झारखंड: सात किलोमीटर दूर अस्पताल, खाट पर कराहती सुरजी की मौत

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- Author, आनंद दत्त
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
आप ये ख़बर ना पढ़ रहे होते अगर 23 साल की सुरजी मरांडी की ज़िंदगी में वो सारी खुशियां आई होतीं, जिनके सपने बीते नौ महीने से देखे जा रहे थे.
सुरजी और उनकी सड़क पर पैदा होते ही मर गई बच्ची अब इस दुनिया में नहीं हैं. पीछे छूट गई है झारखंड के गिरिडीह ज़िले की वो सात किलोमीटर लंबी सड़क, जिसपर प्रसव पीड़ा से कराहती सुरजी को खाट पर लेटाकर स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की कोशिश की गई थी.
सुरजी ने इसी सड़क पर बच्ची को जन्म दिया लेकिन वो वहीं मर गई. रिश्तेदारों की तेज़ चाल और हांफती सांसें जब 26 फरवरी को सुरजी को लेकर स्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं, तब अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था. कुछ देर बाद सुरजी की सांसें भी हमेशा के लिए थम गईं.
गिरिडीह ज़िले की सड़कों और स्वास्थ्य सेवाओं की असलियत सुरजी के पति सुनील टुडू की बात से पता चलती है. सुनील कहते हैं, 'गांव तक कोई गाड़ी नहीं पहुंचती है. हमें न तो एंबुलेंस, न ही सहिया के बारे में कोई जानकारी है. इसलिए खाट पर ही बांधकर नज़दीक के अस्पताल ले गए.'
मौक़े पर मौजूद गावां प्रखंड के उप-प्रमुख नवीन यादव के मुताबिक़, 'इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर उस वक्त डॉक्टर काजिम ख़ान की ड्यूटी थी. वो भी मौके पर मौजूद नहीं थे. इसके अलावा एक अन्य डॉक्टर सालिक जमाल भी मौजूद नहीं थे. इन दोनों डॉक्टरों को फ़ोन भी किया गया, लेकिन उन्होंने उठाया नहीं.'

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बड़ा अस्पताल 23 किलोमीटर दूर
सुरजी ज़िले के तीसरी प्रखंड के बरदौनी गांव के लक्ष्मीबथान टोला की रहने वाली थीं.
इस जगह से तीसरी ब्लॉक स्थित स्वास्थ्य केंद्र की दूरी 23 किलोमीटर है. इसलिए रिश्तेदार सात किलोमीटर दूर के गावां ब्लॉक के स्वास्थ्य केंद्र की ओर चल दिए.
सुरजी के पति सुनील टुडू ने बीबीसी को बताया, 'साल 2016 में शादी हुई थी. ये हमारा पहला बच्चा होता. उस रोज़ मज़दूरी करने घर से बाहर गया था. दोपहर में सुरजी को दर्द शुरू हुआ. गांव में मौजूद महिलाएं देख-रेख कर रही थीं. लेकिन बच्चा पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया.'
'जब दर्द देखा नहीं गया तो पिताजी कान्हू टुडू ने दूसरे लोगों के साथ मिलकर खटिया पर सुरजी को सुला दिया और चार-पांच लोग कंधे पर लादकर सात किलोमीटर (लगभग साढ़े तीन घंटा) तक पैदल चले.'
'इस दौरान रास्ते में बच्चा बाहर आ गया. लेकिन कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई. फिर पत्नी को लेकर परिजन अस्पताल पहुंचे, थोड़ी देर बाद वो भी मर गई.'
रोते हुए सुनील ने सवाल किया कि कब तक हम लोग ऐसे मरते रहेंगे, सड़क क्यों नहीं बनती है उनके गांव में?

