सौरव गांगुली और राज्यपाल की मुलाक़ात से गरमाई पश्चिम बंगाल की राजनीति

सौरव गांगुली

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय क्रिकेट टीम का नेतृत्व करने वाले पश्चिम बंगाल के इकलौते क्रिकेटर और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) अध्यक्ष सौरव गांगुली के राजनीति में शामिल होने की अटकलें तो वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों से ही लगती रही हैं.

लेकिन रविवार को राजभवन में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ दो घंटे तक चली सद्भावना मुलाक़ात के बाद प्रिंस ऑफ़ कोलकाता के राजनीति में उतरने और अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में बीजेपी का चेहरा बनने के क़यास अचानक तेज़ हो गए हैं.

हालांकि सोमवार सुबह दिल्ली रवाना होने से पहले एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने पलट कर सवाल दाग़ा, “क्या मैं किसी से बात नहीं कर सकता हूँ?”

सौरव रविवार को शाम अचानक राजभवन पहुँचे और राज्यपाल के साथ लंबी बैठक की. लेकिन राज्यपाल जदगीप धनखड़ ने जिस तरह बीते साल कार्यभार संभालने के बाद से ही ममता बनर्जी और उनकी सरकार के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया अपना रखा है, उसकी वजह से इस मुलाक़ात को लेकर अटकलें अचानक तेज़ हो गईं.

कोई क़यास न लगाए – सौरव

लेकिन राजभवन से बाहर निकलने पर सौरव ने कहा, “यह सद्भावना मुलाक़ात थी. बीते साल से कार्यभार संभालने के बावजूद राज्यपाल ने अब तक ईडेन का दौरा नहीं किया था. इसलिए मैं उनको इसका न्योता देने आया था.”

एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि बैठक में क्रिकेट से इतर किसी मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई. बीसीसीआई प्रमुख ने कहा, “इस सद्भावना मुलाक़ात पर कोई क़यास मत लगाए. अभी राज्यपाल के ईडेन दौरे की तारीख़ तय नहीं हुई है.”

लेकिन दूसरी ओर, राज्यपाल ने इस मुलाक़ात के बाद जारी बयान में कहा, “दादा के साथ बैठक के दौरान ईडेन गार्डेन के दौरे के अलावा विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई." लेकिन बयान में बाक़ी मुद्दों के बारे में जानकारी नहीं दी गई है.

राज्यपाल धनखड़ ने बताया कि उन्होंने ईडेन गार्डेन के दौरे का न्योता स्वीकार कर लिया है. बीसीसीआई अध्यक्ष के अपने गृह राज्य के राज्यपाल को ईडेन गार्डेन जैसे ऐतिहासिक स्टेडियम के दौरे का न्योता देने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन सवाल इसकी टाइमिंग पर उठ रहे हैं. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बंगाल की राजनीति लगातार गरमा रही है. यही वजह है कि गांगुली की राजनीति में एंट्री के क़यास तेज़ हो रहे हैं.

सौरव गांगुली

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पहले भी लगते रहे हैं क़यास

वैसे, यह पहला मौक़ा नहीं है, जब सौरव के राजनीति में उतरने के क़यास लग रहे हों. साल 2011 के विधानसभा चुनावों के समय सौरव के सीपीएम और टीएमसी में शामिल होने की चर्चाओं ने भी ज़ोर पकड़ा था.

उनको लेफ़्ट नेताओं का क़रीबी माना जाता था. वाममोर्चा सरकार ने सौरव को कोलकाता के पूर्वी इलाक़े में स्कूल के लिए एक प्लॉट भी दिया था. लेकिन उसके क़ानूनी पचड़ों में उलझने की वजह से वह नहीं मिल सका. बाद में टीएमसी सरकार ने उनको इसी काम के लिए सॉल्टलेक में दो एकड़ का एक प्लॉट दिया था. सौरव ने इस साल अगस्त में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाक़ात कर वह प्लाट लौटा दिया था.

उस समय भी उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगी थीं. सौरव कहते हैं, “मुख्यमंत्री से मुलाक़ात के बाद भी मेरे राजनीति में उतरने के क़यास लगाए जा रहे थे. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ.” उससे पहले ममता बनर्जी की पहल पर ही सौरव को क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल (सीएबी) का अध्यक्ष बनाया गया था.

बीते साल अक्तूबर में सौरव के बीसीसीआई अध्यक्ष बनाने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत तीन केंद्रीय मंत्रियों के अहम भूमिका निभाने की चर्चा सामने आई थी.

