कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाने वालों पर पीएम मोदी की अपील का कितना होगा असर?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार सुबह कोरोना का टीका लगवा लिया. केरल और पुदुचेरी की नर्स की देखरेख में उन्हें भारत बायोटेक की कोवैक्सीन का टीका लगा. सोशल मीडिया पर सुबह से इस बात की ही चर्चा हो रही है.

दरअसल भारत में एक मार्च से टीकाकरण का दूसरा चरण शुरू हो रहा है. इसमें 60 साल से अधिक उम्र वालों को कोरोना का टीका लगाया जा रहा है. अगर आपकी उम्र 45 साल से ज़्यादा है और आपको गंभीर बीमारियाँ हैं, तो आपको भी टीका प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में लग सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 60+ आयु वर्ग में आते हैं और इसलिए उन्होंने सबसे पहले टीका लगवाया.

दुनिया के दूसरे देशों के राष्ट्राधायक्षों के मुक़ाबले प्रधानमंत्री मोदी ने टीका लगवाने में थोड़ी देरी ज़रूर की है, लेकिन भारत में बने टीकाकरण का क्रम नहीं तोड़ा है.

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को टीकाकरण अभियान की शुरुआत में ही वैक्सीन लगवाते हुए देखा गया था.

बीजेपी के कई नेता कह रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी के ऐसा करने से लोगों में टीका लगाने को लेकर जो हिचक है, वो दूर हो जाएगी. ऐसा कहने वालों में सबसे आगे हैं भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन.

समाचार एजेंसी एएनआई से डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी ने कोवैक्सीन लगवाई है, वैज्ञानिक तौर पर कोवैक्सीन के बारे में बहुत सी भ्रांतियाँ फैलाई गई हैं. प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस वैक्सीन के लगाए जाने के बाद सभी विवादों को विराम दिया जाना चाहिए."

खेल मंत्री किरेन रिजिजू, हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज, उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सभी ने इस बारे में ट्वीट भी किया है. विपक्षी सांसद भी उनके इस क़दम की तारीफ़ कर रहे हैं.

दोपहर होते-होते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कोरोना का टीका लगवा लिया. बस फिर क्या था, नवीन पटनायक, शरद पवार, वैंकेया नायडू -एक के बाद एक कई नेताओं के वैक्सीन लगवाने की ख़बरे सामने आने लगी. लेकिन टीकाकरण बूथ से पहले दिन इतनी उत्साह वाली तस्वीर शुरुआती घंटों में देखने को नहीं मिली.

इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि क्या आम जनता में भी ऐसा ही विश्वास देखने को मिलेगा?

आईसीएमआर के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. रमन गंगाखेडकर ने भी प्रधानमंत्री के इस क़दम की सरहाना की है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री के टीका लगवाने से लोगों की हिचक दूर होगी. मान लीजिए मैंने तय किया कि मुझे टीका नहीं लगवाना है. लेकिन अगर मेरे सर्कल में ज़्यादा से ज़्यादा लोग टीका लगवाएँगे, तो मुझ पर दवाब तो आएगा ही ना. हर नए काम में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो दूर से बैठ कर केवल देखने का काम करते हैं, आगे बढ़ कर उसमें हिस्सा नहीं लेते. प्रधानमंत्री के टीका लगवाने से उन दूर बैठ कर सब कुछ देखने वाले लोगों पर कुछ तो असर ज़रूर पड़ेगा."

भारत में टीकाकरण के आँकड़े और सरकार की चिंता

आँकड़ों की बात करें, तो भारत में अब तक एक करोड़ 43 लाख लोगों ने कम से कम वैक्सीन की एक खुराक ली है. इनमें गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में रहने वाले सबसे ज़्यादा हैं.

भारत सरकार ने जुलाई के अंत तक 30 करोड़ लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन पहले डेढ़ महीने में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लगी है.

यानी जो हेल्थ वर्कर अब तक पहला डोज़ भी नहीं लगवा पाए हैं, उनतक पहुँचना सरकार के लिए चुनौती है. ये भारत सरकार की चिंता का पहला कारण है.

इस चिंता को दूर करने के लिए सरकार ने आम जनता के लिए समय से पहले टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया और प्राइवेट अस्पतालों में टीका लगाने की इजाज़त दे दी. सरकार को उम्मीद है कि इस फ़ैसले से लोगों की हिचक दूर होगी और टीका लगवाने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी.

प्रधानमंत्री मोदी का टीका लगवाना भी इसी दिशा में एक क़दम माना जा रहा है.

इसके अलावा भारत सरकार की एक और चिंता है, पहले डोज़ के बाद दूसरा डोज़ लगवाने नहीं आ रहे हैं फ़्रंटलाइन वर्कर.

भारत में कोरोना का टीकाकरण अभियान 16 जनवरी से शुरू हुआ है. दूसरा डोज़ 13 फरवरी से लगना शुरू हो गया है.

पहले 14 दिन में जहाँ 35 लाख लोगों ने कोरोना का टीका लगवाया था, वहीं दूसरे डोज़ के पहले 14 दिन में केवल 25 लाख लोगों ने कोरोना का टीका लगवाया है.

यानी लगभग 10 लाख फ़्रंटलाइन वर्कर्स ने टीके का दूसरा डोज़ नहीं लिया है.

ये भारत सरकार के लिए चिंता का दूसरा बड़ा सबब है.

मोदी के टीका लगवाने से हिचक दूर होगी?

डॉ. रमन गंगाखेड़कर का मानना है कि दूसरा डोज़ ना लेने वाले सिर्फ़ हिचक की वजह से ऐसा कर रहे हैं, ये पूरी तरह सच नहीं हैं.

