नेपाल: राजनीतिक अस्थिरता, राजशाही की वापसी या जन आंदोलन

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल का लंबा इतिहास रहा है और एक बार फिर नेपाल में संसद भंग कर दी गई है.
पिछले आम चुनावों के तीन साल बाद ही अब संसद को भंग कर दिया गया है. राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने नए जनादेश के लिए 30 अप्रैल और दस मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाने की घोषणा भी कर दी है.
मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता की वजह
नेपाल में दशकों की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद यह पहला मौक़ा था जब देश में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनकर बहुमत वाली स्थायी सरकार आई थी. इस सरकार से लोगों की अपेक्षाएं जुड़ी हुई थीं लेकिन क्या वजह रही कि नेपाल में संसद भंग करनी पड़ी?
बीबीसी नेपाली सेवा के संपादक जितेंद्र राउत के अनुसार, "नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के लिए कोई एक ही कारण हो, ऐसा नहीं है."
वो कहते हैं, "बहुमत होने के बाद भी स्थायित्व का अभाव रहा. इसके लिए राजनीतिक पार्टियों, उनकी नीतियों, अनुभव और दूरदर्शिता को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन यह कहना इतना सरल भी नहीं है."
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे कहते हैं कि नेपाल की राजनीति में जो कुछ हो रहा है उसका सबसे बड़ा कारण सत्ताधारी पार्टी में ज़बर्दस्त आंतरिक मतभेद हैं.
वो बताते हैं, "कई वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री के और उनकी नीतियों के ख़िलाफ़ हैं. इसमें कई नाम उन नेताओं के भी है जो पहले प्रधानमंत्री रह चुके हैं. मसलन, प्रचंड, माधव नेपाल उनके ख़िलाफ़ है. इन नेताओं को लगा कि प्रधानमंत्री पार्टी से बिना सलाह-मशविरा किये बड़े फ़ैसले ले रहे हैं और कई ऐसे फ़ैसले भी ले रहे हैं जो असंवैधानिक हैं."
"इसमें हाल में प्रधानमंत्री का लाया गया वो अध्यादेश भी शामिल है जिसके तहत वो संसदीय समितियों को नियंत्रित करना चाहते हैं. यह एक बड़ा कारण बना. इसके अलावा प्रधानमंत्री के खिलाफ़ जो कुछ भ्रष्टाचार के मामले सामने आए वो भी एक अहम वजह रही कि पार्टी विघटन की ओर बढ़ रही थी. इसी बीच पीएम ओली ने संसद भंग करने की सिफ़ारिश कर दी."

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नेपाल के राजनीतिक मामलों पर नज़र रखने वाले आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं, "यह घटनाक्रम आश्चर्य में डालने वाला है. यह सरकार सिर्फ़ चुनी हुई सरकार नहीं थी बल्कि इसे किसी दूसरे विरोधी दल से कोई ख़तरा भी नहीं था. ऐसे में प्रधानमंत्री ओली का संसद को भंग करने की सिफ़ारिश करना अजीब है."
"फिलहाल देश में कोई ऐसी स्थिति नहीं थी कि संसद भंग करने की सिफ़ारिश करनी पड़े. केवल अपनी पार्टी के कुछ असंतुष्ट लोगों से व्यक्तिगत रूप से अपनी सरकार बचाने के लिए ओली ने पूरे देश को संकट में डाल दिया है. इस क़दम से ओली अल्पमत में आ गए हैं. 15 तारीख़ को संवैधानिक परिषद अधिनियम में संशोधन को लेकर जो अध्यादेश आए उसी से उनकी मंशा स्पष्ट हो गई. इस संशोधन से पीएम को अपार शक्ति मिल जाती."
