दीप सिद्धू और हिंसा पर क्या बोले किसान नेता टिकैत और उगराहां

दिल्ली

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दिल्ली पुलिस ने मंगलवार के दिन गणतंत्र दिवस के दिन लाल क़िले समेत दिल्ली के अन्य इलाक़ों में हुई हिंसा के मामले में 25 से अधिक मामले दर्ज किए हैं, 19 लोगों को गिरफ़्तार और 50 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया है.

दिल्ली पुलिस का आरोप है कि किसान नेताओं ने ट्रैक्टर रैली के दौरान उन वादों को पूरा नहीं किया जो उन्होंने दिल्ली पुलिस से किए थे.

वहीं, बीबीसी के साथ बातचीत के दौरान किसान नेताओं ने कहा है कि ये जो कुछ भी हुआ है, वो सब कुछ सोची समझी रणनीति के तहत हुआ है और इसके लिए सरकार ज़िम्मेदार है.

किसान नेताओं ने पुलिस के आरोपों पर क्या कहा है, ये जानने से पहले पढ़िए उन आरोपों के बारे में जो पुलिस ने किसान नेताओं और आंदोलनकारियों पर लगाए हैं.

लाल किला

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दिल्ली पुलिस ने क्या कहा है?

दिल्ली पुलिस ने इस घटना से जुड़े जानकारी स्पष्ट रूप से रखने के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें घायलों की संख्या और 26 जनवरी की घटना से जुड़ी बातें बताई गईं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एस.एन. श्रीवास्तव ने कहा, "कुल मिलाकर 394 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. कुछ अभी भी आईसीयू में भर्ती हैं. पुलिस के 428 बैरिकेड्स, 30 पुलिस की गाड़ियां, 6 कंटेनर्स और 8 टायर किलर्स को नुक़सान पहुंचा है. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया. लाल क़िले पर फहराए गए धार्मिक झंडे की घटना को गंभीरता से लिया गया है. फ़ेस रिकग्निशन सिस्टम से लोगों की पहचान हो रही है, जिन पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी."

श्रीवास्तव ने इस दौरान उन शर्तों के बारे में जानकारी दी जिनके आधार पर ट्रैक्टर मार्च की इजाज़त दी गई थी.

वे कहते हैं, "पहली शर्त थी कि किसान ट्रैक्टर रैली दोपहर 12 बजे शुरू होगी और शाम पांच बजे तक ख़त्म होगी. दूसरी शर्त थी कि ट्रैक्टर मार्च किसान नेता लीड करेंगे और आगे की पंक्ति में होंगे और यह भी तय हुआ कि हर जत्थे के साथ उनके नेता चलेंगे."

पुलिस कमिश्नर का दावा है कि उन्हें 25 जनवरी की शाम पता चला कि किसान नेता अपने वादे से मुकर रहे हैं.

श्रीवास्तव ने बताया, "उन्होंने उग्रवादी धड़े को आगे कर दिया और भड़काऊ भाषण दिए जिसके बाद उनकी मंशा साफ़ हो गई लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस ने संयम से काम लिया. सुबह साढ़े 6 बजे से बैरिकेड तोड़ना शुरू हो गया."

"सिंघु बॉर्डर पर सुबह साढ़े सात बजे रैली शुरू हो गई और उस रैली को मुकरबा चौक से बाएं नहीं मुड़ना था लेकिन वो मुड़ गए. सतनाम सिंह पन्नू ने मुकरबा चौक पर भड़काऊ भाषण दिया जिसके बाद उनके समर्थक बैरिकेड तोड़ने लगे. दर्शन पाल सिंह आकर वहां बैठ गए और उन्होंने दाहिने मुड़ने से मना कर दिया. टिकरी बॉर्डर और गाज़ीपुर बॉर्डर से भी प्रदर्शनकारी साढ़े आठ बजे चलना शुरू हो गए."

"पुलिस के पास सभी विकल्प थे लेकिन उसने संयम का रास्ता चुना क्योंकि हम जानोमाल की हानि नहीं चाहते थे. हमारे और उनके बीच में समझौता था कि हम शांतिपूर्ण रैली करवाएंगे और यह जो हिंसा हुई है वो नियम और शर्तों के उल्लंघन के कारण हुई है. इस हिंसा में सभी किसान नेता शामिल हैं."

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क्या कहते हैं किसान नेता?

मंगलवार को सुबह से ही ट्रैक्टर रैली कवर कर रहे पत्रकार समीरात्मज मिश्र ने बीबीसी हिंदी के लिए किसान नेता राकेश टिकैत से बात की.

