किसान आंदोलन में शामिल लोगों की परेशानियाँ क्या-क्या हैं?

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- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
हर रोज़, प्रदर्शन स्थल पर मौजूद महिलाएं जब शौच के लिए जाती हैं, तो वो एक दूसरे का हाथ थामकर एक बड़ा घेरा बना लेते हैं. महिलाएं उसी घेरे में से पेट्रोल पंप पर बने शौचालय तक जाती हैं. इस तरह वो महिलाओं की निजता सुनिश्चित करते हैं.
यह पेट्रोल पंप दिल्ली-हरियाणा के टिकरी बॉर्डर पर स्थित है. गुरप्रीत सिंह, जो पंजाब के संगरूर ज़िले के रहने वाले हैं, वे किसानों के आंदोलन में शामिल हैं. उनके अनुसार, वहाँ मौजूद लोगों ने महिला प्रदर्शनकारियों की सहूलियत के लिए यह रास्ता निकाला है.
गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि "पेट्रोल पंप के मालिक जाट हैं और वो हमारे समर्थन में हैं. वो हमें अपने पेट्रोल पंप में बने शौचालय इस्तेमाल करने देते हैं."
हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पंजाब के लाखों किसान इस वक़्त दिल्ली के पाँच बॉर्डरों पर धरना दे रहे हैं. कुछ अन्य राज्यों के किसान भी इन प्रदर्शन स्थलों पर मौजूद हैं. मगर साफ़-सफ़ाई और हाइजीन, यहाँ चिंता का एक बड़ा विषय बन गये हैं क्योंकि लाखों किसान यहाँ जमा हैं और उन्हें यहाँ डटे हुए 10 दिन से ज़्यादा हो चुके हैं.
केंद्र सरकार ने किसानों के प्रदर्शन के लिए जो जगह (बुराड़ी मैदान) निर्धारित की थी, वहाँ तो दिल्ली सरकार ने मोबाइल शौचालय लगा दिये थे. मगर अधिकांश किसानों ने यह तय किया कि जब तक माँगें पूरी नहीं हो जातीं, वो दिल्ली की सीमाओं पर ही रुके रहेंगे. यहाँ मौजूद किसान मोदी सरकार द्वारा लाये गये कृषि क़ानूनों को 'काले क़ानून' बताते हैं और उनमें सरकार के रवैये को लेकर ख़ासी नाराज़गी है.

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दुनिया भर में, प्रदर्शनों के दौरान एक जागरूक प्रयास के रूप में कचरे का वर्गीकरण किया जाता है ताकि प्रदर्शनकारियों को अनुशासित रखा जाये और उन्हें स्वच्छता के बारे समझाया जाये. प्रदर्शनकारी किसान इस बात को समझते हैं.
सरकारें इस बात पर ज़ोर देती रही हैं कि राजनीतिक जमावड़े, ख़ासकर धरने ऐसी जगहों पर नहीं होने चाहिए जहाँ गंदा हो.
'दिल्ली चलो' आंदोलन को लेकर भी ऐसी चिंताएं ज़ाहिर की गईं हैं क्योंकि प्रदर्शन स्थलों पर कुल मिलाकर पाँच लाख से ज़्यादा किसान मौजूद हैं, वहाँ 96 हज़ार से ज़्यादा ट्रैक्टर-ट्राली हैं और ट्रक हैं जिन्हें सोने के लिए बंकरों में तब्दील कर लिया गया है.
ब्रितानी मानव-विज्ञानी मैरी डगलस ने 1966 में कहा था, "जैसा कि हम जानते हैं कि गंदगी अनिवार्य रूप से एक विकार है." ठीक उसी तरह किसानों का विरोध प्रदर्शन भी केंद्र सरकार की आँखों में एक गंदगी हैं, और इस लिए जो किसान इस आंदोलन के लिए इकट्ठा हुए हैं, उनके लिए यह महत्वपूर्ण है कि वो महामारी के इस समय में उनके अनुशासन और स्वच्छता के पैमानों को भी प्रदर्शित करें.
टिकरी बॉर्डर पर हमने देखा कि एक किसान प्रदर्शन स्थल के कुछ क्षेत्र को सेनेटाइज़ कर रहा था. वहाँ ट्रालियों में रखे गद्दे-बिस्तरों को नियमित रूप से कुछ देर की धूप दिखाई जा रही है. पानी के टैंकर जो किसान ख़ुद भरकर लाये हैं, उन्हें एक तरफ़ खड़ा किया गया है. जबकि दूसरी ओर पत्तलों और बाक़ी वेस्ट को डाला गया है. खाने के बाद जो कचरा जमा होता है, उसे भी नियमित रूप से निपटाया जा रहा है.