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अधिक खून बह जान से नहीं मिला इलाज का मौक़ा
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने इस पूरे घटनाक्रम पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.
गिरिडीह के सिविल सर्जन डॉ सिद्धार्थ सान्याल ने बताया, 'घटना के संबंध में उनके स्तर पर जांच कमेटी बना दी गई है. जहां तक डॉ काजिम खान के अनुपस्थित रहने का सवाल है, शाम चार बजे वह खाना खाने गए थे. वहीं डॉ सालिक जमाल क्यों मौजूद नहीं थे, इसकी जानकारी नहीं है. दोनों से ही स्पष्टीकरण पूछा गया है. ये जानकारी मिली है कि इन दोनों ने फोन भी नहीं उठाया. कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद इनपर कार्रवाई होगी.'
उन्होंने यह भी बताया कि घटना के दो दिन पहले इलाक़े की एएनएम ने प्रसूता की जांच की थी. हालांकि परिजन इससे इंकार कर रहे हैं.
डॉ काजिम खान ने बताया, 'उस दिन डॉ अरविंद कुमार की ड्यूटी थी. लेकिन वो एक बैठक में शामिल होने गिरिडीह ज़िला मुख्यालय चले गए थे. ऐसे में उनकी जगह मैं ड्यूटी पर था. सुबह नौ बजे से तीन बजे तक मैंने ओपीडी में मरीजों को देखा था. पौने चार बजे इमर्जेंसी में एक मरीज को देखा था. चूंकि तीन बजे के बाद ड्यूटी खत्म हो जाती है. इसके बाद केवल इमर्जेंसी में मरीज़ आने पर ऑन कॉल उपलब्ध होता हूं. इसलिए चार बजे के बाद अस्पताल से किलोमीटर दूर खाना घाने घर चला गया था.'
उन्होंने यह भी बताया कि सुरजी के आने के बाद नर्स ने जैसे ही नाल काटा उसकी मौत हो गई. क्योंकि उन्हें पोस्टपार्टम हेमरेज यानी डिलिवरी के बाद ब्लीडिंग अधिक होने की शिकायत थी, ऐसे में ट्रीटमेंट का मौका ही नहीं मिला.
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़ गिरिडीह जिले में एक सदर अस्पताल के अलावा 12 सीएचसी, 12 पीएचसी, 2 फर्स्ट रेफरल यूनिट और 180 हेल्थ सब सेंटर हैं. ज़िले की आबादी 24 लाख 45 हज़ार है. यानी दो लाख 38 हज़ार लोगों पर एक सीएचसी और इतने ही लोगों पर एक पीएचसी हैं.
साल 2011 की जनसंख्या के मुताबिक़, झारखंड की आबादी 3.3 करोड़ है. स्वास्थ्य केंद्रों को देखें तो ज़िला अस्पतालों की संख्या 24, सब डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल 12, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) 188, हेल्थ सब सेंटर 3876 है.
यानी प्रति 8514 एक हेल्थ सब सेंटर है. वहीं नेशनल हेल्थ सर्वे के मुताबिक़ 18,518 व्यक्ति पर एक डॉक्टर हैं.

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आखिर गांव तक सड़क क्यों नहीं है?
गांव लोकाय पंचायत का हिस्सा है. पंचायत की मुखिया मंजू देवी के पति सोमा मुर्मू ने बताया, 'बरदौनी गांव से लक्ष्मीबथान टोला की दूरी पांच किलोमीटर है. यह टोला पूरी तरह से जंगल में है. वहां तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है. स्वास्थ्यकर्मी बरदौनी गांव तक ही पहुंच पाते हैं.'
उनके मुताबिक़, कुल 32 घर और लगभग 100 लोगों की आबादी वाले लक्ष्मीबथान में दलित और आदिवासी लोग ही रहते हैं. यहां कई बार मनरेगा से सड़क बनाने की पहल हुई, लेकिन वन विभाग ने इसकी अनुमति नहीं दी. यही वजह है कि यहां पीने का पानी भी मुहैया नहीं कराया जा सका है. उन्होंने यह भी बताया कि उनके पंचायत में एक स्वास्थ्य केंद्र सालों पहले बना, अब वह खंडहर बन चुका है.
झारखंड सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़ राज्य में इस वक्त 75 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 2 अनुमंडलीय अस्पताल, 158 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 394 स्वास्थ्य उपकेंद्र, बनकर तैयार हैं. लेकिन मानव संसाधन के अभाव में इनका संचालन नहीं हो पा रहा है.
तीसरी ब्लॉक की कुल आबादी 73,604 है. इसमें महिलाओं की संख्या 37,148 है. यहां आदिवासियों की संख्या 16,495 है, जिसमें महिलाओं की संख्या 8,310 है.
इलाक़ा खोरीमहुआ अनुमंडल के अंतर्गत आता है. एसडीओ धीरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि उन्होंने मृतका के परिजनों से मुलाक़ात की है. हालांकि किसी तरह की आर्थिक सहायता मुहैया नहीं कराई गई है. ग्रामीणों ने सड़क और कुआं की मांग की है, इसके लिए बीडीओ को आदेश दिया गया है.

