गोवा में बीफ़ के प्रबंध के लिए परेशान बीजेपी के प्रमोद सावंत, पर क्यों

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- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा है कि वह व्यापारियों को अपने राज्य में मवेशी लाने और हत्या की इजाज़त देंगे. उनके इस बयान से लोग हैरान हैं.
इस बयान पर कुछ लोगों का मानना है कि सभी को अपनी संस्कृति के आधार पर खाना चुनने की छूट होनी चाहिए. तो वहीं एक वर्ग जो गाय की पूजा करता है वह मानता है कि सावंत ने सभी सीमाएं पार कर दी हैं और उनका ''गाय को पूजनीय मानने का दावा'' झूठा है.
मुख्यमंत्री का ये बयान तब आया है जब राज्य में महाराष्ट्र और कर्नाटक के कारण बीफ़ (भैंस का मांस) की उपलब्धता को लेकर संकट पैदा हो गया है. दरअसल चार साल पहले महाराष्ट्र ने बीफ़ और मवेशियों को काटे जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
अब कर्नाटक में भी गौहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया है और बीफ़ या उससे तैयार किए गए उत्पाद को राज्य के भीतर और बाहर ले जाने पर परमिट से जुड़ा अध्यादेश राज्य सरकार लाने वाली है.
सावंत का ये बयान उनके उस बयान के ठीक एक दिन बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि वह ख़ुद ''गाय की पूजा'' करते हैं लेकिन उनकी कुछ मजबूरियां हैं.
गोवा के गौरक्षक गौवंश दक्ष अभियान से जुड़े हनुमंत परब ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''अगर वह सच्चे गौ भक्त हैं तो ये उनके लिए और बीजेपी के लिए बेहद शर्मनाक है कि वह राज्य में बीफ़ की सप्लाई का प्रबंधन कर रहे हैं. वह सत्ता के लिए अपने उसूल भूल गए हैं.''

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लेकिन वह क्या मजबूरी है जिसके कारण गोवा के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडा के ख़िलाफ़ जा रहे हैं.
प्रमोद सावंत ने ख़ुद इसका जवाब देते हुए कहा था, ''राज्य का मुख्यमंत्री होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं राज्य के अल्पसंख्यकों का भी ख़याल रखूं. गोवा में 30 फ़ीसदी ऐसे अल्पसंख्यक हैं जो बीफ़ खाते हैं.''
राज्य के राजस्व मंत्री जेनिफ़र मॉन्ज़ेरेट ने बीबीसी से कहा, ''मुख्यमंत्री ने ये बात एक संदर्भ के साथ कही है. वह आम लोगों के बीच लोकप्रिय चेहरा हैं. दक्षिणी गोवा में ज़्यादातर कैथोलिक ईसाई रहते हैं. ये अल्पसंख्यकों, ईसाई या मुस्लिमों की बात नहीं है, ये गोवा की जीवनशैली का हिस्सा है.''
गोवा की संस्कृति को समझने वाले और एक रेस्टोरेंट के मालिक अर्मांन्दो गोंजाल्विस कहते हैं, ''साल 2012 में मनोहर पार्रिकर को लोगों ने उनकी सेक्युलर छवि के कारण चुना था. हर समुदाय के लोग पार्रिकर के लिए एकजुट होकर वोट देते थे. गोवा में यूनिफॉर्म सिविल कोड है, गोवा के पास ऐसी कई चीज़ें हैं जिससे पूरा देश सीख सकता है. दूसरे राज्यों की चीज़ें गोवा में घुसाने से बेहतर है कि केंद्र में बैठा बीजेपी का नेतृत्व गोवा से सीख ले.''
गोवा में बीफ़ खाने का कल्चर कहां से आया?

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आख़िर गोवा में बीफ़ खाने की संस्कृति आई कहां से? गोवा के इतिहासकार प्रजल सकरदंदे ने बीबीसी से बताया, ''बीफ़ और पोर्क खाने की संस्कृति गोवा में तब शुरू हुई जब पुर्तगालियों ने इस पर बीजापुर के आदिल शाह को हरा कर जीत हासिल की. इसके बाद कई हिंदू और मुसलमानों ने ईसाई धर्म अपनाया.''
''पुर्तगालियों ने लोगों को ईसाई धर्म में शामिल करने के लिए जो एक तरीक़ा अपनाया वह था हिंदू घरों में पो (एक तरह की रोटी) और पोर्क फेंक देना. इससे अन्य हिंदू घर उस घर को अशुद्ध मानकर उसका बहिष्कार करते थे. हिंदू और मुसलमानों के धर्म परिवर्तन में बीफ़ और पोर्क ने बड़ी भूमिका निभाई.''
कुरैशी बीफ़ ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मुन्ना बेपारी कहते हैं, ''हम महाराष्ट्र से बीफ़ लाते थे, जब तक वहां पर गौहत्या प्रतिबंधित नहीं थी. अब तो हम वहां से 13 साल से कम उम्र के मवेशी नहीं ला सकते. अब कर्नाटक भी अध्यादेश लाने जा रहा है, कुछ प्रतिबंध तो लाए भी जा चुके हैं. ये हमारे लिए परेशानी बनता जा रहा है.''
बेपारी एक नए विकल्प की बात करते हुए कहते हैं, ''मीट कॉप्लेक्स का इस्तेमाल किया जा सकता है अगर हम मवेशियों को दूसरे राज्यों से गोवा लाएं तो. हालांकि ये मीट कॉम्लेक्स कई प्रशासनिक कारणों से बंद पड़े हैं. मुख्यमंत्री सावंत ने वादा किया है कि जल्द ही इन्हें चालू किया जाएगा.''
बेपारी कहते हैं कि ''मीट कॉम्लेक्स खुलने के बाद भी गोवा में बीफ़ की माँग की पूरी तरह आपूर्ति नहीं हो पाएगी. सामान्य दिनों में गोवा में 15-20 टन मीट लाए जाते हैं.''
कर्नाटक में बीफ़ पर प्रतिबंध का असर

