You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत होने वाली शादी हुई आसान
फ़र्ज़ कीजिए कि दो लोगों को शादी करनी हो और वे अलग-अलग मज़हब से ताल्लुक़ रखते हों तो वे क्या करेंगे? घर वालों को मनाएंगे या फिर स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत मैरिज ऑफ़िसर के पास जाकर शादी के लिए अर्ज़ी देंगे.
क़ानून के अनुसार ये अर्ज़ी उन्हें शादी की तारीख़ से कम से कम महीने भर पहले देनी होती है. लेकिन बात इतनी ही आसान होती तो रेशमा और राजू (बदला हुआ नाम) को इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में नहीं जाना पड़ता.
दरअसल, स्पेशल मैरिज ऐक्ट ही ये कहता है कि मैरिज ऑफ़िसर इस अर्ज़ी को नोटिस की शक्ल में सरकारी दफ़्तर के नोटिस बोर्ड पर चस्पा करेगा. यानी छुप-छुपाकर शादी करने के लिए आने वाले जोड़ों का गुपचुप शादी करने का मक़सद यहां नहीं पूरा हो पाता.
वैसे लोग जो दूसरी जगह पर जाकर शादी करते हैं, इस क़ानून के अनुसार उनके होम टाउन के मैरिज ऑफ़िस के दफ़्तर में ये नोटिस लगाए जाएंगे. इस प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर मैरिज ऑफ़िसर को एक साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है.
लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ताज़ा फ़ैसले के बाद हालात बदलेंगे और रेहाना और राजू जैसे जोड़ों को शादी करने के लिए ऐसी किसी सार्वजनिक नोटिस की 'बाधा' से नहीं गुज़रना होगा.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस विवेक चौधरी की एकल पीठ ने इस मामले में फ़ैसला देते हुए कहा, "अगर स्पैशल मैरिज एक्ट से शादी करने की इच्छा रखने वाले अपने पार्टनर के बारे में और जानकारी लेना चाहते हैं तो वे सेक्शन 6 का इस्तेमाल करते हुए अपनी मर्ज़ी से नोटिस लगवाने का विकल्प चुन सकते हैं."
"ये उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा क्योंकि ये उन्होंने अपनी मर्ज़ी से चुना होगा. इसलिए सेक्शन 6 के तहत नोटिस लगवाना और सेक्शन 7 के तहत आपत्ति आमंत्रित करना शादी के इच्छुक लोगों की अपील पर ही संभव होगा, इसके अलावा नहीं."
"इसलिए कोर्ट ये अनिवार्य करती है कि जो लोग इस एक्ट के सेक्शन 5 के तहत शादी करने का नोटिस देते हैं तो उस वक़्त साथ ही साथ उनके पास मैरिज ऑफ़िसर से लिखित में ये अपील करने का भी विकल्प होगा कि वे अपनी शादी का नोटिस प्रकाशित करवाना चाहते हैं या नहीं."
"अगर वे प्रकाशित करवाने का कोई लिखित अनुरोध नहीं करते हैं तो मैरिज ऑफ़िसर उनकी शादी का नोटिस ना तो प्रकाशित करेगा और ना उस पर आने वाली आपत्ति का संज्ञान लेगा."
"हालांकि, मैरिज ऑफ़िसर को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करवाने से पहले दोनों पक्षों की पहचान, उम्र, रज़ामंदी और पात्रता सत्यापित करने का अधिकार है. अगर उसे कोई शक हो तो वह जानकारी और सबूत माँग सकता है."
रेशमा और राजू की कहानी
इस मामले में रेशमा ने राजू की मदद से कोर्ट को बताया कि उसने हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार हिंदू धर्म अपना लिया है लेकिन उसके पिता उसे उसके पति के साथ नहीं रहने दे रहे हैं.
रेशमा ने अपनी याचिका में कहा कि वे दोनों बालिग़ हैं, दोनों ने अपनी मर्ज़ी से शादी की है और दोनों एक दूसरे के साथ रहना चाहते हैं.
इसलिए पिता का उसे अपनी निगरानी में रखना ग़ैर-क़ानूनी है.
कोर्ट के सामने बुलाये जाने पर रेशमा ने ये बातें बताई और कहा कि वो अपने पति के साथ रहना चाहती है.
हालांकि अदालत के सामने रेशमा के पिता ने भी ये बात कही कि उनकी बेटी बालिग़ हो गई है और उसने अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली है और वे रेशमा के फ़ैसले को मंज़ूर करते हैं.
बड़े क़ानूनी सवाल
जस्टिस चौधरी ने अपने फ़ैसले में लिखा है कि रेशमा के पिता के इस शादी को मंज़ूर कर लेने के साथ ये मामला ख़त्म हो जाता लेकिन रेशमा और राजू ने कोर्ट को बताया कि वे स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत शादी करना चाहते थे. लेकिन इस क़ानून में 30 दिनों की एडवांस नोटिस देने की शर्त है और ऐसा करने पर पूरी दुनिया को पता लग जाता.
राजू और रेशमा का कहना था कि ऐसे नोटिस से उनकी प्राइवेसी का हनन होता और इससे उनकी शादी पर ग़ैर-ज़रूरी सामाजिक दबाव पड़ता. इन दोनों का ये भी कहना था कि उनकी जैसी स्थितियों में शादी करने की इच्छा रखने वाले लोगों को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने में दिक़्क़त आती है.
रेशमा और राजू के वकील ने कोर्ट को ये भी बताया कि 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020' की अधिसूचना जारी होने के बाद स्थिति और जटिल हो गई है क्योंकि ये क़ानून शादी के लिए धर्म-परिवर्तन पर रोक लगाता है.
कोर्ट ने इस पर कहा कि देश में ज़्यादातर शादियां लोगों के अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के तहत होती हैं और इसमें किसी नोटिस को प्रकाशित करने या इस पर लोगों की आपत्तियां मँगाने का कोई प्रावधान नहीं होता है. अगर कोई झूठ बोलकर या जानकारी छुपाकर शादी करता है तो ऐसी शादी किसी भी क़ानून में प्रतिबंधित है. ऐसी स्थिति पैदा होने पर अदालत कभी भी सुनवाई कर सकती है और इस तरह की शादी को ख़ारिज कर सकती है.
जस्टिस चौधरी ने अपने फ़ैसले के आख़िर में लिखा है, "चूंकि ये मामला एक बड़ी जनसंख्या के मौलिक अधिकार की सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट के सीनियर रजिस्ट्रार इस आदेश की कॉपी राज्य के प्रमुख सचिव तक पहुँचा दें जो राज्य के मैरिज अफ़सरों और संबंधित अधिकारियों को जल्द से जल्द इसे पहुँचाएंगे."
फ़ैसले में कहा गया है कि रेशमा के पिता ने भी दोनों को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)