बिहार चुनाव से पहले कैमूर के आदिवासियों में विस्थापन का डर: ग्राउंड रिपोर्ट

कैमूर के आदिवासी

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    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, कैमूर से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में चुनावी सरगर्मियां शुरू हो चुकी हैं. चुनाव की घोषणा से पहले ही राजनीतिक दलों के भीतर भी गहमागहमी तेज़ हो चुकी थी.

लेकिन इस चुनावी घमासान से ठीक पहले बिहार का कैमूर ज़िला और वहां के आदिवासी दूसरी वजहों से चर्चा में हैं.

कैमूर में एक वन्यजीव अभयारण्य है जिसे अब बिहार सरकार टाइगर रिज़र्व के तौर पर विकसित करने की तैयारी कर रही है. वन विभाग जंगल पर निगरानी बढ़ा कर यह पता लगाने में जुटा है कि अभयारण्य बाघों के रहने के लिए अभी कितना अनुकूल है.

भारतीय जनता पार्टी के सांसद राजीव प्रताप रुडी ने हाल में संसद में कहा था, "बिहार में वाल्मीकिनगर राष्ट्रीय व्याघ्र अभयारण्य के अलावा एक और स्थान है, कैमूर वन्यजीव अभयारण्य. मध्य प्रदेश, झारखंड और उत्तर प्रदेश के जंगलों से सटा क़रीब 1100 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह जंगल देश का सबसे बड़ा टाइगर रिज़र्व बन सकता है."

"1995 में आख़िरी बाघ यहां देखा गया था और हाल-फ़िलहाल भी यहां बाघ देखे गए हैं. मैं केंद्र सरकार से माँग करता हूं कि इसे बाघों के राष्ट्रीय उद्यान के रूप में विकसित करने की स्वीकृति दे."

राजीव प्रताप रुडी ख़ुद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की टीम के अध्यक्ष भी हैं, लिहाज़ा उनकी बातों के बाद इस पर चर्चा एक बार फिर से तेज़ हो गई है. वैसे कैमूर के जंगलों में टाइगर रिज़र्व बनाने को लेकर सर्वे का काम बिहार सरकार के पर्यावरण एवं वन विभाग के अधिकारी पिछले एक साल से कर रहे हैं.

इन सबसे कैमूर की पहाड़ियों में रहने वाले आदिवासियों के मन में डर समाता दिख रहा कि अब उनके सारे वनाधिकार छीन लिए जाएंगे और उन्हें अपना बसेरा छोड़ना यानी विस्थापित होना पड़ेगा. इसके चलते ये लोग विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर गए हैं.

बीते 11 सितंबर को कैमूर मुक्ति मोर्चा के बैनर तले जब सैकड़ों की संख्या में आदिवासी अधौरा प्रखंड कार्यालय के पास धरना प्रदर्शन और तालाबंदी कर रहे थे, तब पुलिस के साथ उनकी हिंसक झड़प हुई और गोलियां चलीं.

कैमूर

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क्या हुआ था झड़प के दिन?

गोलीकांड में तीन प्रदर्शकारी गंभीर रूप से घायल हुए. कुछ पुलिसवालों को भी चोटें आईं.

100 से अधिक प्रदर्शनकारियों पर मुक़दमा दर्ज किया गया है और अब तक सात आदिवासियों को गिरफ़्तार भी किया जा चुका है.

इस पूरे प्रकरण पर कैमूर के एसपी दिलनवाज़ अहमद बीबीसी को बताया, "प्रदर्शकारी इतने उग्र थे कि अगर हवाई फ़ायरिंग नहीं होती तो 10-11 पुलिसकर्मियों की जान चली जाती. नुक़सान भी पुलिस का ही ज़्यादा हुआ है, हमारे 13 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और प्रदर्शकारी सिर्फ़ तीन."

प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों का कहना है कि उनकी माँगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था जिसके चलते उन्हें प्रदर्शन करना पड़ा है.

लेकिन दिलनवाज़ अहमद कहते हैं, "ऐसा बिल्कुल नहीं है. वहां ज़िला प्रशासन के आला अधिकारी मौजूद थे. प्रदर्शनकारियों ने ही ख़ुद थाने में और सीओ के दफ़्तर में तालाबंदी कर दी थी. हमारे पास पूरी घटना की वीडियो रिकार्डिंग है. दरअसल, वे लोग प्लैनिंग करके आए थे कि उत्पात मचाना है. पुलिस को आत्मरक्षा के लिए गोली चलानी पड़ी."

लेकिन राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच से जुड़ीं रोमा ने बताया, "इस मामले की जाँच कराई जानी चाहिए कि आख़िर क्या वजह रही कि दो दिनों से चल रहा शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया. पुलिस ने झूठी कहानी बनाई है."

कैमूर के आदिवासी

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बाघ से डर नहीं, सरकार से है डर

विंध्य पर्वत श्रृंखला में कैमूर की पहाड़ियों पर आदिवासियों की बसावट मुख्य रूप से अधौरा अंचल के 11 पंचायतों के 131 गांवों में है. चेरो, खरवार, गोंड, उरांव और कोरबा जनजाति समूह की क़रीब एक लाख की आबादी वाले इस अंचल का समूचा हिस्सा ही वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में है.

इसी वर्ष जनवरी में रोहतास ज़िले के चेनारी के औरैया, भुड़कुड़ा एवं दुर्गावती जलाशय वाले इलाक़े में कैमूर पहाड़ी पर नर बाघ के पदचिन्ह देखे गए थे, बाघ का मल भी मिला था. फिर मार्च के महीने में वन क्षेत्र के अंदर लगे ट्रैप कैमरे में भी एक बाघ देखा गया था.

