हाथरस मामले में योगी सरकार पर सच दबाने और अभियुक्तों का समर्थन करने का आरोप - फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाथरस के कथित गैंगरेप मामले पर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर समेत नौ सदस्यीय एक समूह ने फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी की है. इस समूह ने नौ अक्टूबर को हाथरस का दौरा किया था, जहां गांव में पीड़ित परिवर और उनके रिश्तेदारों से बातचीत के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की गई है.
इस रिपोर्ट में कई तरह की बातें रखी गई हैं साथ ही आरोप लगाया गया है कि राज्य ने सच को दबाने और मामले को हमेशा के लिए बंद करने की कोशिश की, लेकिन सिविल सोसाइटी और मीडिया के एक समूह ने जब मामले को उठाना और सच बाहर लाना शुरू किया तो चीज़ें बदलीं.
इसमें ये भी कहा गया है कि इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की 'हिंसा से लेकर भद्दी राजनीति' को सामने ला दिया है, "जो तथाकथित ऊंची जाति के दमनकारी बलों समेत समाज के उन तबक़ों को प्रोत्साहित करने और संरक्षण देने का काम करती है, जो खुले तौर पर क़ानून, संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं."
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट की टीम में जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, एक्टिविस्ट और लेखिका मणि माला, सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतेशाम हाशमी और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के संदीप पांडेय जैसे लोग शामिल थे. इस रिपोर्ट को नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपल्स मूवमेंट यानी एनएपीएम (NAPM) की ओर से जारी किया गया है.
मंगलवार को ज़ूम पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिए इस रिपोर्ट को जारी करते हुए मेधा पाटकर ने कहा, "हाथरस की घटना पर हमारी रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ये है कि इस अत्याचार की क़ानूनी प्रक्रिया चाहे वो जाँच की हो या अत्याचारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की हो, पूरे हेरफेर में राज्य शासन का समर्थन है."
उन्होंने कहा, "पूरे घटनाक्रम को जो मोड़ दिया जा रहा है, उसे देखकर हम हैरान हैं. इससे पहले उत्तर प्रदेश के उन्नाव की घटना उतनी ही बर्बरता से भरी थी. वहीं बलरामपुर, आज़मगढ़ और बाराबंकी की घटनाएं बताती हैं कि यूपी की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था किस दिशा में बढ़ रही है. उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार सबसे बर्बरता भरे हैं."
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता मणि माला ने कहा, "हालात बहुत बुरे हैं और समाज का एक हिस्सा जिस तरह अपराधियों को बचाने के लिए खड़ा हो गया है, ये बहुत भयानक स्थिति है. कम उम्र की महिलाओं से बलात्कार के मामले बढ़े हैं. कई बार लोग कहते हैं कि बलात्कार का कोई धर्म या जाति नहीं होती लेकिन हमारे देश में ये होता है. बलात्कारियों का भी धर्म और जाति होती है, नहीं तो जिस तरह से इस मामले में तथाकथिक एक ऊंची जाति के लोग अपराधियों के पक्ष में खड़े हो गए हैं, वो अजीब सी बात है. ये एक नया ट्रेंड हमारे समाज में पैदा हुआ है कि हम निर्लजता के साथ हत्या और बलात्कार के पक्ष में खड़े हैं."

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रिपोर्ट में क्या है?
रिपोर्ट में इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस के काम करने के तरीक़े पर सवाल उठाया गया है और ये भी कहा गया है कि पुलिस का ये कहना कि हिंसा की आशंका को देखते हुए शव का दाह संस्कार देर रात में कर दिया गया, "इस बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा, क्योंकि इससे पुलिस पीड़िता की सुरक्षा की अपनी ख़ुद की अक्षमता दिखाती है और ये भी बताती है कि वो ख़ुद कोई अप्रिय घटना रोकने में सक्षम नहीं है."
इसमें लिखा है कि 14 सिंतबर की घटना के बाद पीड़िता को जब ज़िला अस्पताल ले जाया गया तो वहां के डॉक्टरों को पुलिस ने कुछ नहीं बताया और परिवार के मुताबिक़, ना ही किसी पुलिसकर्मी या अधिकारी ने कोई जाँच की. जबकि प्रशासन को अच्छे से पता है कि बलात्कार से जुड़ी आईपीसी की धारा 375 के तहत आगे की जाँच और कार्रवाई के लिए ये बहुत ज़रूरी है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ 24 घंटे बाद जब पीड़िता को बेहोशी की हालत में अलीगढ़ के जेएलएनएमसीएच अस्पताल में शिफ्ट किया गया तब भी रिश्तेदारों ने डॉक्टरों को कहते सुना कि उन्हें नहीं पता कि ये केस उनके पास कहां से और किस लिए लाया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, परिवार को शुरुआत से ही महसूस हो रहा था कि डॉक्टर और कर्मचारी किसी दबाव में हैं, हालांकि पीड़िता को मूल उपचार दिया गया था.

