पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021: क्यों गायब है 'नदी के आतंक' का मुद्दा

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, मुर्शिदाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
"तीन महीने पहले तटबंध का बड़ा हिस्सा गंगा के पेट में समा गया था. बार-बार शिकायत करने के बावजूद सरकारी अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है. अगर यह इसी तरह चलता रहा तो बारिश के मौसम में क्या होगा, यह सोच कर ही सिहरन होती है. लगता है हमें जल्दी ही बेघर होकर सड़क पर रहना होगा."
मुर्शिदाबाद ज़िले में फरक्का बांध परियोजना से कुछ किलोमीटर दूर गंगा के किनारे बसे रघुनाथपुर के दुर्दांत घोष जब यह बात कहते हैं तो उनकी आंखों में भविष्य की चिंता साफ़ झलकती है.
दुनिया की हर संस्कृति-सभ्यता में नदियों को जीवन का स्रोत माना जाता है.
इनको जीवनदायिनी कहा जाता है और वह अपने तटों पर बसे लोगों की आजीविका का साधन होती हैं. संगीत और साहित्य में भी नदी की काफी अहमियत होती है.
जल ही जीवन है वाली कहावत तो बहुत पुरानी है.
लेकिन पश्चिम बंगाल में ख़ासकर मुर्शिदाबाद और मालदा ज़िले में गंगा, जिसे भागीरथी और पद्मा भी कहा जाता है, के तटवर्ती इलाकों में यही जल जीवन का दुश्मन बन गया है.
भूमि कटाव
दरअसल, हर साल यह नदी पद्मा जैसी सहायक नदियों के साथ अपने तटवर्ती इलाकों का बड़ा हिस्सा अपने साथ बहा ले जाती है.
लेकिन दशकों पुरानी यह समस्या इस बार के सबसे अहम विधानसभा चुनावों में भी मुद्दा नहीं बन सकी है.
तटकटाव से प्रभावित इलाके के लोगों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती बन कर रह जाती है.
मालदा ज़िले के 80 बरस के जमील अहमद नदी के आतंक के जीते-जागते सबूत हैं. गंगा नदी की ओर से हर साल बरसात के सीजन में बड़े पैमाने पर होने वाले भूमि कटाव के चलते हर बार उनका ठिकाना बदल जाता है.
यह नदी हर साल मालदा और पड़ोसी मुर्शिदाबाद ज़िले में हज़ारों एकड़ फ़सलें लील जाती है. साथ ही गाँव का कुछ हिस्सा भी इसके पेट में चला जाता है.
लिहाजा हर साल कुछ लोग बेघर हो जाते हैं. ये लोग किसी दूसरे तट पर नए सिरे से बसते हैं और गृहस्थी ठीक से बसने से पहले ही वे अगले साल फिर उजड़ने पर मजबूर हो जाते हैं.

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राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की माँग
मालदा और मुर्शिदाबाद में अहमद की तरह ऐसे हज़ारों लोग हैं जिनका सबकुछ गंगा ने छीन लिया है.
इन दोनों ज़िलों में भूमि कटाव की समस्या इतनी भयावह है कि इसे राष्ट्रीय समस्या घोषित करने की माँग में आंदोलन होते रहे हैं.
लेकिन राज्य सरकारें पैसों की कमी का रोना रोते हुए सारा दोष केंद्र के मत्थे मढ़ कर अपनी ज़िम्मेदारियों से छुटकारा पा लेती है.
एक दशक पहले इलाके में हर चुनाव में यही मुद्दा सबसे अहम होता था. लेकिन लोग जीतने के बाद इस समस्या को भी भूलते रहे और यहाँ के लोगों को भी. और अब तो यह मुद्दा भी नहीं है.
गंगा का कटाव साठ के दशक से ही चिंता का विषय बना हुआ है. लेकिन एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, फऱक्का बांध बनने के बाद हालात तेज़ी से ख़राब हुए हैं.

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दो समितियाँ बनाई गईं
इलाके में बाढ़ और कटाव की वजहों का पता लगाने के लिए सरकार ने वर्ष 1980 में प्रीतम सिंह समिति का गठन किया था और 1996 में केशकर समिति का.
इन दोनों ने अपनी रिपोर्ट में इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए कई अल्पकालीन और दीर्घकालीन उपाय सुझाए थे. लेकिन उस समय धन की कमी की वजह से सरकार एक भी सिफारिश पर अमल नहीं कर सकी.
सिंचाई विभाग में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे प्रथमेश कुमार राय बताते हैं कि वर्ष 1972 में फरक्का बांध बनने से पहले भी बाढ़ और कटाव की समस्या थी. लेकिन बांध बनने के बाद इनका आकार भयावह हो गया है.
वे सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताते हैं, "वर्ष 1980 से अब तक यानी बीते चालीस वर्षों के दौरान लगभग छह हज़ार हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन गंगा में समा चुकी है. इनमें गाँवों के अलावा आम के बागान और खेत शामिल हैं."
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि गंगा के पेट में जमी तलछट और गाद की सफ़ाई कर नदी की गहराई बढ़ाना ज़रूरी है. लेकिन इस काम में इतना खर्च है कि यह राज्य सरकार के बूते की बात नहीं है.

