मॉरिशस का नीला समुद्र काला पड़ा, काफ़ी गंभीर है तेल रिसाव

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- Author, नवीन सिंह खड़का
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
दक्षिण-पूर्वी मॉरिशस के तटीय इलाक़ों और लैगून के नज़दीक जापान के स्वामित्व वाले जहाज़ से तेल रिसाव होने की घटना सामने आई है.
हालाँकि ये उतनी बड़ी घटना नहीं है, जितनी बड़ी तेल रिसाव की घटनाएँ दुनिया में पहले हुई हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे होने वाला नुक़सान बहुत बड़ा होगा.
इसकी वजह ये है कि तेल रिसाव वाली जगह के नज़दीक दो संरक्षित समुद्री इकोसिस्टम और ब्लू बे मरीन पार्क रिज़र्व हैं. ये ब्लू बे मरीन पार्क रिज़र्व अंतरराष्ट्रीय महत्व का एक वेटलैंड है, जहाँ कई प्रजातियों के समुद्री जीव और पौधे हैं.
भले ही तेल रिसाव बहुत दूर तक नहीं हुआ है, लेकिन ऐसी जगह हुआ है जिससे पर्यावरण पर संभावित गंभीर असर को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं.
बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में आप जो एकदम साफ़ और सुंदर नीली समुद्री झील देखते हैं, वो दरअसल मॉरिशस के तटीय गांव मेहेबर्ग के नज़दीक का लैगून है. लेकिन अब इस शानदार नीले लैगून का पानी काला और भूरा पड़ गया है.
जुलाई के आख़िर में जापान का एक जहाज़ एमवी वकाशियो, पोइंट डी'एसनी में फँस गया था और पिछले गुरुवार से उस जहाज़ से तेल लीक होने लगा.
सैटेलाइट तस्वीरों में दिख रहा है कि तेल रिसाव, पोइंट डी'एसनी के मेनलैंड से आइ-लॉक्ज़-एग्रेट्स के द्वीप तक फैल गया है.
माना जा रहा है कि जहाज़ से अबतक एक हज़ार टन से ज़्यादा का ईंधन लीक होकर लैगून में जा चुका है. इस तेल को साफ़ करने के लिए बड़ा अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें कई स्थानीय लोग मदद कर रहे हैं.
जहाज़ से हुए नुक़सान के क़रीब दो हफ़्ते बाद 7 अगस्त को मॉरिशस की सरकार ने इस घटना को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर दिया.

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बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट
मॉरिशस में जैव विविधता की भरमार है. तरह-तरह के जीव और पौधे हैं.
ग्रीनप्रीस के पूर्व स्ट्रेटेजिस्ट सुनील मोक्षानंद तेल रिसाव वाली जगह के नज़दीक एक द्वीप पर हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "हवा और पानी की लहरों से कोई मदद नहीं मिल रही है, बल्कि ये तेल को उस इलाक़ों की तरफ धकेल रही है, जहाँ महत्वपूर्ण समुद्री इकोसिस्टम है."
जैविक विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के मुताबिक़,मॉरिशस के समुद्री पर्यावरण में 1,700 तरह की प्रजातियाँ रहती हैं, जिनमें क़रीब 800 तरह की मछलियाँ हैं, 17 तरह के समुद्री स्तनधारी जीव हैं और कछुओं की दो प्रजातियाँ हैं.
कोरल रीफ़्स, समुद्री घास और मैन्ग्रोव - मॉरिशस के पानी को असाधारण रूप से जैव विविधता से समृद्ध बनाते हैं.
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्राइटन में समुद्री जीव विज्ञान की एक वरिष्ठ लेक्चरर डॉ. कोरिना सियोचन ने कहा, "इस ग्रह पर इस तरह के समृद्ध जैव विविधता वाले समुद्री क्षेत्र बहुत कम बचे हैं. इस तरह का तेल रिसाव यहाँ की क़रीब हर चीज़ पर असर डालेगा."
"तेल रिसाव की वजह से पानी की सतह पर जो आपको तेल की हल्की चिकनी परत दिख रही है, समस्या सिर्फ़ वही नहीं है, बल्कि तेल से कई ऐसे घुलनशील तत्व भी निकलेंगे, जो पानी में मिल जाएँगे. इससे पानी की सतह के नीचे एक परत बन जाएगी और परत बहुत मोटी हो जाएगी. ऐसे पूरे समुद्री इकोसिस्टम पर असर पड़ेगा."
ऑपरेटर मित्सुई ओएसके लाइन्स के मुताबिक़, एमवी वकाशियो जहाज़ में क़रीब चार हज़ार टन ईंधन था, जिसमें से क़रीब 1200 टन अब तक रिस चुका है.
प्रधानमंत्री प्रवींद्र जगन्नाथ के मुताबिक़, ख़राब मौसम के बावजूद जहाज़ के ईंधन टैंक से पूरा तेल निकाल लिया गया है. हालाँकि दूसरी जगह रखा कुछ तेल अब भी जहाज़ पर है. ऐसा डर भी है कि जहाज़ टूट सकता है, जिससे समुद्र में और ज़्यादा तेल फैल जाएगा.
ईंधन को निकालकर हेलिकॉप्टर के ज़रिए ले जाकर समुद्र तट पर खड़े उसी कंपनी नागाशिकी शिपिंग के स्वामित्व वाले अन्य जहाज़ में डाला जा रहा है.
अभी तक ये पता नहीं चल पाया है कि जहाज़ लैगून के इतने क़रीब कैसे आ गया और पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है.
मित्सुई ओएसके लाइन्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष अकिहिको ओनो ने एक प्रेस वार्ता में तेल रिसाव और इसकी वजह से हुई परेशानी के लिए माफ़ी मांगी.

