झारखंड में आदिवासियों के हालात पर क्या बोले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना है कि कोरोना महामारी और सरकारी ख़ज़ाना ख़ाली मिलने की वजह से उनके गठबंधन द्वारा किए गए कई चुनावी वायदे पूरे नहीं हो सके हैं.
झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार ने 29 दिसंबर को राज्य की सत्ता में एक साल पूरे किए हैं.
इस गठबंधन में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अलावा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी शामिल हैं.
बीबीसी से ख़ास चर्चा करते हुए हेमंत सोरेन का कहना था कि जब उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली थी तो सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन कैसे दिया जाए?
क्योंकि उनका आरोप है कि उन्हें पिछली सरकार से ख़ाली ख़ज़ाना मिला था.

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रोज़गार का मुद्दा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं, "हमने बहुत सारे चुनावी वायदे ज़रूर किए थे. मगर सत्ता संभालते ही महामारी ने दस्तक दे दी. ये हमारे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण समय था. हमें काफ़ी कुछ सीखने को भी मिला. हमने चुनाव के समय वायदा किया था कि नई नौकरियों का सृजन करेंगे."
"मगर महामारी की वजह से सब कुछ बंद हो गया. लोगों के एक जगह जमा होने पर पाबंदी लग गई. इसलिए नई नौकरियों पर भी इसका असर पड़ा. सरकारी ख़ज़ाना ख़ाली मिला जिससे परेशानियां और बढ़ गईं."
फिर भी, वो दावा करते हैं कि पिछले एक साल के दौरान राज्य में रोज़गार के सात करोड़ मानव दिवस सृजित हुए हैं.
उनका कहना है कि सरकार ने बरोज़गारी भत्ता दने के योजना बनाई थी. इसकी शुरुआत शहरी क्षेत्रों से होने वाली थी.
अब वो कहते हैं कि जल्द ही सरकार शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में बेरोज़गारों को भत्ता दने के लिए एक कार्ययोजना बना रही है.

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मॉब लिंचिंग और पत्थलगड़ी आंदोलन
वहीं, राज्य के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने हेमंत सोरेन की सरकार के एक साल पूरे होने पर अलग से एक रिपोर्ट कार्ड जारी कर आरोप लगाया है कि सत्ता में आने से पहले हेमंत सोरेन ने पाँच लाख नई नौकरियां देने का वायदा किया था.
विपक्ष का कहना है कि इसके अलावा सरकार ने बेरोज़गारों को भत्ता, राज्य के पारा-शिक्षकों को स्थाई करने और किसानों की ऋण माफ़ी का भी वायदा किया था जो पूरा नहीं हुआ.
हेमंत सोरेन का कहना है कि उनकी सरकार, तेज़ी से इस दिशा में काम कर रही है और जल्द ही इन मामलों का समाधान किया जाएगा.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि पिछले साल चुनाव से पहले जो ज्वलंत मुद्दे थे उनमें राज्य के अंदर भूख से हो रहीं मौतें, मॉब लिंचिंग की घटनाएं और पत्थलगड़ी करने वाले आदिवासियों के ख़िलाफ़ देशद्रोह के मुक़दमे थे.
वो कहते हैं कि अब एक साल के बाद ना तो भूख से होने वाली मौतों की बात सामने आ रही है और ना ही मॉब लिंचिंग की घटनाएं ही हो रही हैं. जहां तक पत्थलगड़ी के दौरान दर्ज मामलों की बात है तो हेमंत सोरेन कहते हैं कि 60 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो चुका है जबकि कुछ मामले बचे हैं जिनका पुनरावलोकन चल रहा है.

