किसान आंदोलन: सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने कैसे जारी रखी है अपनी लड़ाई - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, सिंघु बॉर्डर से, बीबीसी हिंदी के लिए
एक महिला की रिकॉर्डेड आवाज़ बार-बार लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सीख दे रही थी. वो आवाज़ बिल्कुल नीरस और मशीनी मालूम हो रही थी. जैसे हर इंसानी जज़्बात से महरूम हो. उसे सुनकर बड़ा अजीब लग रहा था. जैसे वो आवाज़ याद दिला रही हो कि दुनिया अभी भी एक महामारी के दौर से गुज़र रही है.

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ये मंज़र दिल्ली की सीमा पर चल रहे एक प्रदर्शन का है. जहां सड़क के उस पार आपको पानी की बौछार करने वाला टैंकर खड़ा दिखता है. पास में ही ऐसे कुछ और ट्रक खड़े हैं. और हां, वहां पर कुछ पुलिसवाले भी दंगा रोकने वाले साज़-ओ-सामान से लैस होकर खड़े हैं.

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वो बैरीकेड के इस पार तैनात हैं. उनमें से कुछ पुलिसवालों के कंधों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने वाली बंदूकें टंगी हैं. अपने हाथों में डंडे लिए, आंसू गैस के गोले दागने वाली बंदूक से लैस और हेलमेट पहने खड़े वो हथियारबंद पुलिसवाले, वहां यूं खड़े थे, मानो वो देश की राजधानी दिल्ली पर क़हर बरपा रहे कोरोना वायरस को चुनौती दे रहे हों.
उनके पास कोई और विकल्प भी तो नहीं. ये पुलिसवाले दिल्ली और हरियाणा के टीकरी बॉर्डर पर तैनात किए गए हैं. उनकी ज़िम्मेदारी है कि सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक सकें.

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ये बैरीकेड, तारों की बाड़, सीमेंट के ब्लॉक और बालू से लदे ट्रकों के इस पार की दुनिया है. उस पार का नज़ारा किसी और दुनिया में पहुंच जाने का एहसास दिलाता है. उधर से देखें, तो दिल्ली की सीमा पर ट्रकों, पुलिसवालों और बैरिकेडिंग का ये दस्ता बड़ा मामूली सा सुरक्षा इंतज़ाम लगता है.
क्योंकि, उस पार हज़ारों की तादाद में ट्रैक्टर खड़े हैं, और अगर उन्होंने ये ठान लिया कि उन्हें इन बाधाओं को पार करके दिल्ली की सीमा में दाख़िल होना है, तो ये सारे इंतज़ाम ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएंगे.

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मैदान-ए-जंग
दिल्ली बॉर्डर पर डेरा डाले ये किसान पहले ही बहुत सी मुश्किलों को मात देकर यहां पहुंचे हैं. पंजाब से हरियाणा होते हुए दिल्ली आने के दौरान इन किसानों ने सड़क पर खोदी गई खाइयों को लांघा है, आंसू गैस के गोलों और इस ठंड में पानी की बौछारों का मुक़ाबला किया है.
पंजाब और हरियाणा के इन प्रदर्शनकारी किसानों के बैरिकेडिंग को नदियों में फेंकने की तस्वीरें भी सामने आई थीं. सोशल मीडिया के इस दौर में हर बात को दर्ज किया जाता है.
कुल मिलाकर कहें तो पश्चिमी दिल्ली का ये टीकरी कलां बॉर्डर, जंग के मैदान जैसा दिखता है. जिन कंटीले तारों को नियमों के हिसाब से ज़मीन से थोड़ा ऊपर लगाया जाना चाहिए था, वो यहां धूल में लोट रहे थे.

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दोपहर बाद की रौशनी में लोहे की पट्टियां ख़ूब चमक रही थीं. लेकिन, किसानों ने अपनी सरहद ख़ुद तय कर ली थी. वो सीमा को लांघ कर इस पार नहीं आने जा रहे थे. उन्होंने दिल्ली के बॉर्डर पर ही डेरा डालने का फ़ैसला किया था.
सरकार ने किसानों के सामने प्रस्ताव रखा था कि वो दिल्ली के बुराड़ी में स्थित निरंकारी मैदान में जमा होकर अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखें. लेकिन किसानों ने सरकार के इस प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया था.
एक किसान ने सवालिया अंदाज़ में कहा कि, 'कौन चाहेगा कि उसे एक कोने में फेंक दिया जाए?'