"इसी अध्यादेश को वापस लेने की मांग पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने की. हालांकि बाद में यह दावा भी किया गया कि ओली ने सहमति दी थी कि वो इस अध्यादेश को वापस ले लेंगे लेकिन वो कुछ कर नहीं रहे थे. इसलिए पार्टी के कुछ नेताओं ने संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की थी. संभव है कि ओली को लगा कि अगर ऐसा होता है तो उनकी सत्ता पर पकड़ कमज़ोर हो जाएगी और उसे ही बचाने के लिए उन्होंने सिफ़ारिश कर दी."
आनंद स्वरूप वर्मा का मानना है कि ओली ने जो क़दम उठाया है वो केवल व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर उठाया है.
दो तिहाई बहुमत
तीन साल पहले केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में तत्कालीन सीपीएन (यूएमएल) और प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन (माओवादी) ने चुनावी गठबंधन बनाया था. इस गठबंधन को चुनावों में दो-तिहाई बहुमत मिला था.
सरकार बनने के कुछ समय बाद ही दोनों दलों का विलय हो गया था. लेकिन कुछ समय बाद ही गतिरोध सामने आने लगे थे, जिसका ज़िक्र सोमवार को पीएम ओली ने अपने राष्ट्र संबोधन के दौरान भी किया.
ओली पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को विकृतियां पैदा करने का ज़िम्मेदार बताते हैं तो वहीं पार्टी के सह अध्यक्ष 'प्रचंड', माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ खनाल जैसे वरिष्ठ नेता काफी पहले से ओली पर पार्टी और सरकार को एकतरफ़ा चलाने का आरोप लगाते रहे हैं.

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नेपाल और लोकतंत्र
नेपाल में 90 के दशक में माओवादियों ने देश में लोकतंत्र क़ायम करने और एक नए संविधान की मांग करते हुए हथियार उठा लिए थे.
10 साल तक चले गृहयुद्ध का अंत 2006 में एक शांति समझौते से हुआ.
इसके दो साल बाद नेपाल में संविधान सभा के चुनाव हुए जिसमें माओवादियों की जीत हुई. साथ ही, 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हो गया.
मगर मतभेदों की वजह से संविधान सभा नया संविधान नहीं बना सकी और कार्यकाल का कई बार विस्तार करना पड़ा. आख़िरकार 2015 में एक संविधान को स्वीकृति मिल पाई.
लेकिन नेपाल में लोकतंत्र बहाल तो हो गया पर उसमें लगातार अस्थिरता बनी रही. नेपाल में संसद बहाल होने के बाद से अब तक दस प्रधानमंत्री हुए हैं.

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नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से भी समझ आती है. किसी प्रधानमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है.
नेपाल राजनीतिक मामलों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं, "ओली ने जो क़दम उठाया है वो पूरी तरह से जनादेश की अवहेलना है."
वो कहते हैं "नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता को समझने के लिए नेपाल की राजनीति को दो हिस्सों में बांटकर देखना होगा. एक वो समय जब राजतंत्र था. तो राजतंत्र तो लगभग-लगभग समाप्त हो गया साल 2006 लेकिन विधिवत राजतंत्र समाप्त हुआ साल 2008 में. साल 2008 में पहले प्रधानमंत्री बने प्रचंड. प्रचंड का कार्यकाल नौ महीने का ही रहा. सेनाध्यक्ष कटवाल को बर्खास्त करना उनके हित में नहीं रहा और उनका कार्यकाल नौ महीने में ही ख़त्म हो गया."
आनंद स्वरूप नेपाल की राजनीति पर भारत के 'माइक्रो-मैनेजमेंट' को भी नेपाल की राजनीतिक स्थिति के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.
वो प्रचंड के कार्यकाल का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि "प्रचंड इस माइक्रो-मैनेजमेंट को समाप्त करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने परंपरागत तौर पर चली आ रही प्रथा (नेपाल के पीएम का पहला दौरा भारत में) को तोड़ा और वो चीन ओलंपिक के समापन समारोह चले गए."