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फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में लिखा गया है कि पीड़िता एक या दो दिन बाद जब होश में आई तो अपनी मां को पूरी बात बताई और बलात्कार और क्रूर हमले का ज़िक्र करते हुए चारों अभियुक्तों के नाम लिए. जिसके बाद परिवार ने वार्ड में मौजूद डॉक्टरों, सिस्टरों और दूसरे मरीज़ों के रिश्तेदारों को इस बारे में बताया.
आरोप लगाया गया है कि जब अलीगढ़ अस्पताल ने मामले से पीछा छुड़ाने की कोशिश में केस को दूसरे अस्पताल ट्रांस्फ़र कर दिया, तब पीड़िता को कुछ होश आया था.
अलीगढ़ में कुछ डॉक्टरों का मानना था कि पीड़िता को होश आने तक कहीं नहीं भेजना चाहिए. परिवार भी तैयार नहीं था, क्योंकि वो बहुत दर्द में थी. रिपोर्ट में कहा गया कि पीड़िता को एम्स के बजाय सफ़दरजंग अस्पताल ले जाया गया और पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें कहा गया कि दोनों अस्पतालों में कोई फ़र्क़ नहीं है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में अस्पताल में भर्ती होने के बाद परिवार को ज़्यादा उसके बारे में बताया नहीं गया और परिवार को परेशान भी किया गया.
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में उन आरोपों को भी एकदम ग़लत बताया गया है कि पीड़िता के परिवार ने प्रशासन को उसे एम्स नहीं ले जाने दिया.

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'डॉक्टरों ने यौन हमले के पहलू से जाँच नहीं की'
रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्टरों ने यौन हमले से जुड़ी कोई जाँच नहीं की और ना ही पीड़िता के ख़ुद सच सामने लाने से पहले तक परिवार से इस बारे में कुछ पूछा.
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि क्योंकि देरी से जाँच करने पर बलात्कार का पता नहीं चलता इसलिए हो सकता है कि जान बूझ कर वक़्त बर्बाद किया गया हो. कहा गया है कि हो सकता है ये इसलिए किया गया हो ताकि सबूत कभी मिल ही ना सकें.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिको लीगल केस रिपोर्ट की कॉपी, जो परिवार को तुरंत मुहैया नहीं करवाई गई थी, उसमें वेजाइना में पेनिस के पेनिट्रेशन की बात कही गई थी, लेकिन उसी यूनिवर्सिटी की फोरेंसिक डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में इस संभावना को ख़ारिज कर दिया गया.

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'ऑनर किलिंग' की कहानी
रिपोर्ट के मुताबिक़ तब तक ये पता चल चुका था कि पीड़िता को अभियुक्त पिछले छह महीने से परेशान कर रहे थे. एक अभियुक्त पहले भी पीड़िता को नज़दीक के खेत में खींच ले गया था, जहां से वो भाग निकली थी.
एक अभियुक्त और पीड़िता के बीच संबंध के आरोप भी लगे हैं और कहा गया है कि दोनों के बीच फ़ोन पर बात होती थी, इसलिए पीड़िता के परिवार ने ही उसे मार दिया. रिपोर्ट के मुताबिक़, इस मामले को ऑनर किलिंग का रंग देने की कोशिश हुई, जिसे परिवार ने पूरी तरह ख़ारिज किया है.
रिपोर्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को हाथरस जाने से रोके जाने और केरल के यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के तीन एक्टिव लीडर्स की गिरफ़्तारी की भी आलोचना की गई है.