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खुले में शौच की समस्या
महामारी के बीच में, जब धीरे-धीरे ठंड और बढ़ रही है, किसान इस अनुशासन को बनाये रखना चाहते हैं क्योंकि सरकार के साथ अब तक जो भी बातचीत हुई है, उससे फ़िलहाल कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है.
सिंघू बॉर्डर पर, स्थानीय लोग महिला प्रदर्शनकारियों को अपने शौचालयों का इस्तेमाल करने दे रहे हैं. साथ ही अपने मोटर पंपों से किसानों द्वारा लाये गये पानी के टैंकर भरने में उनकी मदद कर रहे हैं.
वहीं टिकरी बॉर्डर पर हरियाणा की नगर पालिका परिषद ने 392 मोबाइल शौचालय स्थापित किये हैं और किसानों को पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं. इसके अलावा नगर पालिका परिषद द्वारा इलाक़े में फ़ॉगिंग भी की जा रही है. स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, यह एक अभूतपूर्व स्थिति है क्योंकि उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र में इतने बड़े समूह से डील करने के तरीक़े तलाशने पड़ रहे हैं.
बहादुरगढ़ इलाक़े में पड़ने वाले टिकरी बॉर्डर नगर पालिका क्षेत्र के एग्ज़ीक्यूटिव अफ़सर अतर सिंह ने बताया कि "हम पहले दिन से ही काफ़ी प्रयास कर रहे हैं. हमने अन्य नगर पालिका परिषदों से मोबाइल शौचालय किराये पर लिये हैं. कुछ ख़रीदे भी हैं और इलाक़े में कारख़ानों को खुलवाया है ताकि किसान उनमें बने शौचालयों को इस्तेमाल कर सकें."
नगर पालिका परिषद ने क़रीब 100 सफ़ाई कर्मचारियों की ड्यूटी टिकरी बॉर्डर प्रदर्शन स्थल पर लगाई हुई है. साथ ही कचरे के प्रबंधन के लिए सेप्टिक टैंक भी वहाँ रखे गये हैं.
स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, वो इस बात पर नज़र बनाये हुए हैं कि किसानों को खुले में शौच के लिए ना जाना पड़े. इसी वजह से जितनी जगहों पर संभव हो पाया, स्थानीय प्रशासन ने मोबाइल शौचालय लगाये हैं.
अतर सिंह ने बताया कि 'हमने धरना स्थल पर मास्क बँटवाने की योजना भी बनाई है. किसानों द्वारा पानी के जो टैंकर लाये गए हैं, हम उन्हें भरने में भी उनकी मदद कर रहे हैं.'