"भारत ने इस पर नाराज़गी जताई थी. यहां तक की कटवाल की बर्खास्तगी पर भी भारत ने रोष जताया था और भारत के ही सहयोग से प्रचंड की सरकार गिराई गई."
आनंद स्वरूप कहते हैं, "ये सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री के कार्यकाल का उदाहरण रहा लेकिन इसके बाद भी नेपाल में कभी भी राजनीतिक स्थायित्व नहीं आ सका. कभी कोई कारण रहा तो कभी कोई. ऐसे में ओली को यह मौक़ा मिला था कि वो पूर्ण बहुमत वाली सरकार के साथ जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सकते. लेकिन ओली ने सारा समय आपसी खींचतान में बिता दिया."
आनंद स्वरूप मानते हैं कि अब नेपाल की राजनीति के जो प्रमुख चेहरे हैं उन्हें आगे आकर कमान संभालने की ज़रूरत है क्योंकि अब जनता और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकती है.

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अब आगे क्या कुछ संभावनाएं और विकल्प हैं?
प्रधानमंत्री ओली की सिफ़ारिश और राष्ट्रपति द्वारा संसद को भंग किये जाने के क़दम को असंवैधानिक बताते हुए अब तक सुप्रीम कोर्ट में 12 याचिकाएं दायर की जा चुकी है.
युबराज घिमिरे और आनंद स्वरूप दोनों ही जन आंदोलन की बात से इनक़ार नहीं करते हैं.
युबराज घिमिरे बताते हैं "इस क़दम के ख़िलाफ़ अभी तक 12 याचिकाएं डाली जा चुकी हैं और संभव है कि आज (मंगलवार) असंतुष्ट सांसद संयुक्त तौर पर एक याचिका देंगे. जिसमें वो सुप्रीम कोर्ट से यह दरख़्वास्त करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट संसद को बहाल करे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट क्या फ़ैसला करेगा इस पर अभी टिप्पणी नहीं की जा सकती है."
युबराज घिमिरे ज़ोर देकर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में तो वे याचिका डालेंगे ही लेकिन सड़कों पर भी उतरेंगे.
वो कहते हैं, "जिस तरह की मौजूदा परिस्थितियां हैं बिलकुल इस बात की संभावना है और कल से ही कुछ लोग सड़कों पर आ भी चुके हैं."
उनके मुताबिक़, "एक ओर जहां लोकतंत्र की बहाली के लिए आवाज़ उठ रही है वहीं कुछ लोग राजतंत्र की वापसी के लिए भी प्रदर्शन कर रहे हैं. विभिन्न तरह के आंदोलन चल रहे हैं लेकिन हर आंदोलन का असर सरकार पर तो पड़ेगा ही."
आनंद स्वरूप सुप्रीम कोर्ट को लेकर आशान्वित हैं. वो कहते हैं "मुझे लगता है कि कोर्ट वही आदेश देगा जिससे संसद बहाल हो सके. संसद बहाल होगी तो संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया जाएगा तो उसमें ओली के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव आएगा और उसे बहुमत से स्वीकार किया जाएगा और ओली प्रधानमंत्री पद से हटेंगे. क्योंकि ओली का यह क़दम आत्मघाती है. दूसरी ताक़तें भी उभर सकती हैं."
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क्या होगा भारत पर असर?
भारत ने नेपाल के ताज़ा घटनाक्रम पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन काठमांडू में हर राजनीतिक घटना को क़रीब से देखने वाले कुछ भारतीय विशेषज्ञों की राय मिली-जुली है.
नेपाल मामलों के विशेषज्ञ और भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी जनरल अशोक मेहता ने नेपाल में स्थिति को "भारत के हित में" बताया है.
मेहता ने बीबीसी नेपाली से कहा, "ओली ने भारत को भी झटका दिया है लेकिन नेपाल में अस्थिरता भारत को प्रभावित करती है."
