छत्तीसगढ: एमएसपी का लाभ 6 प्रतिशत या 94 प्रतिशत किसानों को?

हरीश साहु

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

छत्तीसगढ़ के बिरोदा गांव के किसान हरीश साहु को देश में चल रहे किसान आंदोलन की ख़बर है. वे चाहते हैं कि आने वाले दिनों में भी सहकारी समितियों के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर ही ख़रीदी हो.

हरीश साहु अपना 40 बोरा धान सेंद्री गांव की सहकारी समिति में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए पहुँचे थे. केंद्र सरकार के नये कृषि क़ानून के उलट वे चाहते हैं कि सहकारी समितियों के अलावा कहीं भी फ़सल ख़रीदी की प्रथा बंद कर दी जाए.

समर्थन मूल्य पर ख़रीदी बंद करने को लेकर सवाल करें तो वे लगभग रुआंसे हो जाते हैं.

अपने दोनों हाथों को इंकार करने वाले अंदाज़ में लहराते हुये हरीश भर्राई हुई आवाज़ में कहते हैं, "अगर ऐसा हुआ तो हम धान लगाना बंद कर देंगे. क्या मरने के लिए धान लगाएंगे?"

वे धान और उसकी लागत का गणित समझाते हैं, "एक एकड़ में 20 हज़ार रुपये से अधिक ख़र्च हो जाता है. सरकार 2500 रुपये में धान ख़रीदती है तो हमारी लागत निकल पाती है, थोड़ा लाभ मिल पाता है. गांव में पहुँचने वाले व्यापारी और दलाल 900 रुपये में यही धान ख़रीद रहे हैं. इतना घाटा उठा कर कौन खेती करेगा?"

धान

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2500 रुपये क्विंटल धान

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार पिछले कई सालों से किसानों की सहकारी समितियों के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की ख़रीदी करती रही है. पिछले दो सालों से न्यूनतम समर्थन मूल्य और उस पर दिये जाने वाले बोनस को मिला कर किसानों को धान के लिए प्रति क्विंटल 2500 रुपये मिलते हैं.

पूरे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान ख़रीदी के लिए छत्तीसगढ़ सबसे अधिक भुगतान करता है.

राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं, "भारत सरकार कहती है कि देश में केवल 6 प्रतिशत किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है जबकि हम दावे के साथ कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में 94 प्रतिशत किसानों को धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल रहा है. केंद्र सरकार को छत्तीसगढ़ का मॉडल लागू करना चाहिए."

भूपेश बघेल का दावा है कि पिछले साल जब पूरे देश में मंदी छाई हुई थी, तब भी छत्तीसगढ़ में मंदी का असर नहीं था. ऑटोमोबाइल और रियल स्टेट के मामले में छत्तीसगढ़ ने देश में नये रिकार्ड बनाये.

मुख्यमंत्री का कहना है कि इस साल लॉकडाउन के बाद जब बाज़ार खुले तो किसानों का पैसा बाज़ार में आया और अक्टूबर महीने में पूरे देश में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक 24 प्रतिशत जीएसटी की वसूली हुई. यह सब किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भुगतान के कारण ही संभव हो पाया.

भूपेश बघेल

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धान, किसान और आंकड़े

छत्तीसगढ़ में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की बेचने वाले किसानों को स्थानीय सहकारी समिति में पंजीयन कराना होता है.

राज्य सरकार किसानों से प्रति एकड़ 15 क्विंटल धान की ख़रीदी करती है. लेकिन पंजीयन कराने वाले किसानों में से भी कई किसान अपना धान सहकारी समितियों में नहीं बेच पाते.

राज्य सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ में 2017 में जहां 76 प्रतिशत किसानों ने एमएसपी पर धान बेचा था, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 92.61 प्रतिशत पहुँच गया. 2019 में 94.02 प्रतिशत किसानों ने धान बेचा.

सरकार को भरोसा है कि इस साल जबकि लगभग ढ़ाई लाख नये किसानों ने एमएसपी पर धान बेचने के लिये पंजीयन कराया है, तब किसानों का यह आंकड़ा 98 प्रतिशत तक पहुँच सकता है.

2017-18 में राज्य सरकार ने 12,06,264 किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 56.68 मिट्रिक टन धान की ख़रीदी की थी. अगले साल धान ख़रीदी का यह आंकड़ा और बढ़ गया.