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कंटीले तारों की सरहद
उसने तारों के इस जाल पर एक नज़र डाली.
कंटीले तारों की धार बहुत नुकीली होती है. इन्हें लगाने का मक़सद किसी इंसान या जानवर को एक ख़ास इलाक़े में दाखिल होने से रोकना होता है. भारत सरकार ने, बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ रोकने के लिए पूरी भारत बांग्लादेश सीमा पर ये कंटीले तार लगाने का फ़ैसला किया था.
तारों का ये ताना-बाना सरहद पर लगाने का मक़सद, सीमा के आर-पार अवैध और असामाजिक गतिविधियों को रोकना था. सितंबर महीने में सरकार ने ऐसे ही तार लद्दाख सीमा पर लगाए थे, जिससे कि चीन की घुसपैठ को रोका जा सके.
अमेरिका के आदिवासी क़बीलों के लोग इन कंटीले तारों को शैतान की ज़ंजीर कहा करते हैं.

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उस किसान ने कहा कि, 'हम एक पल में इन इंतज़ामों की धज्जियां उड़ा सकते हैं. लेकिन हम यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने आए हैं.'
ये कहते हुए वो ट्रकों और ट्रैक्टरों की उस भूलभुलैया में गुम हो गया. गाड़ियों की ये क़तारें यूं दिखाई देती हैं, मानों बदन की नसें अस्त-व्यस्त हो गई हों. एक दूसरे से जुड़ी और जगह-जगह से मुड़ी-तुड़ी इन नसों में ही तो ज़िंदगी को रवानी देने वाला लहू दौड़ता है.

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मीडिया का ध्यान खींचने का तरीक़ा
ख़बरों में किसानों के प्रदर्शन का सिर्फ़ एक पहलू देखने को मिल रहा है. मीडिया का नैरेटिव किसानों के 'विरोध के आयाम' पर ज़ोर देने वाला है. कवरेज का ज़ोर नौटंकी और विरोध प्रदर्शन के चलते दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मची उथल-पुथल को उजागर करने पर है.
प्रदर्शनकारियों को भी मालूम है कि नाटकीयता और अपारंपरिक तरीक़ों से ही वो मीडिया का ध्यान अपनी ओ खींच सकते हैं.
भारत जैसे देश में जहां मीडिया ध्रुवों में बंटा है, वहां एक पक्ष की बात को या तो अनदेखा कर दिया जाता है, या फिर तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है. ऐसे में किसानों ने हमेशा ही ऐसा तरीक़ा ईजाद कर लिया है, जिससे वो मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींच सकें.
मसलन, अप्रैल 2017 में जब तमिलनाडु के किसान दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन के लिए जुटे थे. तो उन्होंने, नुक्कड़ नाटकों के ज़रिए अपना दर्द मीडिया के सामने पेश किया था.

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विरोध प्रदर्शन के 39वें दिन, ज़मीन पर एक किनारे खोपड़ियां लुढ़क रही थीं. हर आने-जाने वाले के लिए ये एक तमाशा था. उस प्रदर्शन में महज़ आठ किसान शामिल थे.
मई की उस तपती धूप में बैठकर 73 बरस के बुज़ुर्ग किसान अयक्कन ये चर्चा कर रहे थे कि क्या उन सबको ख़ुद को बेड़ियों में जकड़ कर सड़क पर घसीटने का एक और नाटक करना चाहिए? क्योंकि, उससे पहले उन्होंने पेशाब पिया था और इंसानों का मल खाया था.
जब उन किसानों ने विरोध जताने के तय ठिकाने जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया था, तभी उन्होंने अपने इस नाटक की पटकथा लिख ली थी. उन किसानों ने क़ब्रें खोद ली थीं, खोपड़ियां जुटा ली थीं और उन्हें अपने गले में लटकाकर वो देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे थे.

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अभिव्यक्ति के अड्डे
विरोध प्रदर्शन को असरदार बनाने के लिए उस पर पूरा ध्यान लगाना पड़ता है. प्रदर्शनकारियों को नज़रों से ओझल कर दिए जाने की राजनीति का अंदाज़ा बहुत अच्छी तरह है. वो ऐसी कोशिश का विरोध करना जानते हैं.
जामिया यूनिवर्सिटी का एक छात्र दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे इस प्रदर्शन में, दीवार पर तस्वीरें उकेरने के बारे में सोच रहा था.
स्थानीय लोगों ने प्रदर्शनकारी किसानों के खाने के लिए अपने घरों और दिलों के दरवाज़े खोल दिए हैं. किसानों के समर्थन में एक व्यक्ति तो बिहार के मधुबनी ज़िले से यहां पहुंचा है.

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किसानों ने सीमेंट के काले पीले ब्लॉक को जोड़ कर भट्ठी बना ली और अब वो उस पर खाना पका रहे हैं. किसानों से एकजुटता की इस नुमाइश और मौक़े पर मौजूद हर संसाधन के चतुराई भरे प्रयोग ने किसानों के धरना स्थल को प्रतिकार का मज़बूत प्रतिमान बना दिया है.
हाल के दिनों में हमने पूरी दुनिया में विरोध प्रदर्शनों को बदलाव का ताक़तवर औज़ार बनते देखा है. इसके ज़रिए लोग अपने मुद्दे लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं, जिससे कि वो अपनी आवाज़ हुक्मरानों को सुना सकें, उनकी नज़र में आ सकें.
विरोध प्रदर्शन के ये ठिकाने जनभावना की अभिव्यक्ति के अड्डे बन गए हैं. हुकूमत के विरोध में तने खड़े क़िलों में तब्दील हो गए हैं और राजनीतिक, सामाजिक विषयों पर संवाद का माध्यम भी बने हैं. मगर, विरोध के ये अड्डे ज़ुल्म-ओ-सितम के गवाह भी बने हैं. जहां पर आंसू गैस के गोलों और पानी की तेज़ बौछारों से नागरिकों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाती है.

