तरुण गोगोई: असम के शालीन और क़द्दावर नेता नहीं रहे

तरुण गोगोई

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    • Author, सुबीर भौमिक
    • पदनाम, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय राजनेताओं में शायद कोई विरला ही हो जो यह पसंद करता हो कि उसके बारे में बातें बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बल्कि कम करके कही जाएं.

बहुत ही कम बोलने वाले 'सलीक़ेदार लेकिन चतुर' असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का 86 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा और बेटी हैं.

1994 की एक शाम मैं उनके दिल्ली के सरकारी आवास में डिनर पर आमंत्रित था.

तब गोगोई पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में फूड प्रोसेसिंग मिनिस्टर थे और यूरोप के कुछ देशों की आधिकारिक यात्रा से लौटे थे. उन्होंने मुझसे अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कुराते हुए पूछा, "और बताइए इन दिनों असम कांग्रेस में क्या बातें चल रही हैं."

मैंने उनकी ओर से बढ़ाई गई असम की कड़क चाय की चुस्की लेते हुए जवाब दिया, "सर, कई लोग कह रहे हैं कि आप मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं और इसके लिए हाई कमान के साथ लॉबी करने में जुटे हुए हैं."

मेरा जवाब सुनकर गोगोई ज़ोर से हंसे और कहा कि 'हितेश्वर सैकिया असम जैसे मुश्किल राज्य को संभालने के लिए सही व्यक्ति हैं.' उस वक़्त हितेश्वर सैकिया असम के मुख्यमंत्री थे.

उन्होंने आगे सभी अफ़वाहों को ख़ारिज करते हुए कहा, "आपको पता है कि असम कितना जटिल राज्य है. इसे संभालने के लिए हितेश्वर सैकिया जैसे चतुर मुख्यमंत्री की ज़रूरत है."

उन्होंने कहा, "मोई याते भाल आसु (मैं यही ठीक हूँ)." वो केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपने मंत्री पद की बात कर रहे थे.

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सात साल बाद जब उन्होंने 2001 में असम के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की, तब मैंने उन्हें उस शाम की बात याद दिलाई जब उन्होंने मुख्यमंत्री बनने को लेकर अपनी अनिच्छा जताई थी.

तब उन्होंने फ़ौरन जवाब दिया था, "मैं क्या कर सकता था, पार्टी मुझे मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी. पार्टी सोचती है कि मैं हितेश्वर सैकिया की जगह फ़िट हो सकता हूँ."

और फिर उन्होंने अपनी करिश्माई मुस्कान के साथ वादों को निभाने की बात कही. उसके बाद के 15 सालों तक असम जैसे संघर्ष वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने इसे निभाया भी.

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असम प्रदेश कांग्रेस की महासचिव बोबिता सर्मा कहती हैं, "गोगोई एक सर्वमान्य नेता थे. वो अपने साथियों के बीच ऊंचे क़द के शख़्सियत के तौर पर जाने जाते थे. उनकी शख़्सियत अलग ही थी."

राजनीतिक सफ़र

छह बार लोकसभा के सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे तरुण गोगोई वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद कांग्रेस में धीरे-धीरे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते गए. इंदिरा गांधी के ज़माने में वे पहली बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में संयुक्त सचिव बने और उसके बाद राजीव गांधी के समय में महासचिव नियुक्त हुए.

उनके कैबिनेट सहयोगी रहे भूमिधर बर्मन कहते हैं, "लेकिन वे कभी जल्दबाज़ी में नहीं दिखाई पड़े."

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गोगोई हर तरह से लोकतांत्रिक शख़्स थे. वे वरिष्ठ होने के बाद भी आलोचनाओं को सही नज़रिए से लेते थे. इसमें असम में बड़े पैमाने के निवेश हासिल नहीं कर पाने के चलते उनकी सरकार की होने वाली आलोचना भी शामिल है.

असम के पूर्व सूचना निदेशक जेपी सैकिया ने कहते हैं, "आप उनकी सरकार के ख़िलाफ़ भी ख़बर लिख सकते थे, भले ही स्टोरी में काफ़ी आलोचना क्यों ना हो लेकिन अगली प्रेस कांफ्रेंस में भी वे आपकी तरफ़ मुस्कुराते हुए दिखाई देंगे और आजकल के राजनेताओं की तरह आक्रामकता से पेश नहीं आते थे."

कई पत्रकार, जिनमें मैं भी शामिल हूं, इस बात से सहमत हैं.

तरुण गोगोई का ध्यान असम के चरमपंथ की समस्याओं को हल करने पर था जिनमें उल्फा (ULFA) सशस्त्र आंदोलन, बोडो अलगाववादी आंदोलन और दिमासा और कार्बी समुदाय का सशस्त्र विद्रोह शामिल था. जब उल्फा चरमपंथियों में 2010 में बिखराव हुआ तब वे आंशिक तौर पर कामयाब रहे थे क्योंकि इससे कई चरमपंथी नेता केंद्र के साथ बातचीत करने के लिए वापस लौट आए थे. उस समय उल्फ़ा के ज़्यादातर बड़े नेता बांग्लादेश में रहते थे.

लेकिन अगर वे कांग्रेस की सत्ता को असम में क़ायम नहीं रख पाए को इसकी वजह एक अल्पसंख्यकों की एक नई पार्टी के उभार को आंकने में उनसे हुई चूक थी. इत्र के कारोबारी बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआईएयूडीएफ़ ने कांग्रेस समर्थक अल्पसंख्यकों के वोट में लगातार सेंध लगाई लेकिन केंद्र सरकार के नेताओं के कहने के बाद भी गोगोई ने अजमल के साथ समझौता नहीं किया. उन्होंने एक बार पूछा था, कौन अजमल? और यह काफ़ी चर्चित भी हुआ था.

कई लोगों का मानना है कि गोगोई असम के मूल निवासियों में कांग्रेस के समर्थन को बरक़रार रखना चाहते थे, जिसे 1979 से 1985 तक छह साल लंबे संघर्ष के दौरान कांग्रेस ने खो दिया था. 2016 तक राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी रही, यह इस बात का सबूत है कि असम के लोगों के बीच कांग्रेस और गोगोई दोनों लोकप्रिय थी, लेकिन फिर 2016 के चुनाव में बीजेपी ने राज्य में शानदार जीत हासिल की.

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