं, वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि इस बार उन्हें विश्वसनीय संख्या में सीटें मिलेंगी. भले ही पिछले विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदान प्रतिशत बढ़ने की संभावना है. उन्हें कुछ सीटें मिलेंगी, ये भी मुश्किल लगता है."
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केरल में 140 सीटों वाली विधानसभा के लिए 6 अप्रैल को मतदान है. विशेषज्ञ कहते हैं कि बीजेपी की कोशिशों के बावजूद पिछले चुनावों की तरह इस बार भी परंपरागत रूप से वाम दलों के नेतृत्व वाले एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ़ के बीच सीधा मुक़ाबला होगा. ये दोनों गुट बारी-बारी से केरल में चुनाव जीतते आ रहे हैं, लड़ाई हमेशा दो तरफ़ा रही है.
लेकिन विशेषज्ञ ये स्वीकार करते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के 15 प्रतिशत से अधिक हासिल किए वोट शेयर को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. इसके अलावा नौ सीटों में पार्टी को 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे. कुछ महीने पहले हुए स्थानीय चुनाव में भी पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया था.
नेमम से बीजेपी के उम्मीदवार कुम्मनम राजशेखरन कहते हैं, "पिछले स्थानीय चुनाव में हमने लगभग 18 पंचायतों में जीत हासिल की है. हम दो नगरपालिकाओं में शासन कर रहे हैं. इसलिए हमने पिछले स्थानीय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है. हमारा वोट शेयर 15 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया है. इस चुनाव में हम अच्छा करेंगे और केरल में एक निर्णायक शक्ति बनेंगे."
बीजेपी ने ईसाई समुदाय को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की भी मदद ली है. आरएसएस और बीजेपी के नेता कई बार ईसाइयों के धार्मिक नेताओं से मिले हैं. लेकिन राज्य में पार्टी कितना आगे बढ़ेगी, ये निर्भर करेगा इस विधानसभा चुनाव के नतीजों पर.
राज्य में बीजेपी का भविष्य कांग्रेस से जुड़ा है?

एशियानेट न्यूज़ नेटवर्क के मुख्य संपादक एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, "आने वाला चुनाव कांग्रेस के लिए वामपंथ से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है. अगर कांग्रेस हार गई या यूडीएफ़ हार गया, तो जो कुछ भी उस पार्टी के साथ देश में और राज्यों में हो रहा है और वो है कई नेताओं का भाजपा से जुड़ना, वो केरल में भी हो सकता है, क्योंकि कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने की कोई उम्मीद नहीं है और अगर केरल में भी ऐसा होता है, तो केवल कमिटेड समर्थक पार्टी में रह जाएँगे, हो सकता है कि बड़े पैमाने पर मध्य स्तर के नेता और कुछ हद तक बड़े नेता संघ विचारधारा से जुड़ जाएँ."
केरल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रो वाइस चांसलर, डॉक्टर जे प्रभाष की राय में भी बीजेपी का केरल में भविष्य कांग्रेस के चुनाव में प्रदर्शन से जुड़ा है.

वे कहते हैं, "क्या बीजेपी या एनडीए निकट भविष्य में केरल की राजनीति में अहम भूमिका निभा पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस चुनाव में कैसा प्रदर्शन करती है. अगर कांग्रेस हार जाती है, तो कांग्रेस पार्टी के विघटन की संभावना है, क्योंकि कांग्रेस सत्ता से दूर रहने के झटके को झेल नहीं सकती."
ऐसा लगता है कि इस चुनाव में बीजेपी का ज़ोर केवल वोट शेयर बढ़ाने पर ही होगा और पार्टी को ये उम्मीद होगी कि कांग्रेस की शिकस्त हो.
जानकार ये भी कहते हैं कि हो सकता है कि एलडीएफ़ इस बार भी राज्य में सरकार बना ले, लेकिन उसकी सीटें पिछली बार की तुलना में कम हो सकती हैं.
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