पश्चिम बंगाल : लेफ़्ट-कांग्रेस का मेल, किसका बिगाड़ेगा खेल?

कांग्रेस वाम गठबंधन

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पश्चिम बंगाल में चुनाव अगले साल होने वाले हैं और सरगर्मियां अभी से तेज़ हैं.

एक तरफ़ जहाँ बीजेपी के राष्ट्रीय नेता आए दिन बंगाल का दौरा करने में लगे हैं, दूसरी तरफ टीएमसी भी बीजेपी को जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

इस बीच कांग्रेस और लेफ़्ट पार्टी ने भी अगले विधानसभा में अपने गठबंधन का एलान कर दिया है.

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने गुरुवार को ट्विटर पर लिखा कि इस गठबंधन के लिए कांग्रेस के आलाकमान ने मंजूरी दे दी है.

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यानी पश्चिम बंगाल में आने वाले विधानसभा चुनाव में अब मुक़ाबला त्रिकोणीय होने जा रहा है. टीएमसी, बीजेपी और लेफ़्ट-कांग्रेस गठबंधन के बीच.

ऐसा नहीं कि लेफ़्ट और कांग्रेस पश्चिम बंगाल में पहली बार साथ आए हों. इससे पहले 2016 का विधानसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने साथ मिल कर लड़ा था. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में वो अलग हो गए थे. अब 2021 के विधानसभा चुनाव में वो एक बार फिर से साथ आ रहे हैं.

इसलिए दोनों पार्टियों के 'मिलन-बिछोह-मिलन' की राजनीति और रणनीति दोनों को समझना ज़रूरी है.

लेफ़्ट

लेफ़्ट-कांग्रेस का मेल, किसका बिगाड़ेगा खेल

साल 2011 में जब से तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई है उसके पहले तक पश्चिम बंगाल को लेफ़्ट पार्टी का गढ़ माना जाता था. लेकिन धीरे-धीरे उनकी साख़ ऐसी घटी की विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं रह पाई. आज नौबत अस्तित्व बचाने तक पहुँच गई है.

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल कहते हैं, "बंगाल में फिलहाल कांग्रेस और लेफ्ट मुख्य विपक्षी दल है. ममता बनर्जी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही हैं. अगर उनके साथ मिल कर गठबंधन करते तो शायद कांग्रेस और लेफ़्ट का राजनैतिक अस्तित्व बिल्कुल ही ख़त्म हो जाता. यही वजह है कि दोनों पार्टियों ने तृणमूल को चुनौती देने के लिए एक होना सही समझा."

वो आगे कहते हैं, "इस गठबंधन के सामने लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उनके लिए बीजेपी सबसे बड़ी चुनौती है या फिर तृणमूल कांग्रेस. गठबंधन को इस बारे में तय करना होगा."

फिलहाल गठबंधन दोनों पार्टियों से ही समान दूरी बना कर चलने की रणनीति पर काम कर रहा है. लेकिन उनकी इस रणनीति से तृणमूल को नुक़सान होगा या फिर बीजेपी को ये अभी कह पाना मुश्किल है.

जयंतो घोषाल कहते हैं, "बीजेपी का हिंदू वोट है और कांग्रेस का भी है. उसी तरह से तृणमूल कांग्रेस के पास भी मुस्लिम वोट लेफ़्ट के पास भी मुस्लिम वोटर है. ये गठबंधन दूसरी पार्टी के वोट काटेंगे या फिर अपने अस्तित्व को बचाने में कामयाब हो पाएंगे? ये सबसे बड़ा सवाल है. राज्य में बीजेपी की बढ़त ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है."

अमित शाह

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विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तस्वीर

दरअसल पिछले पांच सालों में पश्चिम बंगाल में राजनैतिक समीकरण तेजी से बदले हैं.

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 294 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस 211 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. कांग्रेस को 44 सीटें, लेफ़्ट को 32 सीटें और बीजेपी को 3 सीटों पर जीत मिली थी.

वोट शेयर की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस को तकरीबन 45 फीसद वोट शेयर मिले थे.

लेफ़्ट के पास वोट शेयर 25 फीसद था, लेकिन सीटें कांग्रेस से कम थीं. कांग्रेस के पास 12 फीसद के आसपास वोट शेयर था लेकिन उसे लेफ़्ट से ज़्यादा सीटें मिली थी. बीजेपी का वोट शेयर तकरीबन 10 फीसद था.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में ये सारे समीकरण धरे के धरे रह गए. कुल 40 सीटों में से तृणमूल ने 22 सीटें जीतीं, बीजेपी ने 18 और कांग्रेस 2 पर सिमट गई. लेफ़्ट का खाता भी नहीं खुल पाया.

