कोरोना वायरसः रूस की कोरोना वैक्सीन के असर पर भारत का क्या कहना है?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोना के नए मामले रोज़ नया रिकॉर्ड बना रहे हैं. अब एक दिन में 90 हज़ार से ज्यादा मामले सामने आए हैं और दुनिया में अमरीका के बाद कोरोना संक्रमण के सबसे ज़्यादा मरीज़ भारत में ही हैं. ऐसे में लोगों से ज़्यादा सरकार को कोरोना के वैक्सीन की चिंता सता रही है.

इन सब ख़बरों के बीच रूस की वैक्सीन स्पुतनिक-V एक उम्मीद की किरण बन कर सामने आई है. लेकिन वाक़ई में क्या रूस की वैक्सीन पर उतना भरोसा किया जा सकता है.

रूस के वैज्ञानिकों ने कोरोना की वैक्सीन को लेकर पहली रिपोर्ट प्रकाशित की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रायल के पहले फेज़ में इम्यून रेस्पॉन्स अच्छा दिखा है. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद से दुनिया भर से वैज्ञानिकों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं.

मेडिकल जर्नल दि लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इस ट्रायल में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों में कोरोना से लड़ने वाली एंटीबॉडी विकसित हुई और किसी में भी कोई भयानक साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला.

रूस में इस वैक्सीन को अगस्त के महीने में ही बिना डेटा जारी किए लाइसेंस दे दिया गया था. इसके साथ ही रूस ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया था.

वैक्सीन के जानकारों के मुताबिक़ रूस के वैक्सीन ट्रायल का डेटा उसकी प्रमाणिकता और सेफ्टी को साबित करने के लिए बहुत ही छोटा है.

जारी की गई इस नई रिपोर्ट को रूस के आलोचकों के मुँह बंद करने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है. पश्चिमी देशों के कई विशेषज्ञों की राय में रूस के वैज्ञानिक ट्रायल के दौरान कुछ ज़रूरी चरणों को पूरा किए बिना आगे बढ़ रहे हैं.

अगस्त के महीने में सिर्फ़ दो महीने के ट्रायल के बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दावा किया है कि उनके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की ऐसी वैक्सीन तैयार कर ली है, जो कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ कारगर है.

गेमालेया इंस्टीट्यूट में विकसित इस वैक्सीन के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को भी यह टीका लगा है. रूस ने इस वैक्सीन का नाम 'स्पुतनिक V' दिया है. रूसी भाषा में 'स्पुतनिक' शब्द का अर्थ होता है सैटेलाइट. रूस ने ही विश्व का पहला सैटेलाइट बनाया था. उसका नाम भी स्पुतनिक ही रखा था.

दि लैंसेट की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

दि लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक़ रूसी वैक्सीन स्पुतनिक- वी के दो ट्रायल जून और जुलाई में किए गए थे. दोनों ही ट्रायल के दौरान 38 स्वस्थ वॉलेंटियर को टीके लगाए गए. फिर तीन हफ़्ते बाद उन्हें दोबारा बूस्टर डोज़ लगाए गए.

ये सभी वॉलेंटियर 18 साल से 60 साल की उम्र वाले थे. इनको 42 दिनों तक निगरानी में रखा गया. तीन हफ़्तों के अंदर इन वॉलेंटियर्स में एंटीबॉडी विकसित हो गई. इन वॉलेंटियर्स में सिर दर्द और जोड़ों में दर्द के अलावा कोई गंभीर साइड-इफेक्ट नहीं देखा गया.

रिपोर्ट के मुताब़िक ये रैंडम ट्रायल नहीं थे. मतलब ये कि जिन वॉलेंटियर को ये टीके लगाए गए उन सबको पता था कि उन्हें टीके लगाए जा रहे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब लंबे समय की स्टडी की ज़रूरत है ताकि कोरोना के ख़िलाफ़ ये वैक्सीन सेफ्टी के साथ-साथ कितनी प्रभावशाली है, इसका भी पता लगाया जा सके.

