सुजीत की बोरवेल में गिर कर मौत हो गई थी, एक साल बाद क्या है माता-पिता का हाल

सुजीत विल्सन
इमेज कैप्शन, सुजीत विल्सन, sujit wilson, borewell death in india
    • Author, एम हरिहरन
    • पदनाम, बीबीसी तमिल

दो साल के सुजीत विल्सन की एक साल पहले 29 अक्टूबर को अपने घर के पास बने बोरवेल मे गिरकर मौत हो गई थी. वह 25 अक्टूबर, 2019 को एक गहरे बोरवेल में गिर गए थे.

तमिलनाडु में नाडुकाटुपत्ती गांव के लोगों के लिए यह घटना एक कभी न भरने वाले घाव की तरह है. उन्हें उस दुर्घटना की और सुजीत को बचाने के लिए की गई कोशिशों की एक-एक बात याद है.

बोरवेल में फंसा सुजीत

नाडुकाटुपत्ती गांव त्रिची ज़िले में मनापरई के नज़दीक स्थित है. यहां रहने वाले ब्रितो आरोक्याराज और कलईराणी के दो बेटे थे, पुनीत और सुजीत विल्सन.

ब्रितो पेशे से मिस्त्री हैं. उनके पास घर के नज़दीक खेती की थोड़ी ज़मीन भी है. इस ज़मीन में कई साल पहले उनके पूर्वजों ने एक बोरवेल की खुदाई की थी.

इस बोरवेल में पानी नहीं था इसलिए इसे मिट्टी और रेत से अस्थाई तौर पर ढका गया था. ब्रितो बोरवेल के आसपास मक्के की खेती करते थे. ये बोरवेल एक सपाट ज़मीन की तरह दिखता था.

लेकिन, इलाक़े में कुछ दिनों तक लगातार बारिश होने के कारण बोरवेल पर ढकी मिट्टी उसके अंदर चली गई.

ब्रितो आरोक्याराज और कलईराणी अपने बच्चों के साथ
इमेज कैप्शन, ब्रितो आरोक्याराज और कलईराणी अपने बच्चों के साथ

25 अक्टूबर, 2019 की शाम करीब 5:30 बजे ब्रितो का छोटा बेटा सुजीत खेलता हुआ उस बोरवेल में गिर गया और नीचे फंस गया.

सुजीत को बचाने के लिए राज्य सरकार ने बचाव अभियान चलाया. उपमुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम और स्वास्थ्य मंत्री विजय भास्कर नाडुकाटुपत्ती गांव में ही रुके और बचाव अभियान की निगरानी की.

82 घंटे तक चले बचाव अभियान के बाद अधिकारियों ने बताया कि सुजीत की बोरवेल में ही मौत हो गई है. सुजीत के शव को 29 अक्टूबर की सुबह बोरवेल से बाहर निकाला गया. इसके बाद सुजीत का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. उसे नाडुकाटुपत्ती गांव में फातिमा पुदूर कब्रिस्तान में दफ़नाया गया था.

सुजीत विल्सन का घर
इमेज कैप्शन, सुजीत विल्सन का घर

नहीं मनाई दिवाली

नाडुकाटुपत्ती गांव के लोग कहते हैं कि दुर्घटना के एक साल बाद भी उसकी बुरी यादें उनके ज़हन में हैं. पिछले साल दिवाली के दौरान ही यहां बचाव अभियान चल रहा था.

इस घटना के एक साल बाद बीबीसी तमिल ने नाडुकाटुपत्ती गांव में रहने वालीं राजलक्ष्मी से पूछा की उस दिन क्या हुआ था.

राजलक्ष्मी बताती हैं, ''हम सभी दिवाली की तैयारियों में लगे हुए थे. लेकिन, दिवाली से ठीक दो दिन पहले शाम क़रीब 7 बजे मुझे पता चला कि सुजीत बोरवेल में गिर गया है. मैं वहां पहुंची तो अग्निशमन वाले उस बचाने की कोशिश कर रहे थे. सरकारी अधिकारी भीड़ को दूर कर रहे थे.''

राजलक्ष्मी कहती हैं, "गांव वाले कह रहे थे की सुजीत 20 फ़ीट गहराई में फंस गया है, बाहर निकल जाएगा. बाद में पता चला कि वो 40 फ़ीट गहराई में है. मैं कभी नहीं भूल सकती कि सुजीत की मां बोरवेल के पास खड़ी होकर कितना रोई और चिल्लाई थी. तीन दिनों तक बड़ी-बड़ी मशीनों से काम चलता रहा. गांव वाले ख़बर देखते और इंतज़ार करते. हमें 24 घंटे बाद लगने लगा था कि शायद बच्चा नहीं बच पाएगा. हालांकि, फिर भी कहीं उम्मीद बाकी थी."

वह रोते हुए कहती हैं, "लेकिन, आख़िर में सुजीत का शव बाहर आया. पूरा गांव उसकी बेवक़्त मौत पर रोया था. हम दिवाली भूल गए थे. छोटे बच्चों तक ने पटाखे नहीं फोड़े थे."