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झारखंड वनाधिकार मंच के संयोजक सुधीर पाल के मुताबिक़, झारखंड में लगभग 11,000 हजार गांव हैं जिनके अंदर जंगल हैं. वहीं डिस्ट्रिक सेंसस हैंडबुक 1971 के मुताबिक़ फॉरेस्ट विलेज की संख्या राज्य में 35 हैं, जिसमें चाइबासा में 27 और लातेहार में आठ हैं.
जंगल में मौजूद गावों के साथ कई समस्या है. अगर वो वनग्राम हैं तो वन विभाग वहां के विकास के लिए ज़िम्मेदार होता है. अगर राजस्व ग्राम है तो ज़िला प्रशासन उसके विकास के लिए ज़िम्मेदार होता है.
वो कहते हैं, अगर फॉरेस्ट राइट एक्ट लागू होता, तो इन इलाक़ों में विकास संभव हो पाता, क्योंकि एक्ट में ये प्रावधान है कि ऐसे इलाक़ों के लिए सभी विभाग मिलकर काम कर सकेंगे.
एसडीओ धीरेंद्र कुमार के मुताबिक़, लक्ष्मीबथान बरदौनी गांव का हिस्सा है, वह नोटीफाइड विलेज है. ऐसे गांव में विकास पहुंचाने की ज़िम्मेदार सीधे तौर पर ज़िला प्रशासन की होती है. वन विभाग की नहीं. मैं ये मानता हूं कि काफी सूदूर होने की वजह से यहां अभी तक सड़क, बिजली, पानी नहीं पहुंच पाई है. उन्हें खुद लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर गांव पहुंचना पड़ा.

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राज्य के पहले सीएम के घर से 15 किमी दूर है गांव
जानकारी के मुताबिक़ यह गांव धनवार विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है. यहां के विधायक राज्य के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी हैं. बाबूलाल कोदईबांक गांव के रहने वाले हैं.
लक्ष्मीबथान से इसकी दूरी 15 किलोमीटर है. इस पूरे मसले पर बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'जंगल में जो छोटे गांव हैं वहां तक सड़क पहुंचाने में सरकार कामयाब नहीं हो पाई है. पिछले एक साल से तो विकास का काम ही बंद है. जब मैं सीएम था उस वक्त बड़ी संख्या में शहरी और ग्रामीण इलाकों तक सड़क पहुंचाया था, लेकिन उसके बाद से अब तक सत्ता से बाहर ही हूं.'
उन्होंने यह भी कहा कि, 'जंगल में बसे छोटे गांव वोट के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते हैं, ऐसे में सत्ता इनके प्रति उदासीन रहती है. हम तो बाहर से हल्ला ही कर सकते हैं. जहां तक विधायक निधि से सड़क बनने की बात है, तो यह मुश्किल है. क्योंकि एक किलोमीटर सड़क बनने में ही 30-40 लाख रुपया खर्च हो जाता है और हमें मिलता है चार करोड़ रुपए. हालांकि विधानसभा सत्र खत्म होने के बाद मैं उस गांव मे जाऊंगा, किसी भी योजना से हो, सड़क पहुंचाने का प्रयास करूंगा.'
सुनील टुडू और उनकी पत्नी ने इस बच्चे का नाम तय नहीं किया था. सुनील के मुताबिक़ पत्नी ने कहा था जब होगा तब सोचेंगे. फिलहाल तो पूरा गांव बस एक अदद सड़क के बारे में सोच रहा है.
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