पश्चिम बंगाल चुनावः क्या मुस्लिम बहुल मालदा से छिन रही है ग़नी ख़ान की विरासत?

मालदा

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए, मालदा (पश्चिम बंगाल) से

"मालदा में ग़नी ख़ान का असर कुछ कम ज़रूर हुआ है. लेकिन अब भी तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनका सम्मान करते हैं. सच तो ये है कि मालदा में ग़नी ख़ान के बाद कोई ऐसा नेता नहीं हुआ जो यहाँ काँग्रेस को एकजुट रख सके. अब सब कुछ कोलकाता से ही तय होता है कि कौन नेता बनेगा और कौन नहीं. ग़नी ख़ान के बाद दूसरा कोई स्वीकार्य नेता पैदा नहीं हुआ."

क़रीब सौ साल पुरानी संस्था मालदा मुस्लिम इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष मोहम्मद अब्दुर रफ़ीक़ इन पाँच वाक्यों में मालदा की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर बयां करते हैं.

मोहम्मद अब्दुर रफ़ीक़

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पाँच दशक से भी लंबे अरसे से पूर्व काँग्रेसी दिग्गज एबीए ग़नी ख़ान चौधरी मालदा में काँग्रेस का पर्याय बने हुए हैं. मौत के इतने बरसों बाद उनका असर कुछ कम ज़रूर हुआ है. लेकिन ज़िले में उनका असर अब भी साफ़ नज़र आता है.

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की सीमा से सटे मालदा का नाम लेते ही मन में जिस पहली चीज़ का ख्याल आता है वह है यहाँ के आम. मालदा के आम अपनी मिठास और ख़ासियतों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं और इनका बड़े पैमाने पर निर्यात भी किया जाता है. इसके अलावा कुछ अन्य चीजें भी इस ज़िले की पहचान से जुड़ी हैं.

इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री एबीए ग़नी ख़ान चौधरी उर्फ़ बरकत दा शामिल हैं.

सीमा पार से होने वाली घुसपैठ, तस्करी और नक़ली नोटों के कारोबार के केंद्र के तौर पर भी यह ज़िला अक्सर सुर्ख़ियां बटोरता रहा है.

मालदा के आम अपनी मिठास और खासियतों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं

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अब जब बीते एक दशक के दौरान का सबसे अहम विधानसभा चुनाव हो रहा है तो यहाँ ग़नी ख़ान और उनकी विरासत एक बार फिर चर्चा में है.

अस्सी और नब्बे के दशक में ग़नी ख़ान और मालदा को एक-दूसरे का पर्याय माना जाता था. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि वे अकेले ऐसे नेता थे जो पूरे ज़िले में विकास का प्रतीक बन गए थे. लेकिन उनके निधन के बाद काँग्रेस का वैसा जलवा नहीं रहा.

कभी ग़नी ख़ान की कही बात पार्टी में पत्थर की लकीर साबित होती थी. लेकिन उनके निधन के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई में काँग्रेस की यह विरासत बिखरने लगी है.

हालाँकि काँग्रेस के नेताओं समेत कई लोग ऐसा नहीं मानते. लेकिन अपनी कोई संतान नहीं होने की वजह से भाइयों और परिजनों के बीच ख़ुद को ग़नी ख़ान का असली उत्तराधिकारी साबित करने की लड़ाई ने राज्य में पार्टी के सबसे मज़बूत गढ़ रहे मालदा में पार्टी को नुक़सान ही पहुँचाया है.

इसी वजह से बीते विधानसभा चुनाव में पार्टी एक सीट पर बीजेपी से हार गई थी.

कहा जाता है कि मालदा अपने अतीत में जीना पसंद करता है और यह बात अब भी लागू होती है.

ग़नी ख़ान पहली बार 1957 में विधायक बने थे और उसके बाद 1980 तक वह लगातार सात बार यहाँ से लोकसभा का चुनाव जीते थे.

मालदा इंस्टीट्यूट

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मालदा सीट पर वर्तमान राजनीतिक समीकरण

मालदा में पिछले विधानसभा चुनावों में लेफ्ट के साथ तालमेल के तहत पार्टी ने 12 में से नौ सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे. लेकिन एक सीट पर उसे बीजेपी से मुँह की खानी पड़ी. इस बार भी पार्टी नौ सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

2016 में काँग्रेस ने ज़िले की आठ सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को दो सीटें मिली थीं. इनमें एक आरक्षित सीट भी थी, जहाँ हिंदू-मुस्लिम आबादी बराबर है.

