बिहार विधानसभा चुनाव: तेजस्वी, नीतीश, बीजेपी और कांग्रेस के लिए आज फ़ैसले का दिन

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव

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बिहार भारत का पहला राज्य है जहां कोरोना महामारी के दौर में विधानसभा चुनाव करवाए जा रहे हैं.

यहां नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले पंद्रह साल के शासन को चुनौती देने के लिए विपक्षी महागठबंधन चुनाव मैदान में है. इतना ही नहीं कुछ और नए गठबंधन भी इस बार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान सात सितंबर से शुरू हुआ था और क़रीब दो महीने बाद पाँच नवंबर तक चला.

बिहार में इस बार तीन चरणों में मतदान कराए गए हैं. पहले चरण में 28 अक्तूबर को 71 सीटों के लिए मतदान हुआ, दूसरे चरण में तीन नवंबर को 94 सीटों के लिए और तीसरे चरण में सात नवंबर को 78 सीटों के लिए मतदान हुआ.

चुनाव आयोग के अनुसार पहले चरण में 55.68 फीसदी और दूसरी चरण में 55.70 फीसदी मतदान हुआ है, वहीं तीसरे चरण में शाम के पांच बजे तक 54.06 फीसदी मतदान हुआ है.

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, मोदी और राहुल गांधी

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2015 का चुनाव और नीतीश की भाजपा में री-एंट्री

बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए मैजिक नंबर 122 है. मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर को समाप्त हो रहा है.

यहां फ़िलहाल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार है. जदयू नेता नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री हैं जबकि बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी उप-मुख्यमंत्री हैं.

बिहार की राजनीति के दो बड़े नाम - लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए कांग्रेस विरोधी आंदोलन में शामिल रहे थे और कॉलेज के दिनों के दोस्त थे.

2015 में हुए विधानसभा चुनावों में लालू यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और नीतीश के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड ने मिल कर चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया. इसमें कांग्रेस समेत दूसरी भी शामिल हुई और महागठबंधन बनाया गया.

चुनाव में महागठबंधन को जीत मिली, राजद को 80, जदयू को 71, कांग्रेस को 27 सीटें मिली. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उप-मुख्यमंत्री

बीजेपी को केवल 53 सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन 2017 में नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन तोड़ लिया और बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बना ली. इस तरह सुशील कुमार मोदी उप-मुख्यमंत्री बने. उसके बाद सोशल मीडिया पर लालू ने कई बार नीतीश कुमार को लेकर तंज कसा था.

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2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव

नीतीश कुमार बीते 15 सालों से लगातार बिहार से मुख्यमंत्री हैं. 2017 में फिर से बीजेपी का दामन थामने से पहले वो दो बार बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बना चुके हैं.

2005 में बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए. पहली बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया और सरकार नहीं बन पाई.

इसके बाद हुए चुनावों में जदयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. जदयू के नीतीश कुमार ने 55 सीटें जीतने वाली भाजपा से मिल कर सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने.

इसके बाद 2010 को हुए विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. पार्टी को 115 सीटें मिली जबकि बीजेपी को 91 सीटें मिलीं. राजद केवल 22 सीटों पर सिमट गई. नीतीश ने एक बार फिर बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और सरकार बनाई.

2020 चुनाव में एनडीए बनाम महागठबंधन

माना जा रहा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में दो बड़े गठबंधन आमने-सामने हैं- पहला एनडीए जिसमें भाजपा और जदयू हैं. इसके साथ मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) भी एनडीए में शामिल हैं.

केंद्र सरकार ने राम विलास पसवान और उनके बेटे चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी एनडीए का हिस्सा हैं, लेकिन इस बार लोजपा ने अकेले दम पर बिहार चुनाव में उतरने का फ़ैसला किया है. पार्टी 134 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

हालांकि दिलचस्प बात ये है जहां चिराग पासवान ने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार नीतीश सरकार पर निशाना साधा वहीं वो पीएम मोदी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर से नहीं चूक रहे.

ऐसे में अटकलों का बाज़ार गर्म है कि अगर बीजेपी को सरकार बनाने के लिए सीटों की ज़रूरत पड़ी तो चिराग उनका साथ देंगे.

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सीटों के बंटवारे को देखें तो जदयू 122 सीटों पर और बीजेपी 121 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. जदयू ने अपने खाते से 7 सीटें हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा को और बीजेपी ने विकासशील इंसान पार्टी को अपने हिस्से से 11 सीटें दी हैं.

वहीं एनडीके ख़िलाफ़ मैदान में महागठबंधन है जिसमें राजद, कांग्रेस समेत वामपंथी दल शामिल हैं.