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मालदा पर लटकता ख़तरा
फरक्का तक गंगा राष्ट्रीय नदी है. वहाँ से इसकी एक धारा पड़ोसी देश बांग्लादेश में चली जाती है जहाँ इसे पद्मा कहा जाता है. पड़ोसी मुर्शिदाबाद में भी इस नदी को पद्मा ही कहा जाता है.
मालदा और मुर्शिदाबाद की सीमाएं बांग्लादेश से सटी हैं. इन ज़िलों में अल्पसंख्यकों की आबादी ज़्यादा है जो देश के विभाजन के बाद सीमा पार से आकर बसे हैं.
गंगा नदी मालदा को झारखंड से अलग करती है तो पद्मा नदी मालदा और मुर्शिदाबाद को एक-दूसरे से अलग करती है.
इन दोनों ज़िलों के लोग मुख्य रूप से आजीविका के लिए खेत और नदी पर ही निर्भर हैं. लेकिन दशकों तक जीवनदायिनी रही गंगा और पद्मा नदियां अब इलाके के लोगों के लिए शोक बनती जा रही हैं.
मालदा ज़िले के कालियाचक और पगलाघाट इलाके जल्दी ही गंगा के पेट में समा सकते हैं.

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मुर्शिदाबाद में तटकटाव की स्थिति
जो कहर गंगा मालदा ज़िले में बरपाती है वही पड़ोसी मुर्शिदाबाद में पद्मा बरपाती है.
पद्मा हर साल हज़ारों बीघे खेती की ज़मीन अपने साथ बहा ले जाती है. नदी का बहाव हर साल बदलता रहता है और उसके साथ लोगों के विस्थापन का कभी न ख़त्म होने का सिलसिला भी चलता रहता है.
कभी सैकड़ों बीघे ज़मीन के मालिक रहे लोग भी अब सिर छिपाने के लिए दो गज ज़मीन तलाश रहे हैं.
ज़िला मुख्यालय बहरमपुर से सत्तर किलोमीटर जालंगी इलाके के शहीदुल मंडल के पास कुछ साल पहले तक साठ बीघे ज़मीन हुआ करती थी. उस पर खेती से वह अपने परिवार का पेट पालते थे.
लेकिन धीरे-धीरे उसकी आंखों के सामने ही पूरी ज़मीन पद्मा के गर्भ में चली गई. अब मंडल को पेट पालने के लिए दूसरों के खेत में मज़दूरी करनी पड़ती है.

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ज़ाफ़रगंज के असीम मंडल भी यही बात कहते हैं.
मंडल बताते हैं, "हर साल धीरे-धीरे यह गाँव गंगा के पेट में समा रहा है. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि हमारा घर कब तक बचा रहेगा?"
रघुनाथपुर की सुप्रिया मंडल हों या पास के मोहम्मद नूर, सबको अपने भविष्य की चिंता है.
सुप्रिया बताती है, "बरसात में तटबंधों की मरम्मत का काम होगा नहीं और फिलहाल बीते तीन महीनों से न तो फरक्का बैराज के अधिकारियों ने इस ओर ध्यान दिया है और न ही राज्य सरकार ने. समझ में नहीं आता हमारा क्या होगा?"

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चुनाव में तटकटाव मुद्दा क्यों नहीं?
दरअसल, यह समस्या इतनी पुरानी हो चुकी है कि अबकी सबसे अहम विधानसभा चुनावों में भी यह मुद्दा नहीं है.
सत्तारूढ़ टीएमसी के नेता इस समस्या की गंभीरता स्वीकार करने को भी तैयार नहीं है.
टीएमसी के स्थानीय नेता मोहम्मद जयनाल अबेदिन बताते हैं, "कुछ इलाकों में तटकटाव की समस्या है. लेकिन यह उतनी गंभीर नहीं है. इसलिए यह अबकी चुनाव में मुद्दा नहीं बनेगा."
लेकिन तटवर्ती इलाकों के लोगों की चिंता यह नहीं है कि यह मुद्दा बनेगा या नहीं.
उनकी चिंता महज इतनी है कि तटबंधों को मजबूत किया जाए ताकि भूमि कटाव की समस्या पर अंकुश लगाया जा सके और जीवन सुरक्षित रहे.
स्थानीय पत्रकार शिबू कहते हैं, "हर साल बारिश में जब खेत, मकान और गाँव की ज़मीन नदी में समाने लगती है तो प्रशासनिक सक्रियता नज़र आती है. लेकिन उसके बाद फिर सब कुछ जस का तस हो जाता है."
रघुनाथपुर के एक युवक बताते हैं कि "इस बार हम लोग यह नारा देने की सोच रहे हैं कि तटबंध नहीं तो वोट नहीं. शायद इससे अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद खुले. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो इलाके के लोगों के पास धीरे-धीरे अपनी ओर बढ़ती नदी के इंतज़ार के अलावा शायद दूसरा कोई विकल्प नहीं बचेगा."
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