बाबरी मस्जिद विध्वंस केस का फ़ैसला: न्याय का भ्रम, और जांच पर सवाल

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सीबीआई की विशेष अदालत ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

जज सुरेंद्र कुमार यादव ने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती, विश्व हिंदू परिषद की साध्वी ऋतंभरा समेत कुल 32 अभियुक्तों की भूमिका पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि, "ये घटना पूर्व नियोजित नहीं थी".

28 साल लंबी अदालती कार्रवाई के दौरान 17 अभियुक्तों की मौत हो गई.

हैदराबाद स्थित नैलसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये फ़ैसला निराशाजनक है और भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक धक्का है.

उन्होंने कहा, "बीजेपी, शिव सेना के नेताओं के उस व़क्त के भाषण उप्लब्ध हैं, तब जो धर्म संसद आयोजित हो रही थीं, उनमें दिए नारे देखे जा सकते हैं, जो कारसेवक उस दिन आए थे वो कुल्हाड़ी, फावड़े और रस्सियों से लैस थे, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि षडयंत्र था."

राम जन्मभूमि आंदोलन के चरम पर 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को एक भीड़ द्वारा ढहा दिया गया जिसके बाद उसके पीछे के आपराधिक षडयंत्र की जांच के लिए मामला दर्ज किया गया.

उसके बाद देश भर में भड़के दंगों में 2,000 लोगों की मौत हुई, हज़ारों घायल हुए.

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के भूमि विवाद मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील रहे ज़फ़रयाब जिलानी ने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत में इस फ़ैसले को ग़लत और क़ानून के विरुद्ध बताते हुए कहा कि उसके ख़िलाफ़ तय समय सीमा में हाई कोर्ट में अपील दाख़िल की जाएगी.

जिलानी ने कहा, "आईपीएस अफ़सर, सरकारी अधिकारी और वरिष्ठ पत्रकारों ने अदालत में गवाही दी है, क्या उनके बयान झूठे हैं, और अगर ऐसा है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए".

सीबीआई पर सवाल

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा ने कहा कि एक लोकतंत्र में एक धार्मिक स्थल के इस तरह से गिराए जाने के इतने बड़े अपराध के लिए किसी का दोषी ना पाया जाना देश की क़ानून व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है.

उन्होंने कहा, "इससे यही लगता है कि सीबीआई अपना काम ठीक से नहीं कर पाई क्योंकि हमने सरेआम टेलीविज़न पर सब होते देखा, इतने ऑडियो, वीडियो साक्ष्य और 350 से ज़्यादा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बावजूद ठोस सबूत ना मिल पाने की बात समझ नहीं आती."

देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी, सीबीआई गृह मंत्रालय, भारत सरकार के तहत आती है. फ़ैसला आने के बाद सीबीआई ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ज़फर इस्लाम ने सीबीआई की स्वायत्ता पर उठ रहे सवालों को ग़लत बताया है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "हमने जांच में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है, साबीआई एक स्वतंत्र एजंसी है और उसने साक्ष्य के आधार पर काम किया जो की कांग्रेस की सरकारों के दौर में इकट्ठा किए गए थे."

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के मुताबिक़ जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष का अलग-अलग और स्वायत्त होना ज़रूरी है.

उन्होंने कहा कि, "षडयंत्र का अपराध, भारतीय दंड संहिता 120बी के तहत, दो लोगों के आपस में बात करने सिद्ध हो सकता है, ऐसे में 32 में से 32 लोगों के ख़िलाफ़ षडयंत्र का सबूत ना मिल पाना आश्चर्यचकित करता है".

बीजेपी प्रवक्ता ज़फर इस्लाम के मुताबिक अदालत में सबूतों के आधार पर ही सच सामने आया और इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार के दौरान बीजेपी नेताओं को फंसाने के लिए विध्वंस के बारे में एक भ्रम पैदा किया था.

ग़ौरतलब है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के फ़ौरन बाद, दिसंबर 1992 में ही केंद्र सरकार ने रिटायर्ड हाई कोर्ट जस्टिस लिबरहान को इसकी तहक़ीक़त का काम सौंपा.

17 साल बाद लिबरहान कमिशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विजयाराजे सिंधिया समेत 68 लोगों को साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का दोषी पाया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने इसे ग़लत बताते हुए तब ये कहा था कि वो मस्जिद ढहाए जाने की सिर्फ़ "नैतिक ज़िम्मेदारी" लेंगी और उन्हें "राम जन्मभूमि आंदोलन का हिस्सा होने पर गर्व है".

उमा भारती कोरोना पॉज़िटिव होने की वजह से इस व़क्त ऋषिकेश के एम्स अस्पताल में भर्ती हैं.

मुस्लिम समुदाय पर असर

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि, "इस फैसले से यही माना जाएगा कि न्यापालिका में न्याय नहीं होता है बस एक भ्रम रहता है कि न्याय किया जाएगा."

उन्होंने कहा कि यही होना संभावित था क्योंकि विध्वंस के केस में फ़ैसला आने से पहले ही ज़मीन के मालिकाना हक़ पर फ़ैसला सुना दिया गया, वो भी उस पक्ष के हक़ में जो मस्जिद ढहाए जाने का आरोपी था.

बीजेपी प्रवक्ता ज़फर इस्लाम इस सोच से इत्तफ़ाक़ नहीं रखते और उनका कहना है कि उनकी पार्टी कभी मस्जिद तोड़ना नहीं चाहती थी, सिर्फ़ मंदिर बनाना चाहती थी, जो अदालत में सिद्ध हुआ है.

नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला हिंदु पक्ष के हित में दिया था और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए एक अलग जगह पर पांच एकड़ ज़मीन दी थी.

उस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "बाबरी मस्जिद का विध्वंस सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरुद्ध था और क़ानून के ख़िलाफ़ हुआ था".

फ़ैसले में ये भी कहा गया था कि "मुसलमान समुदाय को उनकी इबादत की जगह के ग़ैरक़ानूनी विध्वंस के लिए क्षतिपूर्ति ज़रूरी है."

प्रशांत भूषण के मुताबिक विध्वंस पर आए फ़ैसले से मुसलमान समुदाय में द्वेष बढ़ेगा क्योंकि ज़मीन के मालिकाना हक़ और मस्जिद गिराए जाने, दोनों मामलों के फ़ैसले उन्हें अपने हक़ में नहीं लगेंगे.

उन्होंने ये भी कहा, "मुसलमान समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है, उनके सामने इस वक्त और बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे जैसे हिंदू राष्ट्र के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं."

ज़फर इस्लाम के मुताबिक मुसलमान समुदाय के लिए ये अब मुद्दा नहीं है, "वो इसे पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना चाहते हैं, पर ये तो कुछ मुस्लिम नेता हैं जो इसका राजनीतिकरण करने में लगे हैं".

उन्होंने आश्वासन दिया कि अयोध्या के इस मामले के बाद, अब आनेवाले समय में बीजेपी किसी और धार्मिक स्थल के विवादास्पद होने की बात नहीं उठाएगी.

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