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कोरोना महामारी
दूसरी तरफ़, विपक्ष का ये भी आरोप है कि राज्य सरकार को केंद्र सरकार से स्वास्थ्य के मद में 200 करोड़ रुपये मिले थे उनका इस्तेमाल सही से नहीं हो पाया है.
हेमंत सोरेन ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि जो पैसा झारखण्ड को केंद्र से मिला वो कोरोना महामारी के मामलों से निपटने में ही ख़र्च हुआ है.
हेमंत सोरन कहते हैं, "हमें अब अपने सूत्रों से पता चला है कि केंद्र सरकार कोविड-19 के निपटने के लिए लगाए जाने वाले टीकों के लिए पैसे नहीं देने वाली है. राज्य सरकार को ही अपने बजट से लोगों के टीकाकरण की व्यवस्था करनी होगी. हमारे लिए ये दूसरी बड़ी चुनौती है."
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वीकार किया है कि उनके राज्य में आदिवासी अब भी ख़ुद को हाशिये पर ही पाते हैं जबकि अलग राज्य बनने के बाद उनकी स्थिति बेहतर होनी चाहिए थी.
हेमंत के अनुसार पिछले 100 सालों से राज्य के आदिवासियों की ज़िंदगियां कुछ बेहतर नहीं हो सकी हैं. उनका कहना था कि आदिवासियों के परंपरागत जंगल के उत्पादों में न तो कोई वृद्धि हुई ना उनके लिए रोज़गार और शिक्षा के ही नए रास्तों का सृजन हो पाया.

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विपक्ष के आरोपों पर...
मिसाल के तौर पर हेमंत सोरेन बताते हैं, "आदिवासी कभी भी बैंक के भरोसे नहीं रहा है. वो अपने पालतू जानवरों पर ही भरोसा रखता था जिसे ज़रूरत होने पर वो बेच सकता था. आज पशुपालन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ग्रामीण और जंगल के इलाक़ों में ना पशुधन है और ना ही उनको पालने के उपाय ही किए गए हैं. कई ऐसे उत्पाद हैं जैसे लाह जो झारखंड में ही पाए जाते हैं, जिनके उत्पादन पर ध्यान देने से रोज़गार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं."
हेमंत का कहना है कि इन्हीं सब परिस्थितियों को देखते हुए उनकी सरकार ने जनजातीय समुदाय के ऐसे छात्रों के लिए छात्रवृति की घोषणा की है जो विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं.
विपक्ष, हेमंत सोरेन की सरकार को इस बात पर भी घेर रहा है कि उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया है. इस पर हेमंत कहते हैं कि झारखण्ड में विधानसभा में सीटों के अनुपात में 12 मंत्री होने चाहिए. मगर उनकी सरकार का काम 11 मंत्रियों से ही चल जाएगा.

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किसानों की क़र्ज़ माफ़ी
जहां तक विपक्ष के नेता के रूप में भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी को मान्यता नहीं देने की बात है तो हेमंत सोरेन का इस पर कहना है, "बाबूलाल मरांडी झारखंड विकास मोर्चा से चुनाव लड़े थे और जीते थे. उसके बाद वो कैसे भाजपा में शामिल हो गए? अब ये मामला विधिसंगत है या नहीं इसकी जाँच चल रही है."
"नेता प्रतिपक्ष के नहीं होने की वजह से हमें भी परेशानी हो रही है क्योंकि कई ऐसे संवैधानिक पद हैं, जैसे सूचना आयुक्त इत्यादि, जिनकी नियुक्ति के लिए नेता प्रतिपक्ष का होना ज़रूरी है."
"भारतीय जनता पार्टी में कई बड़े नेता हैं और पार्टी चाहती तो किसी दूसरे नेता का नाम, नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए सुझाती. मगर उसने ऐसा नहीं किया है. भाजपा नहीं चाहती है कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर जल्द नियुक्तियां की जा सकें."
जहां तक किसानों की ऋण माफ़ी की बात है तो हेमंत सोरेन कहते हैं कि इस बारे में उनके मंत्रिमंडल ने प्रस्ताव पारित कर दिया है जिसके तहत नौ लाख किसानों के पचास हज़ार तक के लिए गए क़र्ज़ को माफ़ कर दिया जाएगा.
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