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अरविंद शर्माः नौकरी छोड़ कर बीजेपी में शामिल होने वाले आईएएस अधिकारी
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद क़रीबी और गुजरात कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी अरविंद शर्मा ने दो दिन पहले जब अचानक सेवा से अवकाश लिया तो यह बात तय मानी जा रही थी कि उन्हें बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार किसी राज्य या केंद्र में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देने जा रही है.
गुरुवार को अरविंद शर्मा ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और अब माना जा रहा है कि उन्हें पार्टी विधान परिषद में भेज सकती है और सरकार में कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी भी दे सकती है.
गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे अरविंद कुमार शर्मा फ़िलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त सचिव थे और अभी उनके रिटायरमेंट में दो साल बाक़ी थे. लेकिन उन्होंने उससे पहले ही वीआरएस लेकर बीजेपी का दामन थाम लिया.
अरविंद शर्मा 1988 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उन्होंने लगातार 18 साल काम किया है. साल 2001 से लेकर 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में और फिर 2014 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री कार्यालय में.
साल 2014 में वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आए और यहाँ उन्हें संयुक्त सचिव बनाया गया. फ़िलहाल वो पीएमओ में ही अतिरिक्त सचिव थे.
उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले की मोहम्मदाबाद गोहना तहसील के काझाख़ुर्द गाँव के रहने वाले अरविंद शर्मा की आरंभिक शिक्षा गांव में ही हुई.
इंटरमीडिएट तक स्थानीय कॉलेज में ही पढ़ाई करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन और फिर वहीं से राजनीति शास्त्र में पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री ली.
साल 1988 में उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हुआ और उन्हें गुजरात कैडर में तैनाती मिली.
साल 1995 में वह मेहसाणा के कमिश्नर बने और फिर साल 2001 में नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद शर्मा को मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव जैसी अहम ज़िम्मेदारी दी गई. तब से लेकर अब तक वो लगातार नरेंद्र मोदी के साथ हैं.
लखनऊ में पार्टी में शामिल होने के बाद मीडिया से अपनी संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने सिर्फ़ यही कहा कि पार्टी ने जो ज़िम्मेदारी दी है, उस पर वे खरा उतरने की कोशिश करेंगे.
उनका कहना था, "मेहनत और संघर्ष के बल पर मैंने आईएएस की नौकरी पाई. बिना किसी राजनीतिक बैकग्राउंड के व्यक्ति को राजनीतिक पार्टी में लाने का काम सिर्फ़ बीजेपी और नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं. पार्टी मुझे जो भी काम सौंपेगी, उस पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा."
अरविंद शर्मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद क़रीबी अधिकारी बताए जाते हैं. आमतौर पर चर्चा में बहुत कम रहने वाले अरविंद शर्मा को कोरोना वायरस संकट के दौरान भी अहम ज़िम्मेदारी दी गई.
इस दौरान उन्हें सूक्ष्म, लघु और मझौले उपक्रम यानी एमएसएमई मंत्रालय में सचिव के पद पर तैनात किया गया. यह वही समय था जब लॉकडाउन के दौरान लाखों श्रमिकों के सामने रोज़गार का संकट पैदा हो गया था और पलायन कर रहे मज़दूरों के सामने रोज़गार देना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी.
हालाँकि इस ज़िम्मेदारी को निभाने में वो कितने सफल रहे, इस पर सवाल भी उठ रहे हैं लेकिन अहम ज़िम्मेदारियों के पीछे प्रधानमंत्री से उनकी क़ुरबत को ही सबसे महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कहते हैं कि अरविंद शर्मा सरकारी सेवा में रहते हुए भी गुजरात और अपने गाँव में भी सामाजिक रूप से काफ़ी सक्रिय रहे हैं.
उनके मुताबिक़, "उनकी छवि एक ईमानदार अधिकारी की है और बीजेपी का भी यही इतिहास है. हमारा नेतृत्व ऐसे ही नेताओं ने किया है जो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति रहे हैं. देश में राजनीतिक दल बहुत होंगे लेकिन हमारे नेताओं के ऊपर कोई दाग़ नहीं लगा सकता. अरविंद शर्मा जी ने आज उसी पार्टी का झँडा थामा है. अच्छे अधिकारी और ईमानदार लोग पार्टी में आते हैं तो पार्टी का भी क़द बढ़ता है और ऐसे लोगों का भी क़द बढ़ता है."
अरविंद शर्मा के वीआरएस लेने के बाद से ही क़यास लगने लगे थे कि उन्हें सरकार में बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है. पार्टी में शामिल होने के बाद यह तय माना जा रहा है कि वह आने वाले विधान परिषद चुनाव में पार्टी की ओर से उम्मीदवार होंगे और फिर मंत्रिपरिषद में शामिल होंगे.
लेकिन राज्य बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं में अरविंद शर्मा की इस भूमिका को लेकर काफ़ी बेचैनी भी है क्योंकि यदि उन्हें मंत्रिपरिषद में शामिल किया जाता है तो वो शायद एकमात्र व्यक्ति हों जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक इतनी आसान और स्वाभाविक पहुँच हो.
वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "नेताओं के लिए तो चुनौती है ही. मंत्रियों के परफ़ॉर्मेंस से पीएम मोदी बहुत प्रसन्न नहीं हैं, यह सबको पता है. अरविंद शर्मा राजनीति में भले ही नहीं रहे हैं लेकिन प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ वो क़रीब बीस साल से नरेंद्र मोदी के साथ हैं तो राजनीतिक रूप से अनुभवहीन नहीं हैं. ऐसा लगता है कि नौकरशाही और राजनीति के बीच समन्वय की भूमिका के लिए ही उन्हें यहाँ भेजा जा रहा है. दूसरे मुख्यमंत्री योगी के लिए भी उनकी वजह से यह समझने में आसानी होगी कि प्रधानमंत्री को क्या पसंद है और क्या नहीं."
बीजेपी के कुछ नेताओं को पहले यही लग रहा था कि शायद उन्हें कहीं राज्यपाल बना दिया जाएगा या फिर किसी सलाहकारी भूमिका में सरकार के साथ जुड़ेंगे लेकिन पार्टी में शामिल होने के बाद सरकार और पार्टी में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर कोई आशंका नहीं रह गई.
विधानसभा चुनाव से पहले किसी दूसरी पार्टी से बीजेपी में शामिल हुए एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सरकार और पार्टी में केंद्रीय नेतृत्व की ही एक तरह से चलती है लेकिन अब सीधे तौर पर पीएमओ के अधिकारी को राज्य की राजनीति में भेजने का साफ़ मतलब है कि राज्य नेतृत्व की रही-सही भूमिका पर भी नकेल लग जाएगी.
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