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अमरीका चुनाव 2020: अगले अमरीकी राष्ट्रपति से क्या चाहेगा भारत
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस साल 29 अगस्त को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक समारोह की अध्यक्षता की, जहां पाँच प्रवासियों को अमरीकी नागरिकों के रूप में शपथ दिलाई गई. उनमें भारत की एक सॉफ्टवेयर डेवेलपर सुधा सुंदरी नारायणन भी शामिल थीं, जो अपनी शानदार कोरल पिंक साड़ी पहने सब से अलग दिख रही थीं और गर्व से अपने हाथ में नागरिकता सर्टिफ़िकेट पकड़े हुए थीं.
इसे राष्ट्रपति ट्रंप के भारतीय मूल के अमरीकियों के प्रति झुकाव के रूप में देखा गया. जबकि पारंपरिक रूप से भारतीय अमरीकियों ने राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को नहीं बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दिया है.
अमरीका में दो बार भारतीय राजनयिक के रूप में काम कर चुकीं पूर्व राजनयिक नीलम देव कहती हैं, "अमरीका की आव्रजन नीति और एच1बी (H1B) वीज़ा पर आने वाले हाई टेक वर्कर्स भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं. अमरीकी इमीग्रेशन भारतीय मूल के अमरीकियों के लिए बहुत रुचि का विषय है और भारतीयों के लिए भी. स्वाभाविक रूप से भारतीय लोगों के लिए जो अहम है उसमें भारत सरकार की भी दिलचस्पी है. इसे भारत में बहुत सराहा गया और यह भारत सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है."
राष्ट्रपति ट्रंप के इस प्रतीकात्मक क़दम ने दोनों देशों के बीच अच्छी भावना पैदा की है. वहीं, भारत और अमरीका के संबंधों ने पिछले दो दशकों में एक रणनीतिक गहराई हासिल कर ली है.
दो दशकों में घनिष्ठ हुए रिश्ते
भारत की विदेश नीति शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) से लेकर सोवियत संघ के अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के दौरान गुट निरपेक्षता पर आधारित रही है.
लेकिन, 1996 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने साल 2000 में भारत की एक ऐतिहासिक यात्रा की. इस दौरान राष्ट्रपति ने भारत को अमरीका की तरफ़ लुभाने की भरपूर कोशिश की.
किसी अमरीका राष्ट्रपति द्वारा ये भारत की सबसे लंबी यात्रा (छह दिन की) थी. इसे बेशक भारत-अमरीका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा गया था.
पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की भारत यात्रा के दौरान परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर ने रिश्ते में रणनीतिक गहराई जोड़ दी.
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दोनों पक्षों के बीच बढ़ती निकटता को दर्शाते हुए भारत की दो यात्राएं कीं.
इस साल 25 फ़रवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुजरात में एक महारैली को संबोधित किया था. ये समारोह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के सम्मान में आयोजित किया गया था.
इसमें राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था, "यह (द्विपक्षीय संबंध) कभी भी उतने अच्छे नहीं रहे जितना कि अभी हैं."
ऐसे में सवाल है कि नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद भारत अगले अमरीकी प्रशासन से क्या चाहता है?
चीन और लद्दाख
पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन की सेना के बीच जून में हुई झड़पों के कारण दोनों पड़ोसी देशों के बीच गतिरोध और तनाव बना हुआ है.
राजनयिकों का कहना है कि भारत के लिए ये एक बड़ा संकट है और मोदी सरकार की प्राथमिकता चीन की सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा से हटाना है. भारत को चीन पर दबाव बनाने के लिए अमरीका और दूसरे लोकतांत्रिक देशों की मदद चाहिए.
स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष विभाग में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन कहते हैं, "भारत को अमरीकी चुनाव में किसकी जीत हो इसकी परवाह किए बिना अमरीका के साथ अच्छे संबंध बनाने की ज़रूरत है लेकिन इसे चीन के ख़िलाफ़ संचालित नहीं किया जाना चाहिए."
विश्लेषक कहते हैं कि पूर्वी लद्दाख में बड़ी संख्या में मौजूद चीनी सैनिक भारत और उसकी सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं.
क्वाड समूह की हालिया टोक्यो बैठक इसी मामले को देखते हुए की गई. इस समूह में भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं.
अमरीका इस गठबंधन को नैटो के रूप में बदलने का विचार रखता है ताकि इससे चीन के बढ़ते सैन्य और आर्थिक असर को मिल कर कम किया जा सके.
अमरीकी मदद से संकोच क्यों
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने चीन के ख़िलाफ़ भारत को मदद की पेशकश की है.
उन्होंने हाल ही में कहा, "उन्हें (भारत को) इस लड़ाई में अमरीका को अपना सहयोगी और साझेदार बनाने की आवश्यकता है."
लेकिन, भारत इस प्रस्ताव को लेकर तो भले ही ख़ुशी जताता है, लेकिन इसे स्वीकार करने में संकोच करता है.
