जम्मू-कश्मीर: डीडीसी चुनावों के नतीजों ने दिया भविष्य की राजनीति के संकेत?

कश्मीरी औरतें

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जम्मू-कश्मीर में ज़िला विकास परिषद् के चुनाव में अगर कोई एक राजनीतिक दल सबसे ज़्यादा नुक़सान में रहा है, तो वो है कांग्रेस जो 280 सीटों में से सिर्फ़ 26 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी.

एक ज़माने में जम्मू-कश्मीर में एक मज़बूत राजनीतिक शक्ति रहे कांग्रेस को ख़ुद भी अपने इतने बुरे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी.

पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार कांग्रस का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं नीचे रहा. उन्होंने इसका एक बड़ा कारण बताया कि कांग्रेस जम्मू और कश्मीर घाटी के अलग-अलग मुद्दों के बीच फँस कर रह गयी.

नहीं मिली उम्मीद के मुताबिक़ सफलता

वीडियो कैप्शन, जम्मू-कश्मीर के चुनाव का बीजेपी और नरेंद्र मोदी के लिए क्या मायने हैं?

पिछली सरकारों में मंत्री रह चुके राज्य के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता योगेश साहनी ने बीबीसी से बात करते हुए स्वीकार किया कि उनकी पार्टी इन चुनावों के लिए तैयार नहीं थी. यही वजह है कि न तो उन्हें किसी गठबंधन में शामिल होने का मौक़ा मिला और ना ही उम्मीदवारों को सही तरह से खड़ा करने का ही मौक़ा मिला.

वो कहते हैं, "भाजपा पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरी. उन्हें पता था कब क्या करना है. हमारे लिए ये सब कुछ अचानक हो गया. फिर भी हम किसी गठबंधन के साथ नहीं गए और अपने बूते ही चुनाव लड़ा. हमने स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ा जबकि ज़िला विकास परिषद के चुनावों में भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा."

जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता रविंदर शर्मा ने दावा किया कि भाजपा को 20 में से सिर्फ़ पाँच ज़िलों में सीटें मिली हैं.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ज़िला विकास परिषद के चुनावों में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है, पार्टी का प्रदर्शन भी पहले से बेहतर रहा. मगर जानकार कहते हैं कि कश्मीर घाटी में अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल करने का दावा करने वाली भाजपा को उसके पुराने गढ़ यानी जम्मू के इलाक़े में नुक़सान का सामना करना पड़ा है.

जानकार बताते हैं कि वर्ष 2014 के विधानसभा के चुनावों में भाजपा को जम्मू क्षेत्र की 37 में से 25 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. यानी दो-तिहाई सीटें उसे मिली थीं. इस बार ज़िला विकास परिषद के चुनावों में भाजपा को 140 में से 71 सीटों पर जीत मिली जो पचास प्रतिशत से सिर्फ़ एक सीट ज्यादा है. पार्टी को जिन तीन इलाक़ों पर जीत का बहुत भरोसा था, वहाँ उसे उतनी कामयाबी हासिल नहीं हुई. ये इलाक़े हैं डोडा, रामबन और रजौरी.

भाजपा और कांग्रेस को सबक़

वीडियो कैप्शन, कश्मीर घाटी में बीजेपी का कमल खिलाने वाले उम्मीदवार

जम्मू में कश्मीरी पंडितों के बीच काम कर रहे सुनील पंडिता कहते हैं कि इस चुनाव में दोनों प्रमुख दलों यानी भाजपा और कांग्रेस को लोगों ने सबक़ सिखाया है. उन्होंने भाजपा पर काम नहीं करने का आरोप लगाया जबकि कांग्रेस को अब वो जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अप्रासंगिक होती हुई पार्टी मानते हैं.

पूर्व उप-मुख्यमंत्री रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता कविंदर गुप्ता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनकी पार्टी का और भी बेहतर प्रदर्शन हो सकता था. वो कहते हैं कि कई सीटों पर पार्टी ने कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन दिया था. इसलिए ये नहीं कहा जाना चाहिए कि भाजपा का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा.

उनका कहना है, "अब इससे बड़ी बात क्या हो सकती है? कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि कश्मीर घाटी में भाजपा को कभी जीत भी मिल सकती है. ये पहली बार हुआ है जब भाजपा जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभर कर आई है."

मगर सामजिक कार्यकर्ता तरुण उप्पल कहते हैं कि इन चुनावों की तुलना किसी भी चुनावों से नहीं होनी चाहिए क्योंकि ज़िला विकास परिषद के चुनाव जम्मू-कश्मीर में पहली बार हुए हैं. वो कहते हैं कि इन चुनावों की विधानसभा के पिछले चुनावों से ना तुलना की जानी चाहिए और ना ही लोकसभा के चुनावों से.

भविष्य की राजनीति

गुपकर गठबंधन

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वो कहते हैं कि ज़िला विकास परिषद का चुनाव सभी के लिए नया अनुभव रहा है.

जो भी हो, लेकिन ज़िला विकास परिषद के चुनावों में एक बात जो अप्रत्याशित रही वो है नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे दलों का दूसरी राजनीतिक शक्तियों के साथ मिलकर गठबंधन बनाना जिसका नाम उन्होंने 'पीपुल्स एलायन्स फ़ॉर गुपकर डिक्लेरेशन' रखा है. इस गठबंधन ने 280 सीटों में से 109 पर जीत दर्ज की है.

हालांकि इस बार के चुनावों में निर्दलीय उमीदवारों का प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन जम्मू क्षेत्र की तुलना में घाटी में मतदाताओं का रुझान कम देखा गया.

पनुन कश्मीर संगठन के कमल हाक के अनुसार, ऐसे माहौल में चुनाव होना ही एक बहुत बड़ी उपलब्धि रही और इनमें लोगों की भागीदारी ने भी उम्मीदों के रास्ते खोल दिए हैं.

पनुन कश्मीर, राज्य के विस्थापित हिंदुओं का एक संगठन है.

ज़िला विकास परिषद के चुनावों के बाद सभी राजनीतिक ख़ेमों में मंथन का दौर चल रहा है क्योंकि भविष्य में जम्मू-कश्मीर की राजनीति किस करवट बैठेगी ये इस चुनाव के आए नतीजों के आधार पर ही तय किया जाएगा.

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