कोरोना: सड़क किनारे मां बनी मज़दूर औरत, थोड़ी देर सुस्ताकर फिर पैदल चल घर पहुंची

शकुंतला और राकेश का परिवार
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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

सिर पर सामान की गठरी, गोद में दो साल की बच्ची और उसके पीछे तीन और छोटे बच्चे जिनमें सबसे बड़ा सात साल का है. ये शंकुतला और राकेश का परिवार है जो पैदल ही महाराष्ट्र के नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए रवाना हुआ.

ऐसे हज़ारों मज़दूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे. फ़र्क ये था कि शकुंतला गर्भवती थीं. गर्भ का नौवां महीना शुरू हो चुका था और रास्ता बहुत लंबा था.

जहां ये परिवार काम करता था वहां अन्न का एक दाना नहीं बचा था और चार बच्चों को खाना खिलाने के लाले पड़ चुके थे. दिहाड़ी मज़दूरी का काम करने वाले राकेश को एक दिन के 400 रुपये और शकुंतला को 300 रुपये मिलते थे.

कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडॉउन को एक महीने से ज़्यादा हो चला था और इसके खुलने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं नज़र आ रहे थे.

लॉकडाउन में घर लौटते लोग

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'कोई रास्ता नहीं रहा तो चल पड़े'

नासिक से गांव के कुछ और मज़दूर लौट रहे थे. गांव लौटने वाली ये दूसरी टोली थी. शकुंतला और उनके पति राकेश ने परिस्थितियों के सामने हार मानते हुए इसी टोली के साथ पैदल ही अपने गांव उचेहरा लौटने के लिए हामी भर दी.

शकुंतला बताती हैं, “मुझे लगा था कि 10-15 दिन में बच्चा होगा. इतना नहीं सोचा था कि बच्चा होने वाला है. खाने-पीने का सामान सब ख़त्म हो गया था. बस हम तो किस्मत पर छोड़कर चल दिए कि अब जो होगा भगवान भरोसे है.”

राकेश बताते हैं, ''हम सुबह चले और रास्ते में हमें लोग बिस्किट, खाने का सामान और पानी दे देते थे और हम चलते रहते थे. हमारे साथ महिला और पुरुष मिलाकर पैदल 18 लोगों की टोली थी. साथ में उनके बच्चे थे. हम लोग लगभग 60 किलोमीटर चले होगें और शाम होने लगी थी. मेरी पत्नी ने दर्द की शिकायत की और कहा कि लगता है बच्चा पैदा होने वाला है. लेकिन ना वहां कोई अस्पताल था, ना नर्स और ना कोई दाई.''

कई मुश्किलों से जूझता ये परिवार बीच रास्ते में था कि उसके सामने एक और चुनौती आ गई.

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'बच्चा घर में हो या बाहर, हमारे लिए एक ही बात'

शकुंतला बताती हैं, “इस टोली में मौजूद महिलाएं मुझे सड़क किनारे पेड़ के नीचे ले गईं और जल्दी ही मेरी बच्ची हो गई. बच्ची की नाल महिलाओं ने कैंची से काट दी और उसे साड़ी से साफ़ कर के मुझे दे दिया. हम लोगों ने क़रीब एक घंटा आराम किया और फिर चलना शुरू कर दिया.”

लेकिन क्या डर नहीं लगा कि बच्ची को कुछ हो जाता या आपकी जान को ख़तरा हो जाता तो?

इस सवाल पर शकुंतला ने कहा, “मेरे चार बच्चे भूखे मर रहे थे. ग़रीब मेहनत नहीं करेगा तो कैसे कमाएगा? बच्चा घर पर होता या बाहर हमारे लिए तो ये एक ही बात है.“

हालांकि, पति राकेश का कहना था कि वो डर गए थे कि अगर मां को कुछ हो जाता तो चार बच्चों का क्या होता. अब उन्हें इस बात का दिलासा है कि मां-बच्चा दोनों ठीक हैं.

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'पत्नी थक जाती, उसे हिम्मत बंधाता रहा..'

राकेश बताते हैं, ''बच्ची होने के बाद जब हम चल रहे थे तो कई बार शकुंतला ने कहा कि बहुत थक गई है और अब चला नहीं जा रहा है लेकिन मैं उसे हिम्मत बंधाता और धीरे-धीरे चलने के लिए कहता. इसके बाद हम क़रीब 150 किलोमीटर और चले और हम से चेकपॉइंट पर पूछताछ हुई. लोगों ने बताया कि इस टोली में एक महिला भी है जिसने नवजात को जन्म दिया है. तब हमें रात में एक कॉलेज में ठहराया गया."

बच्ची को जन्म देने के बाद शकुंतला 150 किलोमीटर पैदल चलीं तब जाकर परिवार महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश सीमा से लगे क्षेत्र बिजावन पहुंचा.

ज़िला सतना में ब्लॉक मेडिकल ऑफ़िसर एके राय का कहना है, “हमें ये सूचना मिली थी कि मज़दूरों की एक टोली नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए चली है. हमें ये भी जानकारी मिली थी कि उसमें एक गर्भवती महिला भी है और हम इस टोली के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे. ये महिला क़रीब 60 किलोमीटर चली होंगी कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई और इस टोली में मौजूद महिलाओं की मदद से इसने एक बच्ची को जन्म दिया.”

एके राय का कहना है कि वो ख़ुद वहां जननी सुरक्षा सेवा की गाड़ी के साथ गए.

वो बताते हैं, ''शकुंतला गोद में बच्ची को लेकर बहुत बहादुरी के साथ खड़ी हुई थीं. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उन्होंने पूरी जांच करवाई और कोविड टेस्ट भी कराया. बच्चे को जन्म के बाद दिए जाने वाले सभी टीके दिये जा चुके हैं. शकुंतला का हिमोग्लोबिन 9.8 है. उन्हें विटामिन और अन्य सप्लीमेंट्स दिए गए हैं. फ़िलहाल, जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं और उन्हें छुट्टी दे दी गई है.

ज़िला कलेक्टर ने भी परिवार को 10 हज़ार रुपये और खाने-पीने का सामान दिया है.

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'गांव में ही तलाशेंगे रोज़गार'

राकेश अपने परिवार के साथ अब अपने गांव पहुंच चुके हैं. बच्ची का क्या नाम रखा इस पर वो कहते हैं कि अभी सोचा नहीं है.

तो फिर अब छह लोगों का परिवार पालने के लिए क्या करेंगे? राकेश कहते हैं कि अभी गुज़ारा करने के लिए गांव में ही कुछ काम तलाशेंगे. हालांकि, काम मिल जाए इसकी संभावना कम है इसलिए जैसे ही लॉकडाउन हटेगा वो वापस काम की तलाश में अपना गांव छोड़ देंगे.

प्रवासी मज़दूरों के लिए सरकार ने विशेष ट्रेनों का इंतज़ाम किया है ताकि वो अपने घर पहुंच सकें लेकिन इसके बावजूद कई इलाकों से मज़दूरों के पैदल ही अपने घर की राह पकड़ने की ख़बरें लगातार आ रही हैं. मुमकिन है कि उनमें भी कोई शंकुतला हो जिसे मदद की सख़्त ज़रूरत हो.

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