2019-20 की बात करें तो 18,38,592 किसानों से राज्य सरकार ने 83.94 मिट्रिक टन धान की ख़रीदी की. राज्य सरकार ने इस साल और अधिक धान की ख़रीदी की उम्मीद जताई है.

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भ्रष्टाचार का सवाल

लेकिन इन आंकड़ों पर सवाल भी हैं.

पिछले साल की तरह इस साल भी हज़ारों की संख्या में ऐसे मामले सामने आये हैं, जब किसानों के धान का रकबा शून्य या कम दिखा कर, सरकारी अधिकारी उपज ख़रीदने से बचने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं.

पिछले सप्ताह ही कोंडागांव ज़िले के मारंगपुरी गांव के किसान धनीराम पर सहकारी बैंक का 61 हज़ार रुपये का क़र्ज़ था. इसके अलावा खाद-बीज के लिए उसने व्यापारियों से भी क़र्ज़ ले रखा था. धनीराम की पत्नी सुमित्रा का कहना है कि पति ने 100 क्विंटल धान बेच कर क़र्ज़ चुकाने की तैयारी कर रखी थी. लेकिन अधिकारियों ने उसे केवल 11 क्विंटल धान ही बेचने का पात्र बता कर उसे टोकन थमा दिया.

क़र्ज़ से परेशान धनीराम अगले दिन घर से निकल कर अपने खेत में पहुँचा और उसने खेत के एक पेड़ में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. मंगलवार को राजनांदगांव ज़िले के गिधवा गांव के करण नामक किसान की धान ख़रीदी केंद्र में ही दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

परिजनों का आरोप है कि अपनी पत्नी और बेटे के साथ धान ख़रीदी केंद्र में धान बेचने पहुंचे करण से धान ख़रीदने के नाम पर रिश्वत मांगी गई. इसी बात को लेकर बहस हुई और दिल का दौरा पड़ने से किसान की मौत हो गई.

ये दोनों उदाहरण व्यवस्था में मौजूद भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं.

किसान धनीराम
इमेज कैप्शन, किसान धनीराम

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक का कहना है कि 2018-19 में पंजीकृत किसानों की खेती का औसत रक़बा 1.48 हेक्टेयर यानी 3.6 एकड़ था. इस साल सर्वाधिक 21.30 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है.

कौशिक कहते हैं, "पंजीयन कराने वाले किसानों की संख्या और खेती का रकबा चौंकाने वाला है. इस साल किसानों की संख्या बढ़ गई है, लेकिन उनकी खेती का रक़बा देखें तो वह घट कर प्रति किसान 1.29 हेक्टेयर या 3.1 एकड़ रह गया है."

भाजपा शासनकाल में कृषि मंत्री रहे चंद्रशेखर साहू का दावा कि सरकार के दावे महज़ काग़ज़ी हैं और किसान परेशान है.

चंद्रशेखर साहु ने बीबीसी से कहा, "आंकड़ेबाजी में इस सरकार का कोई मुक़ाबला नहीं है. हालत ये है कि धान बेचने के लिये मेरे परिवार के सदस्य सहकारी समितियों में टोकन के लिये भटक रहे हैं. किसानों की खेती का रक़बा कम दिखा कर कम धान ख़रीदने की साजिश रची जा रही है. इनकी फ़ाइलों में ही केवल गांव का मौसम गुलाबी है."

धान की मंडी

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बाज़ार पर असर

राज्य के पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहु खेती के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था को बेहतर बताये जाने के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हैं.

वे कहते हैं, "एक तरफ़ तो सरकार कहती है कि हमारी अर्थव्यवस्था में उछाल है, दूसरी ओर बजट का रोना रोती है और केंद्र से पैसों की माँग करती रहती है. लगातार क़र्ज़ पर क़र्ज़ लेती जा रही है. सरकार पहले तय कर ले कि उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है."

छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले डॉक्टर जेएल भारद्वाज का कहना है कि सरकार किसानों से पूरा धान नहीं ख़रीदती, ना ही सभी किसानों का धान ख़रीदती है. उनका तर्क है कि राज्य में 2010-11 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में 37.46 लाख किसान थे. 2020-21 में यह संख्या बढ़ कर 42 लाख से ज्यादा होने का अनुमान है.