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आंसू गैस का मुक़ाबला टूथपेस्ट से!
पंजाब के फरीदकोट से ताल्लुक़ रखने वाले रोमाना मनप्रीत, एक फ़ोटो जर्नलिस्ट रहे हैं.
रोमाना एक राज़ बताते हैं. टूथपेस्ट की मदद से आंसू गैस का मुक़ाबला किया जा सकता है. विरोध प्रदर्शनों को कवर करने के लिए जाने वाले पत्रकार अपने साथ टूथपेस्ट ले जाते हैं, ताकि जब भीड़ को भगाने के लिए सरकार आंसू गैस के गोले दागे, तो वो अपना बचाव कर सकें.
रोमाना कहते हैं कि, 'हम आज भी अपनी बिरादरी के पुराने उसूलों पर चलते हैं. टूथपेस्ट, गीले कपड़े और दौड़ने वाले जूते हमेशा अपने साथ रखते हैं.'
मनप्रीत कहते हैं कि देश की राजधानी में किसी भी दोपहर को विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनना, असल ज़िंदगी से रूबरू होने जैसा है. तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले ये प्रदर्शन, एक क़ौम के ज़िंदा होने का सुबूत हैं.
मनप्रीत का 13 बरस का बेटा भी उनके साथ आया है.

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टीकरी कलां, दिल्ली को रोहतक से जोड़ने वाली सड़क पर है. दिल्ली की सरहद के ख़ात्मे का एलान करने वाले टोल बूथ ख़ाली हैं.
मेट्रो स्टेशन के नीचे से गुज़रने वाली सड़क पर कारें और बसें खड़ी हैं. यहां आप ख़ुद को हथियारबंद लोगों के बीच पाते हैं. यहां सरकार ने सीमा सुरक्षा बल जैसे अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है, ताकि वो उन हज़ारों किसानों से निपट सकें, जो दिल्ली के मशहूर धरना स्थल जंतर मंतर पर आना चाहते थे. जिससे वो संसद के बनाए तीन किसान क़ानूनों की मुख़ालफ़त कर सकें.

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क़ानून, जो बने विरोध का कारण
सरकार ने किसानों के फ़ायदे का दावा करते हुए जो तीन क़ानून बनाए हैं वो इस तरह हैं-
1. कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर क़रार क़ानून 2020
2. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) क़ानून 2020
3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) क़ानून 2020
सरकार इन्हें किसानों के फ़ायदे का सौदा कहती है, तो विपक्षी दलों ने इन तीनों क़ानून को 'किसान विरोधी' क़रार दिया है.
पहले जून महीने में सरकार ने इन तीनों क़ानूनों को अध्यादेश की शक्ल में लागू किया था. इसके बाद, देर से बुलाए गए संसद के मॉनसून सत्र में तीनों क़ानूनों को लोकसभा और राज्यसभा से ध्वनिमत से पारित कर दिया था.

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कई किलोमीटर फैला कारवां
ट्रकों के ऊपर युवा किसान अपने अपने संगठनों के झंडे लहराते हुए नारे लगा रहे हैं. लाल, हरे और पीले. एक छोटे से रास्ते से अंदर घुसते ही आप प्रदर्शनकारियों के बीच जा पहुंचते हैं. ट्रकों और ट्रैक्टरों की ये भुलभुलैया कई किलोमीटर तक फैली है.
प्रदर्शन स्थल पर कम से कम पाँच लाख किसान और 90 हज़ार से अधिक ट्रक और ट्रैक्टर खड़े हैं, एक आदमी वहां तख्ती लिए खड़ा है. इस पर लिखा है, "मीडिया वालों सच बोलो, प्लीज़"

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पूरा नज़ारा तमाम कारवां का फलक लगता है. शाम ढल रही है और रात के खाने की तैयारियां चल रही हैं. ट्रैक्टरों को बेडरूम, सामान रखने की जगह और रसोई में तब्दील कर दिया गया है. ट्रकों के भीतर बंकर बने हुए हैं.
ट्रैक्टर पर बड़े बड़े वूफ़र और स्पीकर में लोकप्रिय गीत बज रहे हैं. पास ही चल रहे जेनरेटर का शोर भी उसमें घुल मिल रहा है. वक़्ती तौर पर बसाई गई इस अस्थायी दुनिया में अजब तरह का भाई-चारा देखने को मिलता है. मिली-जुली रसोइयां हैं. युवा और बुज़ुर्ग हैं. एक साथ रहने-खाने और सोने का इंतज़ाम है.