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कोरल-ब्लीचिंग
लैगून के कोरल रीफ़्स को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है. इनमें इतनी जैव विविधता पाई जाती है और कई बार इन्हें समुद्र का रेनफ़ॉरेस्ट भी कहा जाता है.
अमरीका के राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन के अनुसार, समुद्र में लगभग 25% मछलियाँ, स्वस्थ कोरल रीफ़्स पर निर्भर होती हैं.
ये कोरल रीफ़्स तूफ़ान और कटाव से समुद्री किनारे की रक्षा करते हैं. कोरल रीफ़्स और समुद्री इकोसिस्टम - मॉरीशस के पर्यटन के दो बड़े हिस्से हैं. ये देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं.
एक अंतरराष्ट्रीय तेल रिसाव सलाहकार और अमरीका के अलास्का में एक समुद्री जीव विज्ञानी प्रोफ़ेसर रिचर्ड स्टीनर ने कहा, "तेल रिसाव से जो ज़हरीले हाइड्रोकार्बन निकलेंगे, वो कोरल रीफ़्स को ब्लीच कर देंगे, जिससे वो आख़िर में मर जाएँगे."
पिछले साल जब सोलोमन द्वीप के कोरल रीफ़्स पर एक जहाज़ से तेल गिरा था, तब प्रोफेसर स्टीनर ने सोलोमन द्वीप की सरकार की मदद की थी. वो कहते हैं, "हालाँकि वो तेल रिसाव इतना बड़ा नहीं था. सिर्फ़ कुछ सौ टन ही तेल रिसा था. लेकिन कोरल रीफ़्स को इससे बड़ा नुक़सान हुआ था."

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पिछले तेल रिसावों का असर
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इससे पहले जो तेल रिसाव हुए हैं, उनसे समुद्री जीवों और पौधों को बहुत नुक़सान हुआ है.
2010 में मैक्सिको की खाड़ी में क़रीब 400,000 टन तेल रिसाव हुआ था, जिससे प्लवक से लेकर डॉल्फिन तक - हज़ारों प्रजातियों की मौत हो गई थी.
समुद्री जीवन पर अन्य दीर्घकालिक प्रभाव भी हुए, जैसे प्रजनन की क्षमता पर असर पड़ा, ग्रोथ कम हो जाना, जीवों को घाव पड़े और बीमारी हो गई.
साउथ फ़्लोरिडा विश्वविद्यालय में मरीन इकोलॉजिस्ट डॉ. स्टीवन मुरावस्की और विश्वविद्यालय के सी-इमेजेज़ कंसोर्टियम के सहायक निदेशक शेरी गिल्बर्ट ने दी कन्वर्सेशन जरनल में लिखा, "रिसर्चरों ने तेल रिसाव के बाद के महीनों में उत्तरी गल्फ़ की रेड स्नैपर की त्वचा पर घाव देखे थे, लेकिन 2012 आते-आते ये घाव कम लेकिन गंभीर दिखने लगे."
"आर्थिक और पर्यावरण के नज़रिए से महत्वपूर्ण प्रजातियों जैसे गोल्डन टाइलफ़िश, ग्रूपर और हैक पर वक़्त के साथ हाड्रोकार्बन के असर के अन्य सबूत भी मिले."
1978 में फ्रांस के ब्रिटनी में कच्चे तेल का एक बड़ा जहाज़ फँस गया, जिससे क़रीब 70 मिलियन गैलन तेल समुद्र में लीक हुई.

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तेल की चिकनी परत से फ्रांस के तट का क़रीब 200 मील का हिस्सा प्रदूषित हो गया और मोलस्क और क्रस्टेशियंस जैसे जीवों की जान गई. तेल रिसाव की वजह से क़रीब 20 हज़ार पक्षियों की जान भी गई और क्षेत्र के सीप भी ख़राब हो गए.
विशेषज्ञों की मानें, तो पूरी कोशिश के बाद भी इन घटनाओं में 10 प्रतिशत से कम तेल ही सफलतापूर्वक निकाला जा सका.
मॉरिशस तेल रिसाव की घटना में मदद के लिए फ्रांस ने अपने नज़दीक के रीयूनियन द्वीप से एक सैन्य एयरक्राफ़्ट भेजा, जिसके साथ प्रदूषण नियंत्रित करने वाले कुछ उपकरण भी भेजे गए.
वहीं जापान ने फ्रांस की कोशिशों में अपनी तरफ़ से मदद करने के लिए छह सदस्यों वाली टीम भेजी. मॉरिशस के तट रक्षक और कई पुलिस इकाइयाँ भी द्वीप के दक्षिण-पूर्वी स्थित घटनास्थल पर पहुँच गई हैं.
प्रोफ़ेसर स्टीनर कहते हैं, "मॉरिशस सरकार को जितनी जल्दी हो सके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करना चाहिए."
उन्होंने बताया कि इसका असर सालों तक रह सकता है.
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