बीते लोकसभा चुनावों में मालदा उत्तर की सीट पर बीजेपी के खगेन मुर्मू जीते थे जो कुछ दिनों पहले ही सीपीएम छोड़कर बीजेपी में आए थे. बीजेपी की उस जीत के लिए गनी ख़ान परिवार की आपसी फूट को ज़िम्मेदार माना जाता है.

दरअसल, 2014 में काँग्रेस के टिकट पर जीतीं मौसम नूर ने पिछला चुनाव टीएमसी के टिकट पर लड़ा था. यहाँ बीजेपी को तब 5.09 लाख वोट मिले थे. जबकि टीएमसी को 4.25 लाख और काँग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे ग़नी ख़ान के भतीजे ईशा ख़ान चौधरी को 3.05 लाख वोट मिले थे.

मालदा शहर

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आंकड़ों से साफ़ है कि वोट बंटने की वजह से ही बीजेपी को यहाँ जीतने में कामयाबी मिली थी.

2009 तक यहाँ लोकसभा की एक सीट थी जो परिसीमन के बाद दो-मालदा नार्थ और मालदा साउथ हो गई.

ईशा ख़ान कहते हैं, "ग़नी ख़ान की विरासत के साथ विश्वासघात की वजह से ही बीजेपी को यहाँ पांव जमाने का मौक़ा मिला. मौसम नूर ने ऐसा कर पार्टी को नुक़सान पहुँचाया है. लेकिन मौसम नूर की दलील है कि बीजेपी को रोकने के लिए उन्होंने टीएमसी का दामन थामा था. राज्य में वही अकेली पार्टी है जो बीजेपी का मुक़ाबला करने में सक्षम है."

ग़नी ख़ान की विरास के लिए जिन दो लोगों में जंग है उनमें से एक मौसम नूर हैं और दूसरी ओर ग़नी ख़ान के भाई और भतीजे हैं. अस्सी के दशक से 2014 तक यहाँ ग़नी ख़ान के परिवार का ही कोई सदस्य जीतता रहा था.

पीएम तिवारी

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10 साल हुकूमत के बावजूद टीएमसी नहीं जीत सकी एक भी सीट

ग़नी ख़ान के निधन के बाद काँग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता पार्टी में भले शामिल हो गए हों, टीएमसी अब तक ज़िले में अपनी पैठ नहीं बना सकी है. दरअसल, वह अब तक ग़नी ख़ान के तिलस्म को तोड़ने में कामयाब नहीं हो सकी है. यही वजह है कि 2014 में चुनाव जीतने वाली मौसम नूर को पार्टी बदलने का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ा.

बीते लोकसभा चुनावों में टीएमसी के टिकट पर मैदान में उतरने वाली पूर्व काँग्रेस सांसद मौसम नूर की पराजय से साफ़ है कि ज़िले के लोग ग़नी ख़ान की विरासत से छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ हैं.

ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि नूर ने बरकत दा की विरासत के साथ विश्वासघात किया था और उनको अपनी हार से इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी. स्थानीय नेता अब भी मालदा नार्थ सीट पर बीजेपी की जीत के लिए मौसम नूर के (टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड़ने के) ग़लत फ़ैसले को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

यहाँ इस बात का ज़िक़्र प्रासंगिक है कि अपनी तमाम कोशिशों और दस साल से सत्ता में रहने के बावजूद टीएमसी ज़िले में कभी लोकसभा या विधानसभा की एक सीट भी नहीं जीत सकी है.

अब चुनावों के मौक़े पर यहाँ एक बार फिर ग़नी ख़ान और उनके असर पर चर्चा तेज़ होने लगी है. राजनीतिक हलक़ों में सवाल उठ रहा है कि क्या इन चुनावों पर भी ग़नी ख़ान की छाया रहेगी?

क्या काँग्रेस सिर्फ़ ग़नी ख़ान के नाम और विरासत के आधार पर ही लेफ़्ट के साथ तालमेल के तहत मिली ज़िले की नौ सीटों पर जीत के दावे कर रही है?