इस बातचीत में राकैश टिकैत ने बताया कि सुबह सुबह जो कुछ हुआ, उसकी शुरुआत कैसे हुई.

वे कहते हैं, "हमने उनसे अक्षरधाम मंदिर वाला रूट मांगा था. हमने कहा था कि हम अक्षरधाम मंदिर एनएच 24 होते हुए जाएंगे और उसी से वापस आ जाएंगे. वहां पर एक कट है, हम उसे इस्तेमाल कर लेंगे. हमारे लोग दो लाइनों में इस रूट पर चलेंगे. और जो नौ नंबर हाईवे है, उस पर हमारी मीडिया की, सुरक्षाकर्मियों की, जो हमारे वॉलिंटियर हैं- उस पर लगवा देंगे. इससे हमें कोई दिक़्क़त नहीं होगी."

"लेकिन उन्होंने वो भी नहीं दिया. उन्होंने कहा कि आपको गाज़ीपुर से आनंदविहार से होते हुए सीधा सीमापुरी की तरफ निकल जाना है. रात को ये रूट तय करके उन्होंने हमें दे दिया और इसकी चिट्ठी हमें भिजवा दी. जब किसान सुबह ही यहां से गए, लगभग 9-10 बजे के आसपास. किसान जाने को हुए तो उस रूट पर बैरिकेडिंग लगा रखी थी."

"पुलिस ने हमें जो रूट दिया था, उसी रास्ते पर बैरिकेडिंग की गई. उन्होंने हमें ये नहीं बताया कि बैरिकेडिंग क्यों की गई. और तो और गहमने कहा कि पुलिस ने ये बैरिकेडिंग 12 या 1 बजे तो खोले, लेकिन रात तक भी ये नहीं खोले गए. अगर उन्हें 12 बजे बैरिकेडिंग खोलनी थी तो खोल देनी चाहिए थी. क्या उन्होंने 12 बजे वो बैरिकेडिंग खोली? पुलिस ने हमें जो रूट दिया था, उस रूट को रात तक भी नहीं खोला गया."

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इस सवाल के साथ टिकैत गेंद दिल्ली पुलिस के पाले में डाल देते हैं. वे दावा करते हैं कि इस हिंसा के लिए सरकार ज़िम्मेदार है.

वे कहते हैं, "कल की घटना में प्रशासन ने पूर्ण रूप से भ्रमित किया है. ये उनकी एक बड़ी साजिश थी कि रूट को इस तरह से बनाओ कि किसान दिल्ली में घुस जाएं."

वे आरोप लगाते हैं कि पुलिस ने जानबूझकर अक्षरधाम पर लोगों को जाने दिया, पुलिस इन लोगों को सपोर्ट कर रही थी. वहीं, लाल क़िले जाने के विषय पर टिकैत कहते हैं कि उनकी या उनके लोगों की लाल किल़ि जाने की योजना नहीं थी.

वे कहते हैं, "हमारे लोगों का लाल क़िले जाने का प्लान नहीं था. वो तो गाड़ियों के पीछे लगकर चले गए. हमारे ज़्यादा लोग नहीं गए हैं. लाल क़िले में पूर्ण रूप से दूसरे वाले बॉर्डर के कुछ लोग होंगे, जिनका उद्देश्य वहां जाना होगा. और लाल क़िला किसी के भी उद्देश्य में नहीं था. न हमारा था."

इस घटना की ज़िम्मेदारी लेने के सवाल पर राकेश टिकैत कहते हैं कि उनकी ज़िम्मेदारी ये थी कि किसानों को सुरक्षित तरीके से रैली के लिए लाओ और वापस पहुंचाओ.

वे कहते हैं, "हिंसा की ज़िम्मेदारी हमारी नहीं है. ये उसकी है जिसने लोगों को रोकने का काम किया. किसके कहने पर ये काम किया गया? आप रूट देकर भी उसे स्वीकार नहीं करोगे. किसी न किसी के कहने पर षड्यंत्र रचा गया है?"

"दीप सिद्धू की फोटो किसके साथ में वायरल हो रही है. साढ़े दस बजे तक ख़बर आ गई थी कि लाल क़िले पर लोग चले गए. और वो झंडा भी लगा दिया. और फिर फोटो किसके साथ में वायरल हो रही है. ये तो उन लोगों की पूर्व योजना थी."

"लाल क़िले पर जो हुआ वो सब कुछ ग़लत है. हम उसका समर्थन नहीं करते हैं. ये ग़लत हुआ है. वो जो दीप सिद्धू है, उसकी जांच करनी चाहिए."