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चलो दिल्ली
'चलो दिल्ली' के इस मार्च का आयोजन क़रीब पांच सौ किसान संगठनों ने मिलकर किया है, इनमें ऑल इंडिया किसान संघर्ष को-ऑर्डिनेशन कमेटी और राष्ट्रीय किसान महासंघ शामिल हैं.
इन दोनों संगठनों के झंडे तले ही किसानों के क़रीब 350 समूह एकजुट हुए हैं. किसान इसे 'बिना किसी अगुवा का आंदोलन' कहते हैं. वो इसकी तुलना शाहीन बाग़ से करते हैं, जो बिना किसी नेतृत्व के सामुदायिक स्तर पर चलाया गया था.
शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने लंबे समय तक अपने आंदोलन की कमान किसी भी राजनीतिक संगठन के हाथ में नहीं जाने दी थी.

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बुराड़ी के निरंकारी समागम मैदान में तमाम राजनीतिक दलों द्वारा संचालित अस्थायी रसोइयां 28 नवंबर को तैयार की जा रही थीं. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने बड़े बड़े तंबुओं तले अपनी अपनी रसोइयां सजाई थीं. यहां कोविड-19 के टेस्ट की भी व्यवस्था की गई थी. इससे पहले वाली शाम को कुछ किसान, अपने ट्रैक्टर और ट्रॉलियों के साथ बुराड़ी के मैदान में आ गए थे.
58 बरस के जसपाल सिंह पंजाब के फ़रीदकोट ज़िले से यहां आए हैं. केसरिया पगड़ी बांधे, जसपाल सबके लिए इलायची वाली चाय का इंतज़ाम कर रहे थे.

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उन्होंने ज़मीन पर तंदूर लगा दिया था. तंदूर इस कदर धधक रहा था कि अगर आप उस पर अपने पांव रखें, तो आपके जूते पिघल जाएं. किसानों ने इस ग़ुस्ताख़ सोच को हंसी में उड़ाया और मुझे तंदूर से परे खींचा. उन्होंने घर से लाई हुई पिन्नी और चाय से मेरा स्वागत किया.
जसपाल ने कहा कि, 'हमें कोई नहीं वरग़ला रहा है. हमें अपने हक़ मालूम हैं. हमें सियासत की सुर-ताल भी पता है.'

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जसपाल मानो अपनी मासूम निगाहों से आपसे राब्ता करते हों. उन्होंने मुझे रोटियों से भरा एक डिब्बा दिखाया. वो लोग घर चलाने के लिए ज़रूरी रोज़मर्रा का सामान एक ट्रक में भरकर अपने गांव से लाए थे. ट्रक पर गैस सिलेंडर, लकड़ियां, मिल्क पाउडर के डब्बे, आलू-प्याज़ के बोरे, आटा, दाल-चावल, मसाले और घर में तैयार देसी घी जैसी चीज़ें रखी हुई थीं.
अगर ठीक-ठीक हिसाब लगाएं, तो पचास किसानों के इस समूह के लिए दस गैस सिलेंडर, पचास किलो आटा, चावल और दालें वग़ैरह थीं.

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जसपाल कहते हैं कि, 'जी, हम तो छह महीने का राशन लेकर यहां आए हैं. पीछे से सब्ज़ियां और दूसरे सामान लेकर और लोग भी आ रहे हैं.'
ये किसान अपने स्टील के कप-प्लेट भी लेकर आए हैं. हर किसान अपने साथ पांच जोड़ी कपड़े लेकर आया है. वो इतनी आसानी से यहां से वापस नहीं जाने वाले, क्योंकि वो पूरी तैयारी से दिल्ली आए हैं.
किसानों के बीच आपको किसी भी सामान की कमी नहीं दिखेगी. वो तो अपने गद्दों के नीचे बिछाने के लिए पुआल या पराली भी लेकर आए हैं.

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'पूरी ताक़त जुटाकर विरोध करना ही होगा'
ट्रैक्टर ट्रॉलियों के ऊपर बांस से तिरपाल को बांधा गया है, जिससे कि इस ठंड में पड़ रही ओस से बचा जा सके. हर ट्रॉली पर बल्ब लगा है. कंबल हैं और गद्दे बिछाए गए हैं. हर ट्रॉली में बारह लोगों के रहने का इंतज़ाम है.
किसानों के बैग से भरी एक ट्रॉली मुझे दिखाते हुए जसपाल कहते हैं कि, 'ये हमारा बेडरूम है. हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि यहां कितने दिन रहना पड़ेगा. जब हम घर से चले थे, तभी से हमें अंदाज़ा था कि ये लड़ाई लंबी चलेगी.'
जसपाल के पास गांव में 28 एकड़ ज़मीन है. उन्हें डर है कि खेती-बाड़ी के निजीकरण से किसानों की पहचान ही मिट जाएगी. वो कहते हैं कि, "हमें अपनी पूरी ताक़त जुटाकर इन क़ानूनों का विरोध करना ही होगा."
जसपाल के बगल में एक युवक खड़ा है. उसका नाम मीत सिंह गिल है. वो किसानों की मदद के लिए अपने गांव से आया है. मीत सिंह का परिवार टीकरी बॉर्डर पर रुका है. लेकिन, वो ख़ुद एक बैग लेकर उन लोगों के साथ बुराड़ी चला आया, जो फ़रीदकोट से यहां आए हैं.
बठिंडा का रहने वाला मीत सिंह, दिल्ली के एक कॉल सेंटर में काम करता है. मीत कहता है कि, "सारे किसान हमारे परिवार हैं जी."

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'हम पूरी तैयारी से आए हैं'
27 बरस के एक और किसान मोहित मवई बताते हैं कि उनके पास किसी चीज़ की कोई कमी नहीं. मोहित कहते हैं कि, 'कोई हमें ये न बताए कि हमें कैसे इंतज़ाम करना है.'
तीस साल के भूपिंदर चौधरी भारतीय किसान यूनियन से जुड़े एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. वो हरियाणा की महिला किसानों के साथ एक ट्रैक्टर ट्रॉली पर सवार होकर यहां विरोध प्रदर्शन के लिए आए हैं.
भूपिंदर ने कहा कि, 'हम पूरी तैयारी से आए हैं और बॉर्डर पर डटे रहेंगे.'
किसानों के इस विरोध प्रदर्शन की ताक़त ये भाई-चारा और सेवा का भाव ही है, जो सिख परंपराओं का अभिन्न अंग है.
दिल्ली की उत्तरी सीमा यानी सिंघु बॉर्डर पर किसान, जीटी करनाल रोड पर डटे हैं. पंजाब और हरियाणा के इन किसानों ने रविवार 29 नवंबर को ही साफ़ कर दिया था कि केंद्र की हुकूमत किसी मुग़ालते में न रहे. वो यहां लंबी लड़ाई के लिए आए हैं.
टीकरी बॉर्डर पर पहुंचें, तो जंग के मैदान जैसा मंज़र दिखता है. टूटे कांच के टुकड़े बिखरे हुए हैं. किसानों और सुरक्षाबलों के बीच एक बफ़र ज़ोन है. यहां युवा किसान लाठियां लेकर डटे हैं. वो अपने धरने की निगरानी कर रहे हैं, जिससे कि कोई 'अवांछित तत्व' उनके बीच घुसपैठ न कर सके.
मीडिया में पहले ही किसानों के बीच खालिस्तानी आतंकवादी होने की बातें चल रही हैं. कुछ मीडिया संस्थान तो किसानों के विरोध-प्रदर्शन को ये कहकर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं कि ये तो एक अलगाववादी आंदोलन है, जो सरकार को ब्लैकमेल करना चाहता है.

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इस आंदोलन को आगे चलाते रहने की असली कुंजी इन किसानों का अनुशासन ही है. किसानों का कहना है कि विरोध करना तो उनका संवैधानिक हक़ है. क्योंकि इससे सामूहिक जवाबदेही की संभावनाएं पैदा होती हैं, और मज़बूत होती है वो उम्मीद जो किसानों के तमाम संगठनों ने जगाई है.
धरने में मौजूद हर शख़्स ज़िम्मेदारी के एक अटूट बंधन से बंधा है. उन्हें अच्छे से पता है कि अगर उनकी ओर से हिंसा हुई, तो फिर हुकूमत उन्हें इसका जवाब और अधिक हिंसक बर्ताव से देगी. फरीदकोट से आए सुखप्रीत सिंह कहते हैं कि अहिंसा ही उनके लिए एकमात्र रास्ता है.
सुखप्रीत कहते हैं कि, 'मैं यहां अपने हक़ की लड़ाई लड़ने आया हूं, मगर हमारा रास्ता अमन का है.'