नेपाल मामलों की जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि का कहना है कि हालांकि भारत की नेपाल में गहरी हिस्सेदारी है और वह चीन के प्रभाव में वृद्धि नहीं देखना चाहता है, लेकिन बीते कुछ मौक़ों को याद करें तो पता चला है कि ओली भारत का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति नहीं हैं.
मुनि ने बीबीसी नेपाली से कहा, "नया नक्शा जारी करने और सीमा विवाद को प्रमुख मुद्दा नहीं बनाने के आग्रह के बावजूद, भारत ओली को रोक नहीं पाया है."
"भारत में कुछ लोग हैं जो नेपाल में राजशाही को बहाल करना चाहते हैं, हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. सरकार में उनका अपना प्रभाव और हिस्सा हो सकता है लेकिन भारत का सबसे बड़ा हित नेपाल में लोकतंत्र की मज़बूती में है."
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चीन पर असर
पड़ोसी चीन ने भी नेपाल के घटनाक्रम पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
बीबीसी नेपाली से बात करते हुए, नेपाली मामलों के चीनी प्रोफ़ेसर, ली ताओ ने कहा कि यह नेपाल के लिए अनुकूल नहीं होगा. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नेपाल की स्थिति जल्द ही स्थिर हो जाएगी.
चीन के सिचुआन विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज के कार्यकारी निदेशक ताओ ने बीबीसी को बताया, "केवल एक स्थिर राजनीतिक स्थिति नेपाल की सामाजिक-आर्थिक गतिविधि और चीन-नेपाल आर्थिक सहयोग को बढ़ावा दे सकती है."
कहा जाता है कि चीन पिछले लंबे समय से नेपाल के साथ सहयोग के लिए स्थिर राजनीतिक माहौल पर जोर दे रहा है.
प्रोफेसर ताओ ने कहा, "चीन की हमेशा से ही दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति रही है. लेकिन एक पड़ोसी के रूप में और क्षेत्रीय सहयोग के लिए, चीन नेपाल में स्थिरता चाहता है."

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प्रधानमंत्री ओली की सिफ़ारिश के बाद क्या-क्या हुआ?
- 20 दिसंबर 2020 को प्रधानमंत्री केपी ओली के निवास पर एक आपातकालीन बैठक हुई जिसके बाद उन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी में मतभेद की बात करते हुए संसद भंग करने की सिफ़ारिश की. इसके बाद राष्ट्रपति ने सिफ़ारिश के तहत संसद को भंग कर दिया.
- राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि, "माननीय राष्ट्रपति ने नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 और अनुच्छेद 85 की धारा 1 और 7, संसदीय प्रणाली के मूल मूल्यों के अनुसार संघीय संसद भंग किया है."
- प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के ख़िलाफ़ सत्तारूढ़ सीपीएन सांसदों ने जो अविश्वास प्रस्ताव दायर किया है उसमें 90 लोगों के हस्ताक्षर हैं. पहला हस्ताक्षर करने वाले प्रचंड को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया गया है.
- 21 दिसंबर 2020 को प्रधानमंत्री ओली ने राष्ट्र को संबोधित किया और कहा कि उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने प्रचंड और माधव कुमार नेपाल पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ नेताओं की असंगत, विकृत गतिविधियों के कारण यह स्थिति बनी है.
- नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में अब तक, संसद भंग करने के ख़िलाफ़ 12 याचिकाएं दायर हो चुकी हैं. संविधान विशेषज्ञ प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश को असंवैधानिक मानते हैं. उनका कहना है कि साल 2015 का नेपाल का संविधान प्रधानमंत्री को प्रतिनिधि सभा को भंग करने का कोई विशेषाधिकार नहीं देता.
- राष्ट्रपति ने नए जनादेश के लिए 30 अप्रैल और दस मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाने की घोषणा की है.
- नेपाल चुनाव आयोग के अधिकारियों और एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने दो के बजाय एक चरण में चुनाव कराने का सुझाव दिया है.
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