एक ओर राकेश टिकैत, दीप सिद्धू की संलिप्तता की जाँच किए जाने की माँग उठा रहे हैं. तो दूसरी ओर बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा से बात करते हुए किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने लाल क़िला हिंसा को सरकार की चाल बताया है.

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'ये सरकार की चाल है'

जोगिंदर सिंह कहते हैं, "ये तो कोई सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी जानता है. कि गणतंत्र दिवस के दिन लाल क़िला पर कितनी सुरक्षा होगी. और वहां कोई मज़े से जाकर झंडा चढ़ा दे, ऐसा कैसे हो सकता है. मेरी 75 साल की उमर हो गई. मैंने तो पहली बार ऐसी चीज़ देखी."

"इतने बड़ा देश जिसके अंदर इतने सुरक्षा प्रबंध हों कि चींटी भी नहीं आ सकती, वहां लाल क़िले पर जाकर झंडा लगा दिया. और बाद में लाइव होकर व्यक्ति ने बात भी की."

दीप सिद्धू ने इस घटना के बाद एक वीडियो में बताया था कि ये घटना किस तरह घटित हुई. लेकिन रैली के लिए जल्दी निकलने को लेकर उगराहांका बयान, दिल्ली पुलिस के बयान से अलग है.

दिल्ली पुलिस जहां एक ओर कह रही है कि ट्रैक्टर मार्च की इजाज़त 12 बजे के बाद की थी, वहीं उगराहां बताते हैं कि उनके लिए पुलिस की ओर से सुबह के नौ बजे ही नाका खोल दिया गया था.

वे कहते हैं, "मैं 7 बजे निजामगढ़ नाके पर था. दिल्ली पुलिस ने 9 बजे अपने आप नाका खोला है. इसके बाद हम आगे बढ़े. हमें 9 बजे का समय दिया गया था."

राकेश टिकैत की तरह जोगिंदर सिंह उगराहां भी दीप सिद्धू की जांच किए जाने की माँग करते हैं.

वे कहते हैं, "संयुक्त मोर्चे की मीटिंग का जो फ़ैसला था, सभी जत्थेबंदियों ने वही फ़ॉलो किया. सरकार ने जो रास्ता दिया था, वहां पर ही मार्च किया. दूसरा कहीं किसी ने मार्च नहीं किया. जो लाल क़िले पर गई जनता है वो सरकार को पता है, सरकार का प्री-प्लान्ड प्रोग्राम था. वो लोग उनको गुमराह करके लेकर गए थे."

"दीप सिद्धू उनकी अगुआई कर रहा था. लाल क़िले पर झंडा लगाकर उसने इस बात को स्वीकार किया. वो सरकार की साजिश है. जत्थेबंदियों को हिंसक बनाने की कोशिश की गई है."

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राजनीतिक दलों को घेरते हुए उगराहां कहते हैं कि उनके लोगों ने नाके यानी बैरिकेडिंग नहीं तोड़ी.

वे कहते हैं, "हमने किसी को बैरिकेडिंग तोड़ते हुए नहीं देखा. ये राजनीतिक खेल है. ये जत्थेबंदियों का काम नहीं है. उन्होंने हिंसक कार्रवाई करनी होती तो दो महीने से कर दी होती. एक फूल नहीं तोड़ा किसी ने. ये हमारा काम नहीं हैं और पुलिस से पूछना चाहिए कि ये किसका काम है."

लेकिन उगराहां ये भी मानते हैं कि सरकार असल दोषियों की जगह अन्य लोगों पर कार्यवाही करेगी. वे कहते हैं, "लाल क़िले पर जिसने झंडा चढ़ाया है, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए. लेकिन सरकार उनके ख़िलाफ़ नहीं करेगी. सरकार दूसरे लोगों पर कार्रवाई करेगी. ये सरकार इसमें माहिर है."

उगराहां भीमा कोरेगाँव की हिंसा, एनआरसी का उदाहरण देते हुए अपने दावों को सही ठहराते हैं.

उनसे पूछा गया कि इस घटना से आंदोलन को क्या नुक़सान हुआ और आगे की रणनीति क्या है. इस सवाल पर वो कहते हैं कि "ये तो सही है कि आंदोलन को नुक़सान हुआ है, कुछ अनजान लोगों को ग़लतफहमियां हो गई हैं. लेकिन आंदोलन चलता रहेगा. सरकार भी दांव-पेंच चलाती रहेगी. हम उसे समझते रहेंगे."

"फिलहाल तो कई लोग गायब हैं, गिरफ़्तार हैं, उनका पता लगाना है. और ये तय हुआ है कि फिलहाल आंदोलन करते रहना ही हमारी अगली रणनीति है."

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