हालांकि तब सौरव ने कहा था कि उनके चयन में राजनीति की कोई भूमिका नहीं रही है. लेकिन उसके बाद से ही क़यास लगने लगे थे कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में ही सौरव बीजेपी का चेहरा बन सकते हैं. हालांकि सौरव बार-बार राजनीति की पिच पर बैटिंग की संभावनाओं को नकारते रहे हैं.

इस साल मार्च में राज्य सरकार से सलाह लिए बिना ईडेन गार्डेन में होने वाले एक-दिवसीय मैच को रद्द करने पर ममता ने सौरव औऱ बीसीसीआई की आलोचना की थी. वैसे. सौरव ने अब तक राजनीति में उतरने या किसी ख़ास पार्टी के प्रति लगाव के बारे में कोई संकेत नहीं दिया है लेकिन उनकी पत्नी डोना गांगुली ने हाल में कहा था, “सौरव क्या करेंगे, यह मैं नहीं जानती. लेकिन अगर वे राजनीति की पिच पर भी उतरेंगे, तो शीर्ष पर ही रहेंगे.”

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सौरव को लेकर बँटी राय

उनके इस बयान को अब अमित शाह के इस हालिया बयान के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है कि कोई बंगाली ही राज्य का अगला मुख्यमंत्री होगा. लेकिन क्या सौरव के बीजेपी में शामिल होने से कोई बड़ा उलटफेर की संभावना है? इस सवाल पर लोगों की राय बँटी हुई है.

खेल पत्रकार तपन दत्त कहते हैं, “सौरव क्रिकेट की पिच पर तो देश के सबसे कामयाब कप्तानों में शुमार रहे हैं. सीएबी और बीसीसीआई प्रमुख के तौर पर भी उनकी पारी बेदाग़ ही रही है. इसके अलावा वे एक टीवी शो में भी काम कर चुके हैं. बंगाल में उनकी लोकप्रियता के बारे में संदेह की कोई गुंज़ाइश नहीं है. लेकिन क्या राजनीति उनके लिए मुफ़ीद होगी, सौरव के किसी फ़ैसले से पहले इस सवाल पर टिप्पणी करना सही नहीं होगा.”

एक क्रिकेटर के तौर पर लंबे अरसे तक सौरव को कवर करने वाले शुभ्रदीप साहा कहते हैं, “इस बात में कोई शक नहीं है कि सौरव की छवि बेदाग़ रही है. उन्होंने अब तक किसी भी राजनीतिक दल के साथ क़रीबी नहीं ज़ाहिर की है. वे तमाम दलों के नेताओं के साथ मिलते-जुलते रहे हैं.”

साहा कहते हैं कि पहले भी कई बार उनके राजनीति में उतरने की अटकलें लगी थीं. लेकिन अब तक कुछ साफ़ नहीं है. महज़ एक मुलाक़ात से किसी नतीजे पर पहुँचना सही नहीं है. साहा का कहना है कि क्रिकेट के मैदान की तरह राजनीति के मैदान पर भी दादा कोई भी फ़ैसला सोच-समझ कर ही लेंगे.

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हालाँकि अगर वे राजनीति में उतरते हैं तो यह कोई अजूबा नहीं होगा. लेकिन यह फ़ैसला ख़ुद दादा को ही करना है. गौतम गंभीर समेत कई क्रिकेटर राजनीति की पिच पर भी कामयाब रहे हैं. ताज़ा घटनाक्रम पर ममता बनर्जी या टीएमसी ने कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन इससे पहले टीएमसी सांसद और पार्टी के प्रवक्ता सौगत राय कह चुके हैं कि दादा का राजनीति में उतरना अच्छा नहीं होगा.

राय का कहना था, “अगर वह राजनीति में आते हैं, तो मुझे ख़ुशी नहीं होगी. सौरव गांगुली सभी बंगालियों के लिए एक आइकन हैं, क्योंकि वो बंगाल से इकलौते क्रिकेट कप्तान रहे हैं वह टीवी शो के कारण भी मशहूर हैं. लेकिन कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं होने की वजह से गांगुली यहाँ नहीं टिक पाएँगे.”

दूसरी ओर, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने इस बारे में एक सवाल पर कहा कि सौरव क्या करेंगे या क्या नहीं, इसकी जानकारी नहीं है. वे हमारे लिए सम्माननीय हैं. बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति दयनीय है. बीजेपी बेहतर लोगों को पार्टी में शामिल होने का न्योता दे रही है.

घोष का कहना था, “सौरव जैसे कामयाब लोगों को राजनीति में उतरना ही चाहिए. लेकिन राज्यपाल के साथ उनकी मुलाक़ात पर कयास लगाना सही नहीं है.”

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