तीसरे चरण के लिए अलग-अलग आयु वर्ग और अलग-अलग रिस्क ग्रुप के साथ 40 हज़ार लोगों पर इसका परीक्षण किए जाने की बात इस रिपोर्ट में कही गई है. इस वैक्सीन में इम्यून रेस्पॉन्स को शुरू करने के लिए अडीनोवायरस (adenovirus) की अडेप्टिव स्ट्रेन का इस्तेमाल किया गया है.

अभी लंबा सफ़र तय करना बाक़ी है

बीबीसी की स्वास्थ्य संवाददाता फ़िलिपा रॉक्स्बी के मुताबिक़ ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने रूसी वैक्सीन के लिए 'उत्साहजनक' और 'अब तक एक अच्छी ख़बर' है जैसे विशेषणों का इस्तेमाल किया है. उनके मुताबिक़ अभी इस वैक्सीन को लंबा सफ़र तय करना है. ट्रायल के फेज़-2 में एंटीबॉडी रेस्पॉन्स का मतलब ये नहीं कि वायरस से बचाव में इसकी प्रामाणिकता भी साबित हो गई है.

अब तक बस इतना साबित हुआ है कि 18 साल से 60 साल की उम्र वालों में 42 दिन के लिए ये वैक्सीन कोरोना से सुरक्षित रखती है. लेकिन क्या 42 दिन के बाद ये वैक्सीन कारगर साबित होगी?

60 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों में इसका क्या असर होगा या जिन लोगों को पहले से कोई दूसरी बीमारी है उन लोगों में इस वैक्सीन का कितना असर होगा, ऐसे कई सवाल हैं जिनके बारे में इस रिपोर्ट में कुछ भी नहीं कहा गया है.

ऐसी तमाम जानकारी हासिल करने के लिए एक बड़े ग्रुप में 'रैंडमाइज्ड ट्रायल' की ज़रूरत पड़ेगी, जिसमें किसी को इस बात की जानकारी न हो कि उन्हें कोरोना से बचाव के लिए टीका दिया गया है या फिर कोई डमी टीका दिया गया है. इस तरह के ट्रायल के लिए लंबा वक़्त लगता है.

तीसरे चरण में ज़्यादा खुलेपन और पारदर्शिता की ज़रूरत होगी. दुनिया में जितने वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं, उनमें से शायद कुछ ऐसे होंगे जो किसी ख़ास परिस्थिति में ज़्यादा बेहतर काम करेंगे. इसलिए कौन सी वैक्सीन किस परिस्थिति में बेहतर काम करती है, किन पर उसका असर ज़्यादा अच्छा होता है, ये जाने बिना नहीं कहा जा सकता कि सभी वैक्सीन हर व्यक्ति के लिए असरदार होगी.

भारत की प्रतिक्रिया

भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर ही वो संस्था है जो वैक्सीन के लिए दुनिया भर में हो रही कवायद पर नज़र बनाए हुए है और भारत सरकार को अपने सुझाव देती है. सीएसआईआर के महानिदेशक शेखर मांडे ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि दि लैंसेट की रिपोर्ट तो सही है, सुरक्षा के लिहाज़ से रूस की वैक्सीन में कोई दिक्कत नहीं दिख रही.

किसी भी टीके के प्रयोग में सेफ्टी ही मुख्य रूप से चिंता की बात होती है. जाहिर है इस रिपोर्ट के बाद, सुरक्षा को लेकर हमें चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन टीके के प्रयोग में दूसरी चिंता प्रोटेक्शन यानी बचाव की होती है. अभी स्पुतनिक-V टीके के बारे में यह जानकारी नहीं है कि उससे कोरोना वायरस से कितने लंबे समय तक बचा जा सकता है. बचाव के नतीज़ों के लिए हमें और इंतज़ार करना होगा.

दरअसल, किसी भी टीके के इस्तेमाल की इजाज़त से पहले 'सुरक्षा और बचाव' इन दोनों पैमानों पर उनसे नापना ज़रूरी होता है. ट्रायल के फेज़ 1 और 2 में ये देखा जाता है कि टीका लगने पर लोगों में कोई दिक्कत या कोई साइड-इफेक्ट तो नहीं हो रहा.