सुजीत विल्सन को बोरवेल से निकालने के लिए बचाव कार्य
इमेज कैप्शन, सुजीत विल्सन को बोरवेल से निकालने के लिए बचाव कार्य

"गांव वाले बचा सकते थे"

गोपाल सुजीत के घर के पास किराने की दुकान चलाते हैं. सुजीत के गिरने के कुछ मिनट बाद ही वो बोरवेल के पास पहुंच गए थे.

सुजीत बताते हैं, "उसके गिरने के तुरंत बाद मैं बोरवेल के पास पहुंच गया था. वहां क़रीब 20 लोग थे. सुजीत की मां चिल्ला रही थीं. मैंने बोरवेल के नज़दीक जाकर देखा तो सुजीत रो-रोकर मां को बुला रहा था. हम उसकी आवाज़ सुन सकते थे. हमने फैसला किया कि उसे बचाते हैं. लेकिन, कुछ ही मिनट में अधिकारी और अग्निशमन वाले आ गए. तब सुजीत 10 से 20 फ़ीट की गहराई पर था."

"हमने अधिकारियों को बोला कि हम किसी तरह से उसे निकाल लेंगे लेकिन, अधिकारियों ने हमें रोक दिया. उसके कुछ देर बाद हमें सुजीत की आवाज़ आनी बंद हो गई. वो और गहराई में चला गया."

गोपाल बताते हैं कि, "हमें कहा गया कि किसी और जगह से बचाव दल आ रहा है. अब भीड़ जमा होने लगी थी. अधिकारी और मंत्री आ रहे थे. उन्होंने इलाक़े को सील कर दिया और भीड़ को हटा दिया. उसके बाद हम कुछ नहीं कर सकते थे. वहां पर बड़ी-बड़ी मशीनें, सैकड़ों कारें, लाइट और मीडिया का जमावड़ा था. नाडुकाटुपत्ती में कभी इस तरह का हंगामा नहीं हुआ था. लेकिन, सुजीत को कोई नहीं बचा पाया. मुझे आज भी उसे ना बचा पाने का अफसोस होता है."

क्या सुजीत को कभी भूला जा सकेगा

रिश्तेदार कहते हैं कि वो जब भी ब्रितो के घर से गुजरते हैं तो उन्हें सुजीत की याद आ जाती है.

रानी कहती हैं, "मैं सुजीत की दादी हूं. मैं अक्सर उनके घर जाया करती थी. वो मुझसे हमेशा पूछता कि उसके लिए क्या लाई हूं. मैं उसके साथ खेलती और बातें करती थी. अगर मैं किसी वजह से उनके घर ना जा पाऊं तो घर से गुजरने पर सुजीत दौड़कर मेरे पास आ जाता था. वो बहुत प्यारा और शांत बच्चा था."

"जब वो बोरवेल में गिरा तो मैं गांव में नहीं थी. मैं तुरंत वापस आ गई. लेकिन, मैं आख़िरी बार भी उसका चेहरा नहीं देख पाई. जब भी मैं उनके घर के पास जाती हूं तो मुझे उसकी याद आती है."

सुजीत विल्सन का घर
इमेज कैप्शन, सुजीत विल्सन का घर

'हर दिन उसके बारे में सोचते हैं'

ब्रितो और कलईराणी का घर सुजीत की तस्वीरों से भरा हुआ है. उस बोरवेल को सीमेंट से ढक दिया गया है. माता-पिता एक साल के बाद भी सामान्य ज़िंदगी में नहीं लौट पाए हैं.

ब्रितो कहते हैं, "मैंने ज़िंदगी में बहुत-सी परेशानियां झेली हैं. लेकिन, पिछले एक साल में मैं और मेरी पत्नी जिस तकलीफ़ से गुज़रे हैं, उसकी तुलना नहीं हो सकती. हर दिन हम उसके बारे में सोचते हैं. लेकिन, सोशल मीडिया पर हमारी आलोचना की गई. मेरी पत्नी कहती है कि ऐसी बातें पढ़कर उसे मर जाने का मन करता है. मुझे नहीं पता कि ये सब बातें क्यों फैलाई गईं."

"कोई कुछ भी कहे लेकिन हमें अपना बेटा वापस नहीं मिल सकता. मैं सिर्फ़ यही चाहता हूं कि सुजीत वो आख़िरी बच्चा हो जो बोरवेल में गिरा हो. ऐसी घटनाएं दुबारा नहीं होनी चाहिए. सरकार को इसे लेकर कदम उठाने चाहिए."

2019 की दुर्घटना के बाद ज़िला प्रशासन पर इस्तेमाल न होने वाले सभी गहरे बोरवेल को बंद करने का ज़ोर दिया गया था. हालांकि, तमिलनाडु में उस घटना के बाद इस तरह की दुखद मौत नहीं हुई.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)