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रितिका: गीता और बबीता फोगाट की ममेरी बहन ने की आत्महत्या
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
गीता और बबीता फोगाट की ममेरी बहन रितिका ने आत्महत्या कर ली है. रितिका भी कुश्ती की खिलाड़ी थीं और आत्महत्या से एक दिन पहले ही उन्होंने एक राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. उन्होंने 15 मार्च को बैलाली गांव में महावीर फोगाट के ही घर पर आत्महत्या कर ली. वह अपने फूफा और पहलवान महावीर फोगाट के पास ही कुश्ती सीख रही थीं.
आत्महत्या का मामला जोझु पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ है.
जोझु पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिलबाग सिंह ने बताया, “रितिका भरतपुर में एक राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेने गई थीं और एक प्वाइंट से हार गई थीं. वो इस हार से बहुत दुखी थीं. कुश्ती प्रतियोगिता से वापस आने के बाद उन्होंने बैलाली गाँव में अपनी बुआ के घर पर ही आत्महत्या कर ली.”
उन्होंने कहा, “फ़िलहाल आत्महत्या की यही वजह नज़र आ रही है. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने वाली है जिसके बाद कुछ और जानकारी मिलेगी.”
चार साल से महावीर के पास रहकर की तैयारी
17 साल की रितिका चार साल से महावीर फोगाट से ही कुश्ती सीख रही थीं और उन्हीं के घर पर रहती थीं.
भरतपुर में हो रही प्रतियोगिता में भी महावीर फोगाट उनके साथ गए थे. ये प्रतियोगिता 12 से 14 मार्च के बीच होनी थी. दोनों 15 मार्च को वापस गाँव लौटे थे.
महावीर फोगाट बताते हैं, “15 मार्च को हम दिन में राजस्थान से वापस आए और फिर वो अपने कमरे में सोने चली गई. हमने भी सोचा कि थककर आई है, तो उसे कोई जगाए नहीं. शाम को क़रीब साढ़े सात बजे जब उसकी बुआ ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया, तो उसने कोई जवाब नहीं दिया. काफ़ी देर तक वो दरवाज़ा खोलने के लिए बोलती रही.”
“लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया तो ऊपर रोशनदान से झांककर देखा. इसके बाद मुझे पता चला कि उसने आत्महत्या कर ली है. फिर हमने उसके पिता और पुलिस को जानकारी दी.”
रितिका राजस्थान की रहने वाली थीं. उनके घर में माता-पिता और तीन बहने और दो भाई हैं. 16 मार्च को उनका अंतिम संस्कार किया गया.
गोल्ड मेडल लाना चाहती थीं
फोगाट परिवार कुश्ती की दुनिया में जाना-माना नाम है. महावीर फोगाट ख़ुद एक बड़े कुश्ती खिलाड़ी रहे हैं.
वे सीनियर ओलंपिक्स कोच हैं और उन्हें भारत सरकार ने साल 2016 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया था.
उनकी बेटियाँ गीता और बबीता फोगाट ने भी कुश्ती में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं.
गीता फोगाट कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं और ओलंपिक समर गेम्स के लिए चुनी जाने वालीं पहली भारतीय महिला कुश्ती खिलाड़ी भी रही हैं.
बबीता फोगाट कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 और 2018 में रजत पदक जीत चुकी हैं. उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी में शामिल होकर राजनीति में भी क़दम रखा था.
उनकी छोटी बहन रितु फोगाट एक पेशेवर मिश्रित मार्शल आर्ट फ़ाइटर हैं. वहीं, उनकी चचेरी बहन विनेश फोगट कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं.
फोगाट परिवार पर 'दंगल' फ़िल्म भी बन चुकी है, जिसमें अभिनेता आमिर ख़ान ने महावीर सिंह फोगाट की भूमिका निभाई थी.
पहलवानों के परिवार में ही जन्मीं रितिका भी कुश्ती में एक मुक़ाम हासिल करना चाहती थीं. उन्होंने नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीतने के सपने देखे थे.
महावीर सिंह बताते हैं कि रितिका पिछले साल नेशनल लेवल पर खेली थीं. इस बार भी अगर स्टेट लेवल पर जीततीं तो नेशनल लेवल पर पहुँच जातीं.