मोहम्मद अली

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क्या पहले से कम हो रहा है ग़नी ख़ान का असर?

मुर्शिदाबाद के पूर्व काँग्रेस नेता और अब टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले मोहम्मद अली बताते हैं, "किसी दौर में मालदा की राजनीति और ग़नी ख़ान एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. अगर ग़नी ख़ान की कोई संतान होती तो शायद ऐसा नहीं होता. उनका परिवार बिखर रहा है और परिजनों के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई ही इस विरासत के बिखरने की सबसे प्रमुख वजह है."

मालदा के मुस्लिम विद्वान और इतिहासकार मोहम्मद अताउल्लाह कहते हैं, "ग़नी ख़ान का असर कुछ कम ज़रूर हुआ है. लेकिन अब भी तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनका सम्मान करते हैं. दिक्कत यह है कि मालदा में ग़नी ख़ान के बाद कोई ऐसा नेता नहीं हुआ जो यहाँ काँग्रेस को एकजुट रख सके. अब सब कुछ कोलकाता से ही तय होता है कि कौन नेता बनेगा और कौन नहीं. ग़नी ख़ान के बाद दूसरा कोई स्वीकार्य नेता नहीं पैदा हुआ."

इतिहासकार मोहम्मद अताउल्लाह

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मालदा मुस्लिम इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष मोहम्मद अब्दुर रफ़ीक़ कहते हैं, "ग़नी ख़ान इज़ ग़नी ख़ान. ख़ान के निधन के बाद यहाँ काँग्रेस की पकड़ कुछ कमज़ोर ज़रूर हुई है. लेकिन पार्टी के साथ यह बात तो पूरे देश में लागू होती है. मालदा भी अपवाद नहीं है."

सामाजिक कार्यकर्ता शबनम जहाँ भी मानती हैं कि ग़नी ख़ान का असर कुछ कम ज़रूर हुआ है. लेकिन लोगों के मन में उनके प्रति काफ़ी सम्मान है. उनकी दलील है कि अगर ऐसा नहीं होता तो पार्टी यहाँ लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जीत का सिलसिला बरकरार नहीं रख पाती.

लेकिन ज़िला काँग्रेस महासचिव मोहम्मद मसूद इससे सहमत नहीं हैं.

मोहम्मद मसूद

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वे कहते हैं, "हमने पिछले विधानसभा चुनावों में नौ में से आठ सीटें जीती थीं. ग़नी ख़ान के निधन के बाद वर्ष 2008 और 2013 में हमने मालदा ज़िला परिषद चुनावों में भी जीत हासिल की थी. पूरे देश में खुले तीन केंद्रीय संस्थानों में से एक- ग़नी ख़ान चौधरी इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी मालदा में ही है. इसके लिए ग़नी ख़ान के परिवार ने सौ एकड़ ज़मीन दान में दी थी. लेकिन वादे के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक एक इंच ज़मीन भी नहीं दी है."

मसूद बताते हैं कि ग़नी ख़ान ने रेल मंत्री रहते मालदा के सैकड़ों युवकों को रेलवे में नौकरियां दी थीं.

मालदा शहर के चप्पे-चप्पे पर ग़नी ख़ान की छाया साफ़ नज़र आती है. शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर उनकी आदमक़द प्रतिमा लगी है. अस्सी के दशक में जब देश के तमाम रेलवे स्टेशन दुर्दशा के शिकार थे उन्होंने रेल मंत्री रहते मालदा टाउन स्टेशन को चमका दिया था. साज-सज्जा और मार्बल-जड़ित प्लेटफ़ॉर्मों ने इसे दर्शनीय स्थानों की सूची में शुमार कर दिया था.

रेलवे पार्क

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स्टेशन के नज़दीक बना रेलवे पार्क भी ग़नी ख़ान की ही देन है.

मालदा ज़िले में घूमने और लोगों से बातचीत से यह बात उभर कर आती है कि उत्तराधिकार की लड़ाई में उनकी विरासत भले बिखरी हो, ज़िले पर ग़नी ख़ान की छाया अब भी बरक़रार है. उनका यह करिश्मा अबकी काँग्रेस को कितनी कामयाबी दिला पाता है, यह तो दो मई को ही पता चलेगा.

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