लेफ़्ट

तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 43 प्रतिशत था, वहीं बीजेपी का 40 प्रतिशत. यानी दोनों के बीच मात्र तीन फीसद वोट शेयर का अंतर रह गया था. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी का वोट शेयर 10 फीसद से नीचे आ गया.

यही वजह है कि इस बार के बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजपी के हौसले बुलंद हैं और अमित शाह 200+ सीट जीतने का नारा दे रहे हैं.

चुनाव आँकड़ों का विश्लेषण करने वाले और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज में प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं, "अमूमन पार्टी का वोट शेयर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बराबर नहीं रहता है. ये ज़्यादातर बराबर तब रहते हैं जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव छह महीने के अंतराल में हो. विधानसभा चुनाव में वोटों का बंटवारा भी लोकसभा के चुनाव के मुक़ाबले कम होता है. इसलिए विधानसभा चुनाव में पार्टी के वोट प्रतिशत में गिरावट देखने को मिलता है."

ऐसे में लेफ़्ट-कांग्रेस गठबंधन का थोड़ा चिंतित होना लाज़मी है.

अधीर रंजन चौधरी

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गठबंधन के बीजेपी के लिए मायने

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार महुआ चटर्जी के मुताबिक़ 2019 के लोकसभा चुनाव के आँकड़ों पर बीजेपी को खुश होने की ज़रूरत नहीं है. 2019 में बीजेपी की जीत उनकी अकेले की नहीं थी बल्कि लेफ़्ट की मदद से उन्हें मिली थी. ऐसा महुआ का दावा है.

इस बात को विस्तार से समझाते हुए वो कहती हैं, " लेफ़्ट के कार्यकर्ताओं में अकेले तृणमूल कांग्रेस का मुक़ाबला करने की क्षमता नहीं थी. इसलिए उन्होंने बीजेपी के सहारे ममता को सीमित करने की कोशिश की. अंदरखाने पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं का नारा था '19 में हॉफ़, 21 में साफ़'. मतलब 2019 में चुनाव में ममता बनर्जी आधे पर सिमट जाएंगी और 21 में साफ़ हो जाएंगी. आधिकारिक तौर पर इस बात को किसी पार्टी ने कभी स्वीकार नहीं किया."

महुआ ने 2019 में इस बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक ख़बर भी छापी थी. जिसके बाद लेफ़्ट पार्टी की तरफ़ से उनकी ख़बर का खंडन भी किया गया था.

लेकिन आज लेफ़्ट पार्टी का वही दाव उनके लिए उलटा पड़ रहा है. आज पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट-कांग्रेस गठबंधन के सामने ना सिर्फ़ ममता बनर्जी को हराने की चुनौती है, बल्कि बीजेपी से ख़ुद को बचाने की मज़बूरी भी है, ताकि कम से कम वो मुख्य विपक्षी पार्टी तो बने रहें.

वो कहती हैं, "2016 में लेफ़्ट और कांग्रेस का गठबंधन चुनाव के कुछ ही दिन पहले हुआ था. देरी की वजह से लेफ़्ट के काडर में नीचे तक ये बात नहीं पहुँची थी. कांग्रेस को लेफ़्ट का वोट तो मिला लेकिन लेफ़्ट को कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं हो पाया था. इसलिए कांग्रेस की सीटें लेफ़्ट से ज़्यादा आई थीं."

महुआ की माने तो बीजेपी के पास आज भी बंगाल में अपनी ज़मीनी ताक़त उतनी नहीं है जितना बढ़-चढ़ कर वो बताते हैं. बंगाल में लेफ़्ट के पास अपना एक वोट बैंक पहले भी था और आज भी है. कांग्रेस भले ही कुछ एक जगह ही मज़बूत हो. अगर सही से गठबंधन अपने कार्यकर्ताओं और वोट बैंक का इस्तेमाल करे, तो उनका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है.

बंगाल कांग्रेस

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किसान आंदोलन - कितना बड़ा मुद्दा

उदाहरण के तौर पर महुआ कहतीं है कि किसानों के मुद्दे पर लेफ़्ट - कांग्रेस गठबंधन बंगाल में अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.

बंगाल में 70 फीसद आबादी कृषि पर ही निर्भर करती है.

तो क्या दिल्ली में पिछले एक महीने से चल रहा किसानों का आंदोलन बंगाल चुनाव में मुद्दा बन सकता है?