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यह समस्या तब और विकट हो गई जब कर्नाटक में बीफ़ पर लगे प्रतिबंध के क़ानून को सख्ती से लागू किया गया. इसके तहत दूसरे राज्यों में कर्नाटक से बीफ़ ले जाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है.
यह 2010 में बने पिछले क़ानून से भी कहीं अधिक सख्त है. 2010 में बना क़ानून कांग्रेस की सरकार ने 2013 में रद्द कर दिया था. मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ मवेशी को काटने, बिना लाइसेंस राज्य के अंदर या बाहर उसे ले जाने और काटने के लिए उसकी ख़रीद-बिक्री करने पर पाबंदी लगाई गई है.
इस पर लगा जुर्माना भी पुराने क़ानून की तुलना में अधिक है. दोषियों पर न्यूनतम 50 हज़ार से पाँच लाख तक का जुर्माना है तो वहीं जेल की सज़ा एक से सात साल की बढ़ाकर मौजूदा क़ानून में तीन से सात साल तक की कर दी गई है.
राजनीतिक टिप्पणीकार प्रकाश डब्लू कामथ का कहना है, "गोवा को इसकी वजह से जो असल परेशानी झेलनी पड़ रही है वो सामाजिक-राजनीतिक से कहीं बढ़कर आर्थिक भी है. कोविड की वजह से राज्य पर पहले से ही आर्थिक मार पड़ी हुई है ख़ासकर पर्यटन और खनन के बंद होने से.''
गोवा के ट्रैवल एंड टूरिज्म एसोसिएशन के आतिश फ़र्नांनडीस बीफ़ की राज्य में आपूर्ति पर पड़ने वाले मौजूदा प्रभाव को लेकर बहुत चिंतित नहीं हैं.
इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, "विदेशी पर्यटक इस साल आए नहीं और घरेलू पर्यटकों के बीच बीफ़ की उतनी खपत है नहीं. लेकिन हम गोवा में ज्यादा वक़्त तक बीफ़ की सप्लाई नहीं होने को लेकर चिंतित हैं.''
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "गोवा का मुक़ाबला ख़ास तौर पर ट्यूनीशिया और मिस्र से है. चूंकि हम गोवा में बिना किसी पाबंदी की सुविधाएँ मुहैया कराते हैं इसलिए उनसे बेहतर हैं. लेकिन अब जब हम कहेंगे कि यहाँ बीफ़ नहीं मिलता तो इससे हमारी छवि को नुक़सान पहुँचेगा. दूरगामी दृष्टि से देखें तो इस छवि का हमारे ऊपर असर पड़ेगा.''
पोषक तत्व

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पोषण के लिहाज़ से क्या प्रभाव पड़ेगा?
हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रीशन की पूर्व डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर वीणा शत्रुघ्न ने बीबीसी हिंदी से कहा, "लोग भूख मिटाने के लिए खाना खाते हैं. लोग वैसा खाना खाते हैं जो उनकी बजट में होता है. अमीर सभी तरह का खाना खाते हैं. दिन में तीन बार खाते हैं. लेकिन खाना वास्तव में संस्कृति के हिसाब से तय होता है. सरकार कौन होती है सवाल करने वाली कि मैं क्यों कोई ख़ास तरह का खाना खाती हूँ?''
"दूध देना बंद करने के बाद मवेशी किसानों के लिए बेकार हो जाते हैं. यह ऑर्गेनिक चीज़ों की रिसाइक्लिंग का एक प्राकृतिक तरीक़ा है. गाय और भैंसों को पालना भी एक महंगा काम है. इसलिए बूढ़े मवेशियों को बेचना किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी तर्कसंगत है. अगर पोषण के लिहाज़ से देखें तो सिर्फ़ न्यूट्रिशनिस्ट ही इसके बारे में बेहतर बता सकते हैं. सबसे अहम पोषक तत्व जो बीफ़ या दूसरे मांस से मिलता है, वो है प्रोटीन. ये आप पेड़-पौधों पर आधारित खाने से नहीं पाते हैं.''
लेकिन सकरदंदे इस बात को लेकर अचरज जताते हैं कि वही लोग जो कभी शाकाहारी होते थे और बाद में बीफ़ और पोर्क खाना शुरू किया, वो अब इसके बिना रह नहीं सकते.
वो कहते हैं, "वो ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे बीफ़ बैन होने के साथ ही दुनिया का अंत होने जा रहा है. ईसाई बीजेपी का समर्थन नहीं करते हैं. केवल कुछ मंत्री करते हैं. यह और कुछ नहीं बल्कि बीजेपी की तुष्टीकरण की नीति है. मैं इसे वोट बैंक राजनीति कहता हूँ.''
बेपारी बताते हैं, "मटन 800 रुपये प्रति किलो तो वहीं चिकेन 200 रुपये प्रति किलो बिकता है. जबकि बीफ़ 350 रुपये प्रति किलो बिकता है. स्वभाविक है कि बीफ़ की माँग ज्यादा होगी क्योंकि ज्यादा लोग इसे ख़रीद सकते हैं.''
दिलचस्प बात तो यह है कि उत्तरी केरल के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बीजेपी के उम्मीदवार चुनाव से पहले बढ़िया बीफ़ मुहैया कराने का वादा करते हैं. उत्तर-पूर्व में भी बीजेपी यहीं रुख़ अपनाती है. गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत भी यही नीति अपनाते हैं.
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