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स्थानीय मदद
18 वर्षीय चहाना, हरियाणा के हिसार ज़िले की रहने वाली हैं. वे अपने क्षेत्र की प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फ़्रंट नामक संस्था से जुड़ी हुई हैं. किसानों के साथ अपना समर्थन ज़ाहिर करने के लिए वे भी धरना-स्थल पर पहुँची हैं. वो 20 लड़कियों के एक समूह में टिकरी बॉर्डर तक आयी हैं.
उन्होंने बताया कि वो 26 नवंबर को यहाँ पहुँची थीं. उस रात उन्होंने लंगर में खाना खाया और एक ट्रॉली में उन्होंने अपने समूह के सोने की व्यवस्था की. इसके बाद लड़कियों के इस समूह ने प्रोटेस्ट साइट पर ही रहने का निर्णय लिया. इन लड़कियों ने पास के ही बाज़ार से अपने लिए कुछ कपड़े ख़रीदे. फिर पास के ही कुछ दफ़्तरों में जहाँ अन्य प्रदर्शनकारी महिलाएं ठहरी हुई हैं, वहाँ अपने रहने की व्यवस्था की.
लड़कियों ने बताया कि उनके लिए एक दिन छोड़कर नहाना, थोड़ा मुश्किल है. पर ये सभी लड़कियाँ एक फ़ैक्ट्री का शौचालय इस्तेमाल कर रही हैं.
चहाना ने बताया, "हम किसान परिवारों से नहीं हैं. पर हम किसानों के समर्थन में यहाँ आये हैं. मुंडका और टिकरी बॉर्डर मेट्रो स्टेशन पर जो शौचालय हैं, हम उन्हें भी इस्तेमाल करते हैं."
ये लड़कियाँ पहली बार किसी आंदोलन में शामिल हुई हैं. एक ऐसा आंदोलन जो जल्द ही अपना दूसरा सप्ताह पूरा कर लेगा.
प्रदर्शन स्थल से जाने के सवाल पर ये लड़कियाँ कहती हैं कि माँगें पूरी होने तक वो वहीं रहने वाली हैं.

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टिकरी बॉर्डर पर, और अन्य सीमाओं पर जहाँ दर्जनों किलोमीटर तक सिर्फ़ ट्रैक्टर और ट्रालियाँ ही दिखाई देते हैं, उनके बीच कुछ जगहों को 'खुले में नहाने की जगह' के तौर पर मार्क किया गया है. प्रदर्शनकारी महिलाएं स्थानीय घरों में नहाती हैं या फिर सीमा पर स्थित फ़ैक्ट्रियों में.
गुरप्रीत सिंह के अनुसार, यह विनिमय करने जैसा है. वे कहते हैं, "हम उन्हें बादाम और खाना-पीना दे देते हैं और वो हमें अपने फ़ैक्ट्री में शौचालय इस्तेमाल करने देते हैं और यह तरीक़ा हमारे काम आ रहा है."
भटिंडा के रमनदीप सिंह मान भी किसानों के समर्थन में सिंघू बॉर्डर पहुँचे हैं. यहाँ स्थानीय लोग ही किसानों की मदद कर रहे हैं. यह इलाक़ा ग्रामीण क्षेत्र में आता है, यानी यह किसी नगर पालिका परिषद में नहीं है. सरकार ने यहाँ कोई मोबाइल शौचालय नहीं लगवाया है. रमनदीप कहते हैं कि 'स्थानीय लोगों से बहुत मदद मिली है.'
शौचालय का मुद्दा
किसानों के प्रदर्शन स्थलों पर ख़ालसा ऐड इंडिया जैसी कुछ संस्थाएं हैं, जो महिलाओं को मुफ़्त सैनिटरी पैड्स बाँट रही हैं. इन संस्थाओं ने अपने स्तर पर महिलाओं के लिए कुछ मोबाइल टॉयलेट भी लगाये हैं.
60 वर्षीय सुरजीत कौर जो पंजाब के मोगा से हैं, वे कई अन्य महिला किसानों के साथ टिकरी बॉर्डर पहुँची हैं. वे कहती हैं कि मुश्किलें काफ़ी हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "हम एक तरह से सड़क पर ही रह रहे हैं जो ऐसी ठंड में काफ़ी मुश्किल काम है. पर इन मुश्किलों को देखकर हम पीछे हटने वाले नहीं है. हम चाहते हैं कि सरकार हमारी माँगों को माने."