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'क़ानून हमारी नस्ल ख़त्म करने की नीयत से बनाए गए'
किसानों के धरने के बीच चल रहे अनगिनत लंगर के बीच से एक गीत उभरता है, जो यहां के लोगों के खाना-पकाने और रोज़मर्रा के दूसरे कामों की धुन के ऊपर हावी हो जाता है. राज माखा तुंबी बजा रहे हैं. उनके चारों ओर तमाम किसान जुट गए हैं, और एक बार फिर वो लोक गीतों में अमर, उधम सिंह की कहानी सुन रहे हैं. इस लोक गीत में उधम सिंह की वीरता और उनके कारनामों को दर्ज किया गया है.
राज माखा कहते हैं कि, 'उधम सिंह हमारे नायक हैं.' माखा सांझ ढले तक लगातार वो गीत गाते रहते हैं. वो तुंबी का इस्तेमाल करके अपने हुनर को और चटख़ बनाने की कोशिश करते हैं.
थोड़ा आगे चलने पर, एक ट्रक को दो मंज़िलों का बना दिया गया है. यहां तीस लोगों के सोने का इंतज़ाम किया गया है. ट्रक की छत पर सत्रह बरस का एक छात्र बैठा है. वो सब मोंगा से आए हैं.
सुखप्रीत सिंह बरार कहते हैं कि, 'अगर मोदी इन क़ानूनों को वापस नहीं लेते, तो हम नहीं जाएंगे. हम किसानों के बेटे हैं.'
तीन युवक लाठियां लेकर गश्त लगा रहे हैं. उनमें से एक हैं 28 बरस के जितेंदर सिंह, जो फ़रीदकोट ज़िले से आए हैं.
वो कहते हैं कि, "हम किसी पर हमला नहीं कर रहे, लेकिन अगर कोई हम पर हाथ उठाएगा तो हम चुप नहीं बैठेंगे. ये क़ानून तो हमारी नस्ल को ख़त्म करने की नीयत से बनाए गए हैं."
उन युवकों में से एक, 25 वर्ष के सुखप्रीत सिंह कहते हैं कि घर से चलने से पहले गांव में उन्होंने अपने परिजनों से यही कहा था कि उन्हें नहीं पता कि वो कब वापस आएंगे. वो कहते हैं कि, "अगर हमें यहां हमेशा के लिए रुकना पड़ा, तो हम उसके लिए भी तैयार होकर आए हैं."
17 साल के गुरपवल प्रीत तो अभी पढ़ाई कर रहे हैं. फिर भी वो अपने परिवार के साथ इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने आए हैं. उनकी खेती-बाड़ी का ख्याल तो गांव में रह गए लोग रख लेंगे. किसानों की एकजुटता और भाई-बंदी का ये जज़्बा असीमित है.
गुरपवल कहते हैं कि, "हम पढ़ाई करते हैं, फिर हमें नौकरी नहीं मिलती. मैं यहां तब तक रहूंगा, जब तक बाक़ी लोग रुकेंगे."

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'मोदी ने महिलाओं को घरों से निकलने पर मजबूर कर दिया'
हरी, पीली और बैंगनी लाइटें जला दी गई हैं. बिस्तर लगाए जा रहे हैं. अनुशासन साफ़ दिखता है. कुछ लोग पानी के उन टैंकरों से पानी भर रहे हैं, जो वो अपने साथ लेकर आए हैं. कुछ लोग बर्तन धो रहे हैं. कुछ खाना लगा रहे हैं.
यहां से कुछ किलोमीटर दूर, हरे दुपट्टों में लिपटी महिलाएं, सड़क पर एक घेरे में बैठ कर रोटियां बेल रही हैं. ये महिलाएं मोंगा से आई हैं और भारतीय किसान यूनियन की सदस्य हैं.
साठ बरस की नसीब कौर के दो बेटे और चार पोते पोतियां हैं. नसीब विधवा हैं. वो पिछले तीस साल से खेतों में काम करती आई हैं. नसीब कहती हैं कि, 'मेरा तो पूरा परिवार यहीं है. हमने अपने घरों में ताले लगा दिए और यहां प्रदर्शन करने आ गए.'

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साठ साल की सुरजीत कौर कहती हैं कि वो कोई अमीर किसान नहीं हैं. उनका काम तो जैसे-तैसे चलता है. मगर, अपने हक़ के लिए लड़ना तो उनका अधिकार है.
वो कहती हैं कि, 'मोदी ने हम महिलाओं को अपने घरों से बाहर आने को मजबूर कर दिया है.'
ऐसा मंज़र पहली बार दिख रहा है, जब धरना स्थल किसी अंतहीन युद्ध के मैदान जैसा मालूम होता हो.
सुरजीत कौर सवालिया अंदाज़ में कहती हैं, 'हम किसानों को रोकने के लिए तुमने कंटीले तार क्यों लगाए भला?'

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सिंघु बॉर्डर पर किसान मार्च कर रहे हैं
किसानों ने अपने प्रदर्शन के छठे दिन, सोनीपत, रोहतक, हापुड़, जयपुर और आगरा से दिल्ली में दाख़िल होने वाले हाइवे बंद कर दिए. अब यूपी और राजस्थान के किसान भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं.
सिंघु बॉर्डर पर किसान अपने अपने संगठनों के झंडे लेकर मार्च कर रहे हैं.
मोहाली से आए 27 साल के बलदीप सिंह कहते हैं कि मीडिया उनके आंदोलन को लेकर निष्पक्ष नहीं है.
वो कहते हैं कि, 'हम ग़रीब किसानों के बेटे हैं. हमने कॉलेज में पढ़ाई की, मगर हमें नौकरी नहीं मिली. हमें खालिस्तानी बताया जा रहा है, जो उपद्रव मचाना चाहते हैं. हमें आंसू गैस के गोलों और पानी की बौछार का निशाना बनाया जा रहा है. क्या हम कुछ कह रहे हैं? सच बताइए. हमारा किसी भी सियासी दल से कोई ताल्लुक़ नहीं. हम यहां अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए आए हैं.'