इस बार वे नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीतना चाहती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें इसका सदम लगा.
महावीर कहते हैं कि आख़िरी समय पर तो उससे कोई बात नहीं हुई, लेकिन जैसे बच्चे स्कूल में हर जगह बोल देते हैं कि वो गोल्ड मेडल लाएँगे, वैसे ही रितिका भी बोला करती थी.
गीता फोगाट ने किया याद
गीता फोगाट ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर रितिका की एक तस्वीर डालकर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है.
उन्होंने लिखा है, “भगवान मेरी छोटी बहन मेरे मामा की लड़की रितिका की आत्मा को शांति दे. मेरे परिवार के लिए बहुत ही दुख की घड़ी है. रितिका बहुत ही होनहार पहलवान थी पता नहीं क्यों उसने ऐसा क़दम उठाया. हार-जीत खिलाड़ी के जीवन का हिस्सा होता है, हमें ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए.”
केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने भी रितिका की मौत पर दुख जताया और ट्वीट किया, “यह बहुत ही भयानक ख़बर है कि हमने रितिका को खो दिया जिनका आगे बेहतरीन करियर था. दुनिया दशकों पहले जहाँ थी, वहाँ से बदल चुकी है. एथलीट्स दबाव का सामना कर रहे हैं जो कि पहले नहीं था. इस दबाव को कैसे संभालें, ये उनकी ट्रेनिंग का अहम हिस्सा होना चाहिए.”
आत्महत्या के मामलों पर क्या कहते हैं डॉक्टर
देश में अक्सर आत्महत्या के मामले सामने आते रहते हैं. आम लोग से लेकर सेलिब्रिटी तक के नाम इसमें शामिल होते हैं.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो एक आंकड़े के मुताबिक साल 2019 में भारत में 1,39,123 लोगों ने आत्महत्या की थी. इनमें 18 से 30 साल की उम्र के 48763 लोग थे. 18 साल से कम उम्र के 9613 लोगों ने आत्महत्या की थी.
पिछले साल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में छाया रहा. हाल ही में गुजरात में एक लड़की ने अपनी शादी की परेशानियों के चलते आत्महत्या कर ली.
बोर्ड की परीक्षाओं के बाद बच्चों के आत्महत्या करने की ख़बरें भी आती हैं. रितिका भी महज 17 साल की थीं और उनके सामने पूरा भविष्य था. उन्हें आगे भी कई और मौके मिल सकते थे.
आखिर सामान्य जीवन जी रहा कोई व्यक्ति आत्महत्या के खयाल तक कैसे पहुंचता है और ऐसी स्थितियों में क्या किया जाना चाहिए.
सफ़दरजंग अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज कुमार कहते हैं, "डिप्रेशन और आत्महत्या का खयाल किसी स्थिति को लेकर आपकी प्रतिक्रिया से जुड़ा है. हर किसी का स्वभाव और व्यक्तित्व अलग होता है. स्वभाव जन्म से ही तय होता है और जब हम आसपास के माहौल से सीखते हैं तो हमारा एक व्यक्तित्व तैयार होता है. आप जीवन में होने वाली घटनाओं पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं और विभिन्न स्थितियों, आलोचना व असफलता को कैसे संभालते हैं ये आपके स्वभाव और व्यक्तित्व पर निर्भर करता है."
बच्चों की बात करें तो 12 से 19 साल तक की किशोरावस्था व्यक्तित्व निर्माण का समय होता है जो लगभग तय करता है कि आप किस तरह के इंसान बनेंगे. इन सालों में दिमाग में भी कुछ बदलाव आ रहे होते हैं. इस वक़्त दिमाग विकसित हो रहा होता.
डॉक्टर पंकज कहते हैं कि ऐसे में सकारात्मक माहौल मिलना और बच्चे के व्यवहार पर ध्यान देना ज़रूरी है. कुछ बच्चे या बड़े खुद से सोच लेते हैं कि एक हार से कोई बात नहीं अगली बार जीत लेंगे लेकिन कुछ लोग उस हार को ही सबकुछ मान बैठते हैं. उन्हें दूसरों का सामना करने और उनके सवालों का जवाब देने में डर लगता है. धीरे-धीरे वो मान लेते कि उनके जीवन में कुछ नहीं बचा है.
