जीडीपी माइनस 7.5 फ़ीसदी - ये अच्छी ख़बर या बुरी?

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- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, पूर्व संपादक, सीएनबीसी-आवाज़
इतिहास में पहली बार भारत में आर्थिक मंदी आ गई है. जुलाई से सितंबर के बीच भारत की अर्थव्यवस्था साढ़े सात फीसदी घटी है.
इससे पहले की तिमाही में यह गिरावट 24.9 फीसदी थी. उसके मुक़ाबले आज हालत अच्छी है, चिंताजनक है या फिर चिंताजनक होते हुए भी उम्मीद से भरी है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर है कि आप इसे किस नज़रिए से देखना चाहते हैं.
24.9 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट के बाद यह गिरावट थमकर साढ़े सात फीसदी ही रह गई ये - तो इस नज़रिए से ये अच्छी ख़बर हुई न!
सरकार की तरफ से इस दलील को रखने वाले यही समझा रहे हैं. उनका कहना है कि कोरोना के भयानक झटके के बाद अब जो आंकड़ा आया है वो आशंका से कम है और इस बात का संकेत है कि आगे हालात बेहतर होंगे.
यहां यह याद रखना चाहिए कि कुछ ही दिन पहले रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने आर्थिक भविष्यवाणी की नई व्यवस्था नाउकास्टिंग यानी वर्तमानवाणी शुरू की है. उसने इस तिमाही में जीडीपी में 8.6 फीसदी गिरावट होने की आशंका जताई थी.
उससे कुछ ही पहले मॉनिटरी पॉलिसी के वक़्त रिजर्व बैंक को यह गिरावट 9.8 फीसदी रहने की आशंका थी.

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क्या ये सुधार का संकेत है?
क़रीब-क़रीब उसी वक्त अर्थशास्त्रियों के एक सर्वे में यह आंकड़ा साढ़े दस परसेंट तक रहने का अनुमान था. उस लिहाज़ से देखेंगे तो ख़बर राहत की है.
और आर्थिक मोर्चे पर भारत सरकार के लिए सबसे असुविधाजनक आंकड़े और तथ्य सामने रखने के लिए मशहूर सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने भी जीडीपी का तिमाही आंकड़ा सामने आने के कुछ ही घंटे पहले कुछ ऐसा कहा जो सरकार को काफी अच्छा लगा होगा.
सीएमआईई ने कहा कि देश तकनीकी तौर पर मंदी में चला गया है इसके बावजूद पहली तिमाही में अब तक की सबसे तेज़ गिरावट के मुकाबले इस तिमाही का आंकड़ा खासे सुधार का संकेत तो है.
उनका कहना है कि इसके लिए मुख्यरूप से औद्योगिक क्षेत्र ज़िम्मेदार है जो पिछली तिमाही में 35.7 फीसदी तक गिरने के बाद इस तिमाही इस गिरावट को 3.4 फीसदी पर ही बांधने में कामयाब रहा.

मुसीबत ख़त्म होने की बात मानना जल्दबाज़ी
लेकिन इससे यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि मुसीबत ख़त्म हो गई है या जल्दी ही मुसीबत ख़त्म होने के आसार हैं.
यहां तक कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यन का भी कहना है कि बेहतरी की उम्मीद के साथ सजग रहना ज़रूरी है. मतलब साफ है कि सावधानी का दामन छोड़ना ख़तरनाक हो सकता है.
हालांकि रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास एक दिन पहले ही उम्मीद जता चुके थे कि हालात बेहतर हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि कोरोना के भयानक झटके के बाद जिस रफ्तार से सुधार की उम्मीद थी भारतीय अर्थव्यवस्था उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से पटरी पर लौट रही है.
लेकिन अगर थोड़ा बारीक़ी से देखें तो हालात दरअसल इतने अच्छे भी नहीं हैं. अच्छे तो कोई कह भी नहीं सकता क्योंकि जीडीपी में साढ़े सात परसेंट की गिरावट भी कम नहीं होती.
लेकिन ख़ास बात यह है कि साढ़े सात परसेंट की यह गिरावट पिछली तिमाही यानी उस तिमाही के मुक़ाबले नहीं है जिस तिमाही में देश की जीडीपी ने 24.9 परसेंट का गोता लगाया था. बल्कि यह गिरावट पिछले साल की इसी तिमाही या जुलाई से सितंबर के बीच के समय की तुलना में है.