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बलदीप सिंह के पिता अमरजीत सिंह को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है. लेकिन, वो किसी भी हालात का मुक़ाबला करने को तैयार हैं.
अमरजीत कहते हैं कि, 'हम चाहते हैं कि हमारी आवाज़ दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक पहुंचे. हम पिछले कई महीनों से अपने यहां प्रदर्शन कर रहे थे, पर किसी ने हमारी सुध नहीं ली.'
बलदीप सिंह कहते हैं कि उन्हें पता है कि यहां कैसे डटे रहना है. वो बताते हैं, 'ये तिरपाल हमने 300 रुपये में लिया है. हमें सरकार ने ही इस विरोध प्रदर्शन के लिए मजबूर किया है. भला कौन अपनी ज़िंदगी के इतने दिन सड़कों पर बिताना चाहेगा?'
चालीस के सुखविंदर सिंह राजस्थान से किसानों के एक झुंड के साथ आए हैं. वो कहते हैं कि धौलपुर से और किसान धरने में शामिल होने आ रहे हैं.
सुखविंदर का कहना है कि, 'ये केवल पंजाब के किसानों का आंदोलन नहीं है. हम सब इसमें शामिल हैं. देश का हर किसान इसका हिस्सा है. पंजाब इस आंदोलन का अगुवा है. लेकिन, ये सरकार किसानों को अलग अलग सूबों और फ़िरक़ों में बांटने की फ़िराक़ में है. मगर हम बंटे नहीं. हम सब इकट्ठे हैं.'

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'हम कहां जाएं आख़िर'
कपड़ों को धूप में सुखाने के लिए लटकाया गया है. धरने के पूरे इलाक़े में लंगर चल रहे हैं. एक ट्रक पर हरियाणा के सोनीपत से आए कुछ किसान हुक्के से कश लगा रहे हैं.
हरियाणा से आए अशोक कहते हैं कि ये विरोध प्रदर्शन अब बहुत बड़ा हो गया है. अशोक का कहना है कि, 'कभी कांग्रेस के ख़िलाफ़ बीजेपी ने हमारा साथ दिया था और अब वो ख़ुद ये काला क़ानून लेकर आ गए. इससे केवल उद्योगपतियों को फ़ायदा होगा.'
अशोक के पास दो एकड़ ज़मीन है और वो कहते हैं कि ठेके पर खेती के इस नए क़ानून के कारण उसके जैसी छोटी जोत वाले किसान अपनी ज़मीनों पर ही बंधुआ मज़दूर बनकर रह जाएंगे.
अशोक के बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग राम चंद्र के पास सोनीपत में आधा एकड़ ज़मीन है. उनकी निगाह कोने में लगे पुआल के ढेर पर है. राम चंद्र पूछते हैं कि, 'हम कहां जाएं आख़िर?'
किसान सिर्फ़ खाने-पीने के इंतज़ाम के साथ नहीं आए हैं. ये लोग अपने साथ हुक्का पीने के लिए छह महीने का कच्चा माल लेकर आए हैं.

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अशोक कहते हैं कि, 'हम बॉर्डर से हिलने वाले नहीं हैं.'
बातचीत के इस छोटे से ब्रेक के बाद, किसान फिर से हुक्का पीने में मशगूल हो जाते हैं.
विरोध प्रदर्शन की इस दुनिया के एक और हिस्से में मोगा से आई 28 साल की जसप्रीत कौर भी शामिल हैं. वो यहां अपने पिता के साथ आई हैं. जसप्रीत कहती हैं कि वो इसलिए विरोध प्रदर्शन में शामिल होने आई हैं, क्योंकि इन क़ानूनों से केवल किसानों पर ही नहीं, उनके परिवार पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा.
जसप्रीत को पिछले पांच दिनों से नहाने का मौक़ा नहीं मिला है. वो कहती हैं कि, 'प्रदर्शन में शामिल महिलाओं को सबसे ज़्यादा मुश्किल हो रही है. मगर ये तो छोटी मोटी परेशानियां हैं. हम स्थानीय लोगों के टॉयलेट इस्तेमाल कर लेते हैं. उन्होंने अपने घरों के दरवाज़े हमारे लिए खोल दिए हैं. अहम बात तो ये है कि ये क़ानून वापस लिए जाने की ज़रूरत है.'