उन्होंने बताया कि मेडिकल जर्नल 'दि लैंसेट' में हाल ही में एक रिसर्च छपी है, जिसके मुताबिक़ ऑक्सफ़ोर्ड एस्ट्राजेनेका वैक्सीन 12 हफ़्ते तक ली जाए, तो उसका असर बेअसर नहीं होता. यही सोच कर कुछ लोग भारत में वैक्सीन का दूसरा डोज़ नहीं ले रहे. ऐसा करने वालों में कोविशील्ड का पहला डोज़ लगवाने वालों की संख्या ज़्यादा है. भारत बायोटेक की वैक्सीन लगवाने वालों पर तो सरकार ख़ुद से ज़्यादा फ़ॉलोअप कर रही है क्योंकि तीसरे फेज़ की स्टडी का डेटा नहीं आया है. कोवैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल की सशर्त इजाज़त दी गई है, इसलिए लगने के बाद भी उन लोगों का फ़ॉलोअप आगे भी जारी रहेगा.

डॉ. रमन गंगाखेडकर 'दि लैंसेट' में छपी जिस रिपोर्ट का हवाला दे रहे थे, वो 19 फरवरी को छपी थी. भारत में दूसरी डोज़ की वैक्सीनेशन ड्राइव 13 फरवरी को शुरू हो चुकी थी.

दूसरा डोज़ 28 दिन के बाद लगे तो...

लेकिन डॉ. रमन गंगाखेडकर ये भी कहते हैं कि जो लोग दूसरा डोज़ लेने में देरी कर रहे हैं, उन्हें याद रखना होगा कि वो तीन महीने के भीतर दूसरा डोज़ अवश्य लगवा लें. नहीं तो 'लॉस टू फ़ॉलोअप' हो जाएगा और फिर टीका दोबारा से लगवाने की ज़रूरत पड़ेगी.

उनके मुताबिक़ भारत सरकार ने इस बारे में अभी स्थिति स्पष्ट नहीं की है कि क्या भारत में 28 दिन के बजाए 3 महीने बाद कोविशील्ड का दूसरा डोज़ ले सकते हैं या नहीं. भारत सरकार को इस बारे में जल्द से जल्द स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करना चाहिए.

भारत में 'वैक्सीन हेजिटेंसी' के कारण

दरअसल भारत सरकार ने कोरोना वैक्सीन के दो टीके को मंज़ूरी दी है. एक है ऑक्सफ़ोर्ड एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन, जो भारत में कोविशील्ड नाम से बनाई गई है. और दूसरा है भारत बायोटेक की वैक्सीन- कोवैक्सीन.

जानकारों के मुताबिक़ भारत में वैक्सीन लगाने को लेकर हिचक की सबसे बड़ी दो वजहें थी. पहली वजह ये थी कि लोगों को ये तय करने का अधिकार नहीं था कि वो कौन सी वैक्सीन लगवाना चाहते हैं. चूँकि कोवैक्सीन की इमरजेंसी रेस्ट्रिक्टेड इस्तेमाल की इजाज़त दी गई है, इसलिए लोग कोवैक्सीन लगवाने को लेकर हिचक रहे थे.

लेकिन अब कोविशील्ड को लेकर भी एआईएमआईएम नेता असदउद्दीन ओवैसी केंद्र सरकार से सवाल पूछ रहे हैं - क्या 64 साल से अधिक उम्र वालों पर कारगर नहीं है कोविशील्ड वैक्सीन?

दूसरी वजह ये थी कि सरकार ख़ुद कह रही है कि कोविड-19 बीमारी होने के बाद रिकवरी रेट बहुत अच्छी है. 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग ठीक हो रहे हैं. इस वजह से अब ज़्यादा लोग बेफ़िक्र हो जा रहे हैं कि वैक्सीन की ज़रूरत क्या है, कोरोना हुआ भी तो वो ठीक हो जाएँगे.

इसके अलावा कुछ लोग एडवर्स साइड इफ़ेक्ट्स की खबरें सुन कर भी टीका लगवाने से थोड़ा बच रहे थे.

लेकिन टीकाकरण में कमी की एक तीसरी वजह Co-WIN की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को भी माना जा रहा है. कई बार निर्धारित समय के बाद लोगों को टीका लगवाने के मैसेज आ रहे थे. इस तरह की कई मीडिया रिपोर्ट्स सामने आई है.

इस बार आम जनता को टीका लगवाने के लिए ख़ुद को Co-WIN 2.0 पर जा कर रजिस्टर करवाना पड़ रहा है. रजिस्ट्रेशन आप वेब पोर्टल पर कर सकते हैं और आरोग्य सेतु ऐप के ज़रिए भी. कुछ जगहों पर फ़ोन से रजिस्ट्रेशन करने की शिकायतें शुरुआती दौर में सामने आ रही है.

कुछ लोग ऐप डाउनलोड कर रजिस्ट्रेशन की कोशिश कर रहे थे. स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बारे में स्पष्टीकरण जारी कर कहा है कि Co-WIN 2.0 ऐप से रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा सकता है.

इस वजह से भी कुछ लोग चाह कर भी टीका नहीं लगवा पा रहे हैं.

शिवसेना की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को इस बारे में चिट्ठी भी लिखी है.

हालाँकि ये बात भी सच है कि आज आम जनता के लिए टीकाकरण अभियान का पहला दिन था, एक साथ बहुत सारे लोग एक साथ रजिस्टर करने के लिए ट्राई कर रहे होंगे. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि Co-WIN 2.0 में कोई दिक्क़त नहीं है.

कुछ लोग जो कंप्यूटर पर रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते, उनके लिए वॉक-इन की सुविधा भी है. सब कुछ एक हफ़्ते में दुरुस्त कर दिया जाएगा.

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