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समस्या यह है कि उस तिमाही में भी भारत की जीडीपी उससे पिछले साल की इसी तिमाही के मुक़ाबले सिर्फ 4.4 परसेंट ही बढ़ी थी.
याद करें यह वो वक़्त था जब भारत भर में यह बहस छिड़ चुकी थी कि देश में मंदी है या स्लोडाउन. स्लोडाउन का तर्जुमा कुछ अर्थ कम राजनीति ज़्यादा पढ़ानेवाले जानकारों ने किया -धीमापन.
हिंदी में मंदी और धीमेपन का फर्क समझना भी मुश्किल है. लेकिन अर्थशास्त्र में मंदी की एक परिभाषा है. जब तक लगातार दो तिमाही कोई अर्थव्यवस्था निगेटिव ग्रोथ न दिखाए, यानी बढ़ने के बजाय सिकुड़ती न दिखे, तब तक उसे मंदी नहीं कहते हैं.
जब रिजर्व बैंक ने अपने नाउकास्ट में 8.6 फीसदी की गिरावट की आशंका जताई तब साथ में उसने यह भी कहा कि भारत में 'टेक्निकल रिसेशन' यानी तकनीकी मंदी आ सकती है.

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नकारने की कोशिश
इस बार जीडीपी आंकड़ा आने के साथ ही टेक्निकल शब्द पर ज़ोर बढ़ गया दिखता है. मानो मंदी है नहीं, बस तकनीकी तौर पर साबित हो गई है.
इसके पीछे एक ओर तो यह भाव है कि जल्दी ही मंदी पर पार पा लिया जाएगा. लेकिन दूसरी तरफ इस बात को नकारने की कोशिश भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक गंभीर संकट से गुज़र रही है जिससे निपटने के लिए 'भागीरथ प्रयत्न' की ज़रूरत है.
यह गंभीर संकट समझने के लिए ही ज़रूरी है कि पिछले साल की उस परिस्थिति को समझा जाए जब कोरोना का ख़तरा सामने न होने के बावजूद देश में मंदी की आशंका ज़ाहिर करनेवाले स्वर बढ़ रहे थे और लगातार ऐसे आंकड़े आ रहे थे जो अर्थव्यवस्था में कमज़ोरी के संकेत दे रहे थे.
और जीडीपी बढ़ने की रफ्तार क़रीब दो साल से गिर रही थी. साफ़ है कि जीडीपी का आंकड़ा एक कमज़ोर स्थिति के मुक़ाबले की तस्वीर दिखा रहा है. यानी चिंता जितनी दिख रही है उससे कहीं बड़ी है.
दूसरी चिंता की बात प्राइवेट कंज़ंप्शन यानी सरकार के अलावा दूसरे लोगों या व्यापारों में होनेवाली खपत में गिरावट है.
हालांकि पिछले दिनों बड़ी-बड़ी सेल में भारी बिक्री और नवरात्रि पर जमकर गाड़ियां बिकने की ख़बरों ने काफ़ी उत्साह जगाया लेकिन खपत में ग्यारह परसेंट से ज़्यादा की गिरावट एक चिंताजनक संकेत है.
ऐसा ही एक और ख़तरनाक संकेत है कि निजी कंपनियों का मुनाफ़ा तो दो साल पहले के स्तर पर वापस पहुंच गया है, लेकिन उनकी कमाई और उनका खर्च उसके मुक़ाबले दस से पंद्रह परसेंट नीचे दिख रहे हैं. ज़ाहिर है यह मुनाफ़ा, कमाई का नहीं खर्च में भारी कटौती का नतीजा है.
यह आंकड़े राहत का संकेत ज़रूर हैं, लेकिन अगर अर्थव्यवस्था को तेज़ी से वापस पटरी पर लाना है तो सरकार को अब अपनी तरफ से कुछ और बड़े कदम उठाने होंगे.
ऐसे कदम जिनसे लोग खर्च करने निकलें, बाज़ार में मांग बढ़े, कंपनियां ज़्यादा माल बनाएं और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को काम मिले और आगे कमाई बढ़ने की उम्मीद भी बढ़े. ऐसा होने पर ही वो हाथ खोलकर खर्च करेंगे और आर्थिक तरक्की का चक्का तेज़ी से घूमेगा.
(लेखक यूट्यूब पर अपना चैनल चलाते हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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