लेकिन कोरोना से बचाव का यही तरीका सही है- इसका पता लगाने के लिए थोड़ा लंबा वक़्त लगता है. भारत में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ट्रायल के फेज 1 और 2 के रूस में होने के बाद, स्पुतनिक-V के तीसरे चरण का परीक्षण भारत में करने की तैयारी सरकार द्वारा की जा रही है.

इस बारे में शेखर मांडे से सवाल पूछने पर उन्होंने कहा कि ऐसा हो भी सकता है, लेकिन इस बात की उन्हें पुख़्ता जानकारी नहीं है.

इस बारे में भारत सरकार की संस्था ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया यानी डीसीजीआई ही फ़ैसला ले सकती है.

बीबीसी ने डीसीजीआई को भी इस बारे में ई-मेल कर सवाल पूछा है, लेकिन उनका कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि केन्द्र सरकार ने वैक्सीन के ट्रायल के लिए एक अलग से कमेटी बनाई है जो देखेगी कि किस देश से भारत को वैक्सीन ख़रीदने की ज़रूरत है और कब किन परिस्थितियों में भारत वैक्सीन ख़रीदेगा. दुनिया भर की वैक्सीन पर चल रही तमाम कवायदों पर उनकी नज़र है और भारत में भी तीन वैक्सीन के ट्रायल उन्हीं की निगरानी में हो रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रतिक्रिया?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया भर में 176 देशों में कोरोना की वैक्सीन बनाने की कवायद चल रही है, जिसमें से 34 का ह्यूमन ट्रायल चल रहा है. आठ ऐसे वैक्सीन हैं जो ट्रायल के तीसरे चरण में पहुँच चुके है, जिसे सबसे एडवांस स्टेज माना जाता है. इसमें सबसे लंबा वक़्त भी लगता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि साल 2021 में ही कोरोना का टीका आम जनता के लिए उपलब्ध होगा.

इसके पहले अगस्त के महीने में जब रूसी वैक्सीन को वहाँ की सरकार से लाइसेंस मिला था तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि उसके पास अभी तक रूस विकसित कोरोना वैक्सीन के बारे में जानकारी नहीं है कि वो इसका मूल्यांकन कर सके.

ख़ुद रूस में भी इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं. मॉस्को स्थित एसोसिएशन ऑफ़ क्लीनिकल ट्रायल्स ऑर्गेनाइजेशन (एक्टो) ने रूस सरकार से इस वैक्सीन की स्वीकृति प्रक्रिया को टालने की गुज़ारिश की है. उनके मुताबिक़ जब तक इस वैक्सीन के फेज़ तीन के ट्रायल के नतीजे सामने नहीं आ जाते, तब तक रूस की सरकार को इसे मंज़ूरी नहीं देनी चाहिए.

एक्टो नाम के इस एसोसिएशन में विश्व की शीर्ष ड्रग कंपनियों का प्रतिनिधित्व है. एक्टो के एक्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर स्वेतलाना ज़ाविडोवा नें रूस की मेडिकल पोर्टल साइट से कहा है कि बड़े पैमाने पर टीकाकरण का फ़ैसला 76 लोगों पर इस वैक्सीन के ट्रायल के बाद लिया गया है. इतने छोटे सैम्पल साइज़ पर आज़माए गए टीके की सफलता की पुष्टि बहुत ही मुश्किल है.

किरिल दिमित्रीव, रूसी इंवेस्टमेंट फंड के हेड हैं, जो स्पुतनिक-V बनाने में लगी है. उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया ये रिपोर्ट उन आलोचकों के लिए एक प्रभावशाली रेस्पॉन्स है, जो रूसी वैक्सीन की निंदा कर रहे थे.

उन्होंने बताया कि 3000 वॉलेंटियर को अगले फेज़ के लिए नियुक्त कर लिया गया है.

रूस के स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक़ नवंबर या फिर दिसंबर में वैक्सीन देने का काम शुरू किया जाएगा. शुरुआत में उनकी प्राथमिकता हाई-रिस्क ग्रुप को पहले देने की होगी. लेकिन एक्सपर्ट की राय है कि बाज़ार में इस वैक्सीन को उतारने में अभी लंबा वक़्त लग सकता है.

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