जयंतो घोषाल कहते हैं, "कोई भी चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं लड़ा जाता. बहुत सारे मुद्दे होते हैं. नए कृषि क़ानून उनमें से एक मुद्दा ज़रूर है."

यहाँ एक बात जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है वो ये कि चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या फिर लेफ़्ट दोनों की पृष्ठभूमि में 'लैंड रिफॉर्म' एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है.

किसान आंदोलन

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ज़मीन आंदोलन से निकली पार्टियाँ

साल 1960 के दशक में लेफ़्ट पार्टी ने ब्रिटिश शासन के समय से चले आ रहे पुरानी ज़मीनदारी प्रथा, पर्मानेंट सेटलमेंट जैसे क़ानून का विरोध शुरू किया था. साल 1977 में जब वो सत्ता में आए तो छोटे किसानों को उनकी ज़मीन का मालिकाना हक़ दिलाया.

बंगाल में लेफ़्ट पार्टी की सफलता के लिए अनेक कारणों में से इस जमीन सुधार के कार्य को एक अहम वजह माना जाता है. उनके सबसे बड़े नेता बिनॉय चौधरी को बंगाल के लोग आज भी लैंड रिफॉर्म मिनिस्टर के तौर पर ही याद करते हैं.

आगे चल कर यही छोटी-छोटी ज़मीन के टुकड़े और उनके अलग-अलग मालिकाना हक की वजह से लेफ़्ट को औद्योगिकरण में दिक़्क़त का सामना करना पड़ा. किसानों की इसी ज़मीन अधिग्रहण की लड़ाई को सिंगूर में ममता बनर्जी ने लड़ा और अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार की.

लेकिन दिल्ली में जो किसान आंदोलन चल रहा है उसके मुद्दे बंगाल के किसानों से थोड़े अलग है.

बंगाल में धान के साथ-साथ साग-सब्ज़ियाँ ज़्यादा उगाई जाती है. पंजाब-हरियाणा के किसानों के मुकाबले बंगाल के किसानों की आर्थिक स्थिति थोड़ी कमज़ोर है. फिलहाल दिल्ली में बैठे किसानों का मुख्य मुद्दा एमएसपी से जुड़ा है.

लेकिन इस मुद्दे का फायदा लेने के लिए ममता बनर्जी पूरी कोशिश कर रही है. शरद पवार उनका साथ भी दे रहे हैं. आने वाले दिनों में कांग्रेस और दूसरे विपक्षी पार्टी को साथ ला कर एक ग़ैर राजनीतिक लड़ाई लड़ने की कोशिश भी हो रही है. बीबीसी से बातचीत में जयंतो घोषाल ने ये बात कही.

बीजेपी जिस तरह से बंगाल में खुल कर राजनीति का खेल, खेल रही है उस पिच पर केवल किसानों का ही एक मुद्दा है जिस पर उसे बैकफुट पर धकेला जा सकता है. ऐसा ममता बनर्जी और लेफ़्ट दोनों को लगता है. दोनों विपक्षी पार्टियों ने इस दिशा में हाल के दिनों में काम करना शुरू भी कर दिया है.

ममता बनर्जी

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तृणमूल के साथ गठबंधन

अगर बीजेपी के ख़िलाफ़ तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी एक ही मुद्दा उठा रही है, तो फिर तीनों पार्टियाँ एक साथ क्यों नहीं आ जाती? ऐसा करके बीजेपी के ख़िलाफ़ वो ज़्यादा सीटें भी जीत सकती हैं.

इस पर जयंतो घोषाल कहते हैं, "तीनों पार्टियां साथ लड़तीं तो लेफ़्ट-कांग्रेस को फ़ायदा होता. कांग्रेस के दिल्ली के नेता चाहते थे कि कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ गठबंधन करें. लेकिन इसके लिए अधीर रंजन चौधरी और बंगाल कांग्रेस के स्थानीय नेता तैयार नहीं हुए."

दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी भी कांग्रेस और लेफ्ट के साथ गठबंधन के लिए तैयार नहीं थी. उन्हें अब भी लगता है कि तृणमूल अकेले बीजेपी के लिए काफी है."

ये सब जानते हैं कि अधीर रंजन और ममता बनर्जी की आपस में नहीं पटती लेकिन सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच की केमेस्ट्री अच्छी है. फिर 2024 भी बहुत दूर नहीं है जब नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए विपक्ष को एकजुट होना होगा.

चुनाव के बाद क्या समीकरण बनते हैं, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा.

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