नीलम देव के अनुसार भारत एक गुट निरपेक्ष देश रहा है. स्वाभाविक है कि भारत फ़ैसले लेने में समय ले सकता है. साथ ही उनका मानना है कि सत्ता परिवर्तन होने पर भी भारत को अमरीका से निकटता बनाए रखनी चाहिए.
वह कहती हैं, “अगर बदलाव हुआ (सत्ता में) तो मैं चाहूंगी कि संबंधों में जो विकास हो रहा है वो होता रहे बल्कि इसकी गति तेज़ हो. चीन का रुख़ काफ़ी आक्रामक हो चुका है तो हम चाहेंगे कि रक्षा और रणनीतिक मामलों में भारत-अमरीका रिश्ते आगे बढ़ें और मज़बूत हों."
डॉ. नताशा कौल लंदन में वेस्टमिनिस्टर विश्वविद्यालय में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.
वह कहती हैं, “जब अमरीकी विदेश नीति विपरीत दिशा में जा रही हो और डोनाल्ड ट्रंप अमरीका की वैश्विक प्रतिबद्धताओं को कम कर रहे हों तो ट्रंप प्रशासन के कोरे बयान कोई ख़ास मायने नहीं रखते.”
“जब चीन अमरीकी मदद और मध्यस्थता का विरोध कर रहा हो और भारत उदासीनता दिखा रहा हो तो इस मदद का महत्व नहीं रह जाता.”
हालांकि, भारत में अमरीका को कई लोग एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में नहीं देखते हैं और उसका कारण है सालों से अमरीका और पाकिस्तान की नज़दीकी.
प्रोफ़ेसर स्वैन भारत को अमरीका पर भरोसा न करने की सलाह देते हैं.
वह कहते हैं, "अमरीका कभी भी किसी का विश्वसनीय सहयोगी नहीं रहा है और ट्रंप के शासन में ये अधिक स्पष्ट हो गया है. भारत के लिए चीन के ख़िलाफ़ अमरीकी कार्ड काम नहीं करने वाला है."
भले ही दोनों देशों के बीच रिश्ते पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की निजी दोस्ती की गर्माहट में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन राजनयिकों के विचार में इसमें गति की कमी है.
नीलम देव संबंधों में और गति लाने की बात पर ज़ोर देती हैं. वो कहती हैं, "हम राष्ट्रपति ट्रंप के शासन में अच्छी प्रगति कर रहे हैं. पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच एक ग़ज़ब की केमिस्ट्री है. लेकिन प्रगति धीमी है और हम इसे गति देना चाहेंगे."
भारत और अमरीका, किसे किसकी ज़्यादा ज़रूरत
कोरोना वायरस के प्रसार के बाद बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति से दोनों देशों के बीच भी रिश्तों में बदलाव आया है.
विश्लेषकों का मानना है कि आज अमरीका को भारत की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है.
चीन के सिचुआन विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हुआंग युनसन का मानना है कि अमरीका चीन को निशाना बनाने के लिए भारत का इस्तेमाल करना चाहता है.
वह कहते हैं, "अमरीका ने वायरस के प्रसार के लिए चीन को दोषी ठहराया है. इसने चीन के ख़िलाफ़ व्यापार और टैरिफ़ युद्ध छेड़ दिया है. वह भारत को अपने स्वार्थ के लिए चीन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना चाहता है."
नीलम देव कहती हैं कि दोनों देशों को एक-दूसरे की ज़रूरत है. चीन दोनों देशों की परेशानियों का कारण है.
भारत अब तक अमरीका की मदद के प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने में सावधान रहा है.
प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन का कहना है कि भारत यह देखने के लिए इंतज़ार करेगा कि नवंबर के चुनाव में क्या होता है.
लेकिन राजनयिकों का मानना है कि व्हाइट हाउस में नए राष्ट्रपति के आने से भी भारत के लिए बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है.
राष्ट्रपति ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी के उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडन के बीच भारत से रिश्तों को छोड़कर लगभग सभी मसलों पर असहमति रही है.
भारत के पूर्व राजनयिकों का कहना है कि भारत के प्रति अमरीकी नीति को अमरीका में दोनों पार्टियों का समर्थन प्राप्त है.
नीलम देव कहती हैं कि कश्मीर के मुद्दे को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी में सवाल ज़रूर उठाये गए हैं लेकिन ये डेमोक्रेटिक पार्टी के पिछले राष्ट्रपतियों के दौर में भी उठाए गए थे. इसके बावजूद दोनों देशों के आपसी रिश्तों में बढ़ोतरी होती रही.
वो आगे कहती हैं, "यह पहली बार नहीं है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों की भारत के प्रति एक ही नीति है, चूंकि दोनों पार्टियों के राष्ट्रपति भारत आते रहे हैं. राष्ट्रपति क्लिंटन आये और राष्ट्रपति ओबामा दो बार हमसे मिलने आए. बुश भी आये और राष्ट्रपति ट्रंप भी."
अमरीका में राष्ट्रपति किसी भी पार्टी का हो पिछले 20 सालों में दोनों देशों के संबंधों में लगातार प्रगति होती आ रही है.
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