राजद नेता लालू यादव इन दिनों चारा घोटाले के मामलों में झारखंड के राँची में जेल में हैं. ऐसे में उनके बेटे तेजस्वी यादव ने पूरा चुनाव प्रचार अभियान ख़ुद ही संभाला है. उन्होंने रणनीतिक तौर पर राष्ट्रीय जनता दल के पोस्टरों से लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की तस्वीरों की जगह नहीं दी और केवल ख़ुद को रखा.

महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव ही सबसे बड़ा चेहरा साबित हुए हैं. उन्होंने अकेले 251 से भी ज़्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया.

राजद 144 सीटों पर, कांग्रेस 70 सीटों पर और वामदल 29 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.

मैदान में और भी हैं गठबंधन

इन दो गठबंधन के अलावा यहां तीन और गठबंधन चुनाव में उतर रहे हैं - ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट, प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन और युनाइटेड डेमोक्रेटिक अलायंस भी मैदान में हैं, जो चुनाव से ठीक पहले बने हैं.

ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट में उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा), देवेंद्र प्रसाद यादव की समाजवादी जनता दल डेमोक्रेटिक पार्टी ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, डॉक्टर संजय चौहान की जनवादी पार्टी समेत बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख हैं.

रालोसपा कुल 104 सीटों पर, बसपा 80, समाजवादी जनता दल 25 और एआईएमआईएम 20 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.

प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी, चंद्रशेखर आज़ाद की अज़ाद समाज पार्टी, सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी और बहुजन मुक्ति पार्टी शामिल हैं.

वहीं युनाइटेड डेमोक्रेटिक अलायंस का नेतृत्व पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा कर रहे हैं. इस गठबंधन में करीब 20 पार्टियां शामिल हैं.

वीडियो कैप्शन, बिहार चुनाव के एग्जिट पोल में बीजेपी क्यों पिछड़ गई?

एआईएमआईएम कितनी बड़ी प्रतिद्वंदी

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव पहली बार असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने छह सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन वो खाता खोल नहीं पाई. 2019 के लोकसभा चुनाव में किशनगंज में ओवैसी की पार्टी ने पूरा ज़ोर लगाया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

इस बार ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के साथ पार्टी ने 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फ़ैसला किया है. जिन सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं उनमें से अधिकतर सीमांचल के इलाक़े - किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार से हैं.

सीमांचल इलाक़े में बड़ी संख्या में मुसलमान है और ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी वहां मुसलमान वोटरों में दुविधा पैदा कर सकती है.

बिहार में मुसलमानों का वोट लालू की पार्टी के साथ रहा है, लेकिन इस बार एक तरफ मैदान में लालू नहीं हैं तो दूसरी तरफ एआईएमआईएम का विकल्प है. ऐसे में माना जा रहा है कि इस कुछ चुनावक्षेत्रों में टक्कर महागठबंधन और एआईएमआईएम के बीच रहेगा.

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क्या कह रहे हैं एग्ज़िट पोल?

परिणामों से पहले कई न्यूज़ चैनल और रिसर्च एजेंसियां अपने-अपने एग्ज़िट पोल लेकर आईं हैं.

ज़्यादातर एग्ज़िट पोल किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत देते नज़र नहीं आ रहे हैं. एग्ज़िट पोल के आंकड़े कड़े संघर्ष की ओर इशारा कर रहे हैं. बीबीसी किसी तरह का एग्ज़िट पोल नहीं करता है.

देखते हैं अलग-अलग चैनलों के एग्ज़िट पोल से जुड़े आंकड़े क्या कहते हैं. (चुनावी नतीजे इन आंकड़ों से अलग हो सकते हैं.)

  • एबीपी न्यूज़-सी वोटर - एनडीए को 104-128 सीटें, महागठबंधन को 108-131 सीटें और लोजपा 1-3 सीटें मिल सकती हैं.
  • टाइम्स नाउ-सी वोटर - एनडीए को 116 सीटें, महागठबंधन को 120 सीटें और लोजपा को 1 सीट मिल सकती है.
  • रिपब्लिक-जन की बात - एनडीए को 91-117, महागठबंधन को 118-138 और लोजपा को 5-8 सीटें मिलने का अनुमान है.
  • टीवी-9 भारतवर्ष - एनडीए को 110-120, महागठबंधन को 115-125 और लोजपा को 3-5 सीटें मिल सकती हैं.
  • आजतक-एक्सिस माई इंडिया - एनडीए के खाते में 69-91 सीटें और महागठबंधन को 139-161 सीटें मिल सकती हैं.
  • टूडेज़ चाणक्य - महागठबंधन को 180 सीटें और जेडीयू को 55 सीटें मिलने का अनुमान है. पोल में 11 सीटों का मार्जिन रखा गया है यानी कि दोनों की 11 सीटें कम ज़्यादा हो सकती हैं.

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