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ये पहली बार है, जब जसप्रीत इतने लंबे समय के लिए सड़क पर उतरी हैं. वो NET की तैयारी कर रही हैं. यहां आंसू गैस से भी उनका पहली बार सामना हुआ है. जसप्रीत कहती हैं कि, 'आंसू गैस से आंख जलने लगती है. हमने इसका मुक़ाबला करने के लिए अपने चेहरों पर गीले कपड़े लपेट लिए थे.'
और अब बाक़ी प्रदर्शनकारियों की तरह जसप्रीत को भी विरोध प्रदर्शनों का अच्छा तजुर्बा हो गया है. वो कहती हैं कि, 'आप देखिए, हम किस मिट्टी के बने हैं. हमने दिल्ली जाने का प्रमुख रास्ता बंद कर दिया है. हम क्यों निरंकारी मैदान जाएं?'
ट्रक के किनारे पर लाल झंडा लहरा रहा है.

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जसप्रीत के लिए ये उनके अपने करियर का भी सवाल है, वो सवाल उठाती हैं, 'आख़िर नौकरियां कहां हैं?' और कहती हैं कि, 'किसानों को एकजुट होना चाहिए.'
रोमाना मनप्रीत का कहना है कि पंजाब में लोगों के बीच ट्रैक्टर ट्रॉली पर सवार होकर तीरथ करने जाने की परंपरा है. वो रास्ते में खाते-पकाते चलते हैं. ये लंगर जिसमें हर कोई शामिल होता है, वो औरतों और मर्दों सबको सबक़ देता है कि सफ़र के दौरान कैसे ज़िंदगी बसर करें.
मनप्रीत का कहना है कि, 'यहां हम उन सब तजुर्बों को काम में ला रहे हैं. ये ऐसा विरोध प्रदर्शन है, जो बेहद कठिन मगर पूरी तरह अनुशासित है.'
जब मनप्रीत ये कह रहे थे, ठीक उसी वक़्त हरित क्रांति का प्रतीक हरा झंडा लिए हुए कुछ महिलाएं वहां से गुज़रीं. उनमें कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं भी थीं. इन्हीं में से संगरूर से आई साठ साल की गुरमेल कौर और 65 बरस की अमरजीत कौर भी हैं.

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गुरमेल कौर कहती हैं कि, 'हम ग़रीब किसान हैं और महिलाएं भी हैं. और महिलाएं किसी से डरती नहीं हैं. हमें ऐसी कठिनाइयों से निपटने की आदत है.'
ये महिलाएं पहली बार इतने लंबे समय के लिए सड़कों पर उतरी हैं. ये वही महिलाएं हैं, जो खेतों में अपने पतियों की मदद करती रही हैं. अपने पतियों के गुज़र जाने के बाद, इन महिलाओं ने किसानी की कमान अपने हाथों में ले ली.
महिंदर कौर कहती हैं कि, 'महिलाओं को अपने हक़ के लिए खड़े होना पड़ेगा. हमारे पास बहुत कम ज़मीनें हैं. हमें उनकी हिफ़ाज़त करनी ही होगी.'
इस छोटी सी जगह पर उन्हें पता है कि निजी ज़िम्मेदारियों का ख्याल यहां नहीं लागू हो सकता है. उन्हें ये भी पता है कि वो नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ एक लड़ाई लड़ रही हैं और इसके लिए मिल-जुलकर झंडा बुलंद करने की बड़ी अहमियत है. क्योंकि, लड़ाई जारी रखने के लिए एकजुट होना ही इकलौता विकल्प है. लंगर इसी एकजुटता की एक मिसाल है.

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जैसा कि बुराड़ी में डटे 65 वर्ष के बुज़ुर्ग किसान हकम सिंह कहते हैं कि वो कभी भी भेदभाव नहीं करेंगे. उनकी सामुदायिक रसोई में सबका स्वागत है.
हकम सिंह कहते हैं कि, 'हमारे गुरुओं ने हमें यही तो सिखाया है. सबकी सेवा करना. पुलिसवाले हमें भले ही मारते हैं. लेकिन, हम उन्हें भी खाना देते हैं. इंसाफ़ करना ऊपरवाले के हाथ में है, हमारे हाथ में नहीं.'
और मज़बूत इरादों, लंगर और एकजुटता की ताक़त वाले इसी जज़्बे के साथ किसान अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं.
कंटीले तारों वाली ये सरहद जो किसानों और हुकूमत का दरम्यानी इलाक़ा है, उसके उस पार तमाम लोगों की अलग दुनिया है. उम्मीदों और मुक़ाबला करने की ताक़त का कारवां है. निशानियां हैं, परंपराएं हैं और महिलाएं, मर्द और बच्चे हैं. जिन्हें पता है कि लाठियों, आंसू गैस के गोलों और सर्द मौसम में ठंडे पानी की बौछारों के बावजूद, वो यहां शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए आए हैं.
यही इस आंदोलन की काया-माया है. इस रंग हरा, लाल और पीला है.
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