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परिवार पर दबाव बनाने का आरोप
परिवार ने फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम को बताया कि हाथरस में ज़िला मजिस्ट्रेट की पूछताछ में उनकी बात ठीक से ना सुनकर ये अस्पष्ट संकेत दिया गया कि परिवार कहे कि वो जाँच और इलाज दोनों से संतुष्ट हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, अस्पताल में पीड़िता की मौत के बाद पोस्टमार्टम के लिए सहमति माँगी गई थी, लेकिन इसके अलावा कुछ साझा नहीं किया गया. इसके बाद उन्हें शवगृह में बुलाकर युवती का शव दिखाया गया. जिसके कुछ घंटे बाद ख़बर आई कि पुलिस परिवार से पूछे बग़ैर शव को दाह संस्कार के लिए ले गई है.
इसके बाद पुलिस परिवार को एक गाड़ी में हाथरस ले गई लेकिन गाड़ी को दाह संस्कार वाली जगह से दूर ही रोक दिया गया. परिवार की महिलाएं रोती रहीं लेकिन उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया.
घटना पर भारी ग़ुस्सा और कई जगह प्रदर्शन होने के बाद उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने पीड़ित परिवार के लिए 25 लाख मुआवज़े का एलान किया. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़ अपुष्ट ख़बर ये है कि परिवार को सिर्फ़ 8-10 लाख रुपये मिले हैं. जो एससी/एसटी (पीओए) के तहत मामला रजिस्टर होने के बाद ही मिल जाने चाहिए थे.
लेकिन फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट ने जब परिवार से बात की तो उन्होंने कहा कि उन्हें पैसा नहीं चाहिए और उन्होंने अपने अकाउंट ही चेक नहीं किए हैं. उन्होंने कहा कि "जब न्याय ही ना मिला तो पैसा किस काम का." उसी दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अगर परिवार इसे स्वीकार नहीं करता तो डीएम इसे अलग खाते में रखें और इसका सही इस्तेमाल करने के तरीक़े पर सोचें.

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गांव का ताना बाना
रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि पीड़िता और अभियुक्तों के गांव में 600 से ज़्यादा परिवार हैं, जिनमें क़रीब 15 ही दलित परिवार हैं.
दलित वहां पीढ़ियों से रह रहे हैं लेकिन दशकों से बहुत कुछ झेल रहे हैं. दलित परिवार तथाकथित ऊंची जाति के परिवारों के यहां खेतिहर मज़दूर रहे हैं और उनके और भी कई काम करते रहे हैं.
अभियुक्त पीड़ित परिवार के नज़दीक ही रहते हैं और इन पड़ोसियों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. क़रीब 20 साल पहले एक अभियुक्त के तथाकथिक ऊंची जाति वाले परिवार ने मृत युवती के दादा पर हमला किया था.
मृत युवती के भाई कहते हैं, "वो हमारे खेतों में अपनी भैंस को चराने आए थे और मेरे दादा जी ने अपील की कि जानवरों को कहीं और ले जाएं नहीं तो हमारी फ़सल को नुक़सान होगा. उन्हें ग़ुस्सा आ गया कि एक दलित ने ये कैसे कहा, उन्होंने चाक़ू जैसी चीज़ से हमला कर दिया. मेरे दादा ने अपनी गर्दन बचाने की कोशिश की तो उनकी उंगली कट गई थी."
रिपोर्ट के मुताबिक़, पुलिस प्रमुख वीर ने कहा कि एक अभियुक्त मृत युवती के दादा पर हमले में शामिल था. वहीं एक अभियुक्त बहुत ज़्यादा शराब पीने का आदी रहा है और पहले वाले अभियुक्त के पिता ने तो बताया भी कि मृत युवती के दादा पर हमले के सिलसिले में उन्हें जेल भी हो गई थी.
हालांकि रिपोर्ट में ये भी लिखा गया है कि पिछले दो दशकों में मृत युवती और अभियुक्तों के परिवारों के बीच कोई लड़ाई या संघर्ष नहीं हुआ था. इसलिए 14 सिंतबर की घटना के बारे में परिवार को कोई अंदाज़ा नहीं था.

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फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी करने के मौक़े पर सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतेशाम हाशमी ने कहा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में बलात्कार के 55 हज़ार मामले पेंडिंग ट्रायल में हैं, जिसमें अभी तक पूरी सुनवाई या फ़ैसला या न्याय नहीं हो पाया है. इसलिए इस राज्य में पीड़िता और उसके परिवार को सस्ता और सुलभ न्याय दिलाने की व्यवस्था होनी चाहिए.
वो कहते हैं, "क्रीमिनल लॉ का सबसे अहम हिस्सा होता है कि एफ़आईआर रेजिस्ट्रेशन करने में कोई देरी ना हो. लेकिन इस मामले में एफ़आईआर बहुत देरी से रजिस्टर की गई. जिससे लोगों को सबूत मिटाने का भी वक़्त मिला और शव को जलाना भी सबूत मिटाने की एक प्रक्रिया थी. क्रियाकर्म के वक़्त भी उसका चेहरा परिवार को नहीं दिखाया गया. ये मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है."
वो ये भी कहते हैं, "एक अहम बात ये है कि देश में इतने अपराध होते हैं पीड़ित परिवार के नार्को एनेलेसिस टेस्ट की बात नहीं होती, लेकिन ये अनोखा और भयावह उदाहरण था कि यहां पर सरकार ने कहा कि नार्को एनेलेसिस टेस्ट कराएंगे."
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