कुछ लोग धीरे-धीरे अवसाद की ओर बढ़ते हैं. उन्हें आत्महत्या के खयाल आते हैं. लगता है कि ज़िंदगी में कुछ बचा ही नहीं है और उनकी कोई मदद नहीं कर सकता. इसे आप उनके व्यवहार और बातचीत से समझ सकते हैं. बहुत समय तक किसी वयक्ति को इस स्थिति में छोड़ना ठीक नहीं. उन्हें डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
आवेगशील व्यवहार
डॉक्टर पंकज बताते हैं कि बहुत बार लोग आवेगशील (इंपल्सिव) होते हैं जो एकदम से कोई विचार आने पर उस पर एक्ट कर बैठते हैं. वो तुरंत सोच लेते हैं कि असफलता बहुत बड़ी है और आगे कुछ नहीं बचा. ऐसे में खुद को नुक़सान भी पहुंचा लेते हैं. बाद में भले ही उन्हें बुरा भी लगता है कि ये क्या कर लिया.
आवेगशील व्यवहार की बात करें तो इसे भी थोड़ा ध्यान देकर भांपा जा सकता है. इस तरह के लोग बहुत जल्दी फैसले ले लेते हैं. जैसे हम पैन खरीदने के लिए पांच मिनट में फैसला कर सकते हैं लेकिन घर खरीदने और शादी करने जैसे फैसले लेने में समय लेंगे. लेकिन, आवेगशील लोग बिना सोचे-समझे भी बड़े-बड़े फैसले कर लेते हैं. ये छोटी से लेकर बड़ी चीजों में एकदम से एक्शन ले लेते हैं और ये जोखिम भरा व्यवहार है.
किन बातों का ध्यान दें-
- अपने बच्चे या अन्य परिजनों के व्यवहार पर ध्यान दें.
- अगर आपको व्यवहार में कुछ समस्या दिख रही है तो मुश्किल समय में उन्हें अकेला ना छोड़ें. बात करें, मन कि स्थिति को जानें और सकारात्मक दिशा में ले जाने की कोशिश करें.
- अगर लगता है कि आप किसी स्थिति से नहीं निकल पा रहे हैं या आपका परिजन लगातार अवसाद में है तब डॉक्टर से ज़रूर संपर्क करें.
- इस बात का ध्यान रखें कि एक दिन, एक बार किसी प्रतियोगिता या परीक्षा में असफलता मिलने का मतलब ये नहीं होता कि आप में कमी है या ये हार ज़िंदगी भर के लिए है. आगे बढ़ने का रास्ता बदल सकता है लेकिन ख़त्म नहीं हो सकता.
- खिलाड़ियों के संदर्भ में बात करें तो उनकी तैयारी के समय मनोवैज्ञानिक पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए. जो लोग लगातार प्रतियोगी माहौल में रहते हैं उन्हें तनाव होना स्वाभाविक है. उन्हें हमेशा एक लक्ष्य के लिए काम करना होता है. ऐसे में उन्हें असफलता से निपटना भी सीखाना ज़रूरी है.
- अपने बच्चों को अच्छा रिजल्ट लाने और जीतने के लिए ज़रूर प्रोत्साहित करें लेकिन घर में इस पर भी बात ज़रूर होनी चाहिए कि अगर असफल हुए तो क्या होगा. उन्हें बताएं कि हार अंत नहीं होता.
- साथ ही अपनी हॉबीज़ को भी पूरा करें. जैसे अगर कोई परीक्षा के लिए पढ़ाई कर रहा है तो खेल-कूद और मनोरंजन के लिए भी समय निकाले. अगर आप खेलों में या मनोरंज के क्षेत्र में हैं तो दूसरे कामों के लिए समय निकलें और अपनी हॉबीज़ पूरी करें.
यदि आप अवसाद में हैं या किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो अवसाद से जूझ रहा है, तो इन हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: 91-9152987821, 91-9820466726, 1800 233 3330, +918376804102.
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