जेएल भारद्वाज का कहना है कि राज्य में केवल 50 प्रतिशत किसानों का ही धान सरकार ख़रीदती है. हालांकि वे मानते हैं कि राज्य में 76 प्रतिशत किसान सीमांत किसान हैं और उनमें से अधिकांश मज़दूरी करते हैं.

भारद्वाज कहते हैं, "एमएसपी और बोनस मिला कर धान के लिये 2500 रुपये क्विंटल के भुगतान से किसानों को लाभ हुआ है और बाज़ार पर इसका असर भी पड़ा है. किसान ख़ुश है तो बाज़ार भी ख़ुश है. लेकिन राज्य में दूसरी विकास योजनाओं पर इसका असर पड़ रहा है."

योजना आयोग से जुड़े रहे कृषि व प्राकृतिक संसाधन अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर दिनेश मरोठिया मानते हैं कि धान के समर्थन मूल्य और बोनस के कारण किसानों को जो लाभ मिल रहा है, वह किसानों की कुल आमदनी में एक महत्वपूर्ण कारक है. इसका असर बाज़ार पर भी होता है लेकिन अब इसमें बदलाव की ज़रुरत है.

वे कहते हैं-"देश भर में धान की उपज सरप्लस है. किसी ज़माने में छत्तीसगढ़ सेंट्रल पुल में एक किलो धान भी नहीं बेच पाता था, आज सेंट्रल पूल में छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण योगदान है. लेकिन धान के कारण दूसरी फसलों की हालत हमारे सामने हैं. किसान कहीं चना सड़कों पर फेंकता है, कहीं टमाटर. कृषि का मतलब केवल धान नहीं होता. क्रापिंग पैटर्न में बदलाव ज़रुरी है और फसल चक्र परिवर्तन करना एक बेहतर विकल्प है."

उनका कहना है कि धान के 2500 रुपये के एमएसपी के कारण किसान दूसरी फ़सलों की दिशा में सोच ही नहीं पाता.

धान की मंडी

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राज्य के पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहु भी फ़सलों में बदलाव की बात कहते हैं. वे केंद्र के कृषि क़ानूनों को सही ठहराते हुए कहते हैं कि एमएसपी का लाभ केवल 6 प्रतिशत किसानों को मिलता है और केवल थोड़े से किसानों के लाभ के चक्कर में 94 प्रतिशत किसानों को खुले बाज़ार से रोकना ठीक नहीं है.

लेकिन पिछले कई सालों से किसानों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले किसान नेता सुदेश टीकम ऐसे तर्कों को किसान विरोधी बताते हैं.

सुदेश टीकम कहते हैं, "अगर आज भी देश के केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है तो इसके लिए कौन ज़िम्मेवार है? यह आंकड़ा तो सरकारों के लिये अफसोस और शर्म का विषय होना चाहिये. लेकिन सरकार इस आंकड़े की ओट ले कर किसानों को बाज़ार के हवाले कर देना चाहती है. भारत में अभी ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं कि किसान भीमकाय बाज़ार की साज़िशों को समझ सके, उनका मुक़ाबला कर सके."

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सुदेश टीकम का कहना है कि आज छोटे से छोटे किसान को भी संरक्षण की ज़रुरत है और अधिक से अधिक किसानों को एमएसपी के दायरे में लाया जाना चाहिए.

वे कहते हैं, "किसान के पास अपनी ज़रुरत के लायक अनाज़ नहीं होता तो भी उसे आज की ज़रुरतों के लिये सारा अनाज बेचना पड़ता है. वह सोचता है कि चार महीने बाद जब जैसी परिस्थितियां आएंगी, तब उसके अनुसार हल निकाल लेगा. आपको लगता है कि इतना मजबूर किसान खुले बाज़ार का मुक़ाबला कर सकता है?"

बाज़ार में जब हरेक सामान पर अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी दर्ज हो, वहां किसानों की फ़सल के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का मसला ताज़ा कृषि क़ानून के बाद और उलझ गया है.

केंद्र सरकार भले कह रही हो कि एमएसपी पर ख़रीदी जारी रहेगी लेकिन क़ानूनी तौर पर इसकी बाध्यता नहीं होने से केंद्र के दावे सवालों के घेरे में है. ऐसे में लगता नहीं है कि एमएसपी पर तकरार अभी कम होगी.

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