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वे कहती हैं, "हम रोज़ नहा नहीं सकते. शौचालय ढूंढने में भी कई बार परेशानी होती है. पर जैसे तैसे हम स्थिति को संभाल रहे हैं."
महिलाओं का यह समूह भारतीय किसान यूनियन से जुड़ा है. इस समूह में अधिकांश महिलाएं 50 वर्ष से अधिक उम्र की हैं और सभी महिलाएं तमाम दिक्क़तों के बाद भी, माँगे पूरी होने तक यहाँ टिकने के लिए तैयार हैं.
खुले में शौच के लिए यहाँ मौजूद लोग उन खेतों का रुख़ करते हैं जिनमें कोई फ़सल बोई नहीं गई है या फिर वो किसी अन्य वजह से ख़ाली हैं.
किसान संगठनों ने इस आंदोलन के लिए काफ़ी तैयारी की. वो अपने साथ एंबुलेंस लेकर आये हुए हैं. कुछ चैरिटेबल संस्थाओं ने इसमें उनकी मदद की है. किसानों के पास कई महीने का राशन भी है. लेकिन शौचालय अभी भी यहाँ मौजूद लोगों के लिए एक मुद्दा है.
हरियाणा के करनाल से आने वाले अगदीप सिंह औलख जो भारतीय किसान यूनियन में स्टेट कोर कमेटी के सदस्य हैं, कहते हैं कि 'ठंड और महामारी के बावजूद वे सरकार द्वारा लाये गये इन काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.'
'जीवन में संघर्ष की आदत है'

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औलख फ़िलहाल सिंघु बॉर्डर पर किसानों के बीच हैं. वे कहते हैं कि लोग पूरा श्रद्धा के साथ यहाँ आ रहे हैं और लोगों की संख्या लगातार बढ़ी है.
वे कहते हैं, "किसान का जीवन वैसी भी कठिनाइयों से भरा जीवन है. हमें अपने जीवन में संघर्ष की आदत है. इसलिए ये परेशानी कोई बड़ी चीज़ नहीं है. स्थानीय लोगों से बहुत मदद मिल रही है. क़रीब 50-50 लोग एक घर में नहाने के लिए जा रहे हैं. कुछ एजेंसियों ने भी यहाँ व्यवस्था की है."
हरियाणा और दिल्ली पुलिस द्वारा किसानों पर चलाई गयी वॉटर कैनन को यहाँ ज़्यादातर लोग 'शावर' बताते हैं.
गुरप्रीत सिंह का कहना है, "लोगों के अनुपात में यहाँ पानी की कमी है. ऐसे में जब पुलिस वॉटर कैनन चलाती है, तो हमारा नहाने का काम हो जाता है."
वे कहते हैं, "किसानों को ये पानी से डराने की सोच रहे थे. हम ठंडे में ठंडे पानी से नहाने के आदि हैं. इससे हमारा क्या होगा!"
टिकरी बॉर्डर पर 45 वर्षीय गुरमीत सिंह का स्टॉल 'आपसी-सहयोग' का बढ़िया उदाहरण है.

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वे लोगों को काढ़ा बनाकर दे रहे हैं ताकि खाँसी या ज़ुकाम की शिकायत का सामने कर रहे किसानों को थोड़ी राहत मिले.
गुरमीत सिंह पास ही रहते हैं. उन्होंने अपने बेटे और बेटी के साथ, एक स्टॉल लगाया है ताकि छोटी-मोटी मेडिकल समस्याओं पर परामर्श दे सकें.
वे कहते हैं, "हम देखा कि बहुत से किसान घायल हुए, इसलिए हमने उनकी पट्टी की और उन्हें कुछ दवाएं दीं."
गुरमीत के बड़े भाई इंदरजीत सिंह एक डॉक्टर हैं. वे भी स्टॉल पर नियमित आते हैं और किसानों का हाल-चाल लेते हैं.
तो कुछ इस तरह देश की राजधानी दिल्ली की सीमा पर यह आंदोलन चल रहा है. 11 दिन बीत चुके हैं. सरकार और किसानों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है. इस बीच स्थानीय लोगों से आपसी लेन-देन और प्रदर्शनकारियों के अनुशासन के दम पर यह प्रोटेस्ट आगे बढ़ रहा है.
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