टाइगर रिज़र्व बनने की संभावना से पैदा विस्थापन का डर झेल रहे कैमूर की पहाड़ियों के आदिवासियों की चिंता इस बात की नहीं है कि जंगल में बाघ आ जाएंगे, बल्कि इस बात का डर सता रहा है कि रिज़र्व बनने के चलते उन्हें जंगलों से हटा दिया जाएगा.

अधौरा प्रखंड के सोड़ा-सडकी गांव के रहने वाले बजरंगी अगरिया कहते हैं, "इस जंगल में पहले भी बाघ रहते थे, हम भी उनके साथ रहते थे. वनवासी बाघ से डरते नहीं हैं, उनका सम्मान करते हैं. लेकिन हमें डर सरकार से है जो हमें हमारे वनाधिकारों से वंचित करना चाहती है. टाइगर सफ़ारी के नाम पर हमें बेदख़ल करने की साज़िश रची जा रही है."

कैमूर के आदिवासी

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जब से अभयारण्य बना तब से हुई दिक़्क़तें

आज से क़रीब 25 साल पहले जब कैमूर पहाड़ी के जंगल वन्यजीव अभयारण्य नहीं घोषित हुए थे, तब वहां के आदिवासियों को आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना होता था.

साल 1996 में कैमूर वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा के बाद से वनक्षेत्र में तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं. हर प्रकार के वन्य उत्पाद के व्यवसाय पर रोक लगी हुई है. तेंदू पत्ता, महुआ, पियार आदि को चुनकर आदिवासी बेचते थे और यही उनकी आजीविका थी, जिस पर रोक लग गई.

अपने हाथों में कंद-मूल दिखाते हुए सोड़ा-सोडकी गांव के निवासी राम पूजन कहते हैं, "हमारे पास पैसा नहीं है कि अनाज ख़रीद सकें. वन विभाग ने जंगल की सभी चीज़ों के चुनने और बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है. मुख्यमंत्री ने खेती के लिए ज़मीन देने का वादा किया था, आज तक वह भी नहीं मिला. हमारे लिए भूख मिटाने का संकट पैदा हो गया है."

अधौरा प्रखंड मुख्यालय पर मिले वहां के भाजपा प्रखंड अध्यक्ष जोखन सिंह खरवार पूर्व में गांव के मुखिया भी रह चुके हैं, और आदिवासी समाज की माँगों के साथ खड़े दिखते हैं.

जोखन सिंह खरवार कहते हैं, "जब टाइगर रिज़र्व बनेगा तब तो हमें हटा ही दिया जाएगा, मगर हमारी असल दिक़्क़त जंगल के अभयारण्य बनने से है. आदिवासियों की जीविकोपार्जन के प्रमुख स्रोत जंगल ही हैं."

जोखन सिंह के मुताबिक़ आज के रेट के हिसाब से केवल तेंदू पत्ता (बीड़ी का पत्ता) चुनकर और बेचकर एक आदिवासी परिवार 10 से 15 हज़ार रुपए महीने में आसानी से कमा ‌सकता है. इसके अलावा महुआ, पियार, हरे-बहेरा, आवंला जैसे अन्य लघु वन्य उत्पाद हैं जिन्हें बाज़ार में बेचने पर रोक है.

ब्रज किशोर बिंद

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इमेज कैप्शन, बिहार सरकार के खनन मंत्री और चैनपुर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक ब्रज किशोर बिंद

वनाधिकार क़ानून को लागू क्यों नहीं करती सरकार?

यहां के आदिवासी समाज की प्रमुख माँग है वनक्षेत्र में वनाधिकार क़ानून को लागू करना.

भारत की संसद से पास अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2007 आदिवासियों एवं वनों के मूल निवासियों को न केवल वन भूमि पर स्वामित्व प्रदान करता है बल्कि लघु वन्य उत्पादों के उपभोग करने की अनुमति भी प्रदान करता है.

लेकिन, कैमूर के जंगल के वन्यजीव अभयारण्य बन जाने से वहां रहने वाले आदिवासियों को यह अधिकार अब तक नहीं मिल सका है.

जोखन सिंह खरवार कहते हैं, "हम अगर जंगल से कुछ भी चुनकर लाते हैं तो पुलिस हमें रोकती है. मुक़दमा लगाकर हमें जेल भेज दिया जाता है. खेती भी नहीं कर सकते क्योंकि जंगल काटने पड़ेंगे. संसद में इस पर सहमति बन चुकी है कि वनों पर हमारे भी अधिकार हैं तो सरकार हमें देती क्यों नहीं है?"

कैमूर में वन अभयारण्य बनाने का काम तत्कालीन वन मंत्री और वर्तमान में राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने किया था.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने कैमूर दौरों में वनाधिकार क़ानून को लागू करने की बात कई बार कह चुके हैं, लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं है.

भाजपा प्रखंड अध्यक्ष जोखन सिंह खरवार

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इमेज कैप्शन, भाजपा प्रखंड अध्यक्ष जोखन सिंह खरवार

कैमूर मुक्ति मोर्चा के उभार पर सवाल

वैसे, अभी के विरोध प्रदर्शन में कैमूर मुक्ति मोर्चा नाम के संगठन की बहुत चर्चा हो रही है. कैमूर पहाड़ी के आदिवासियों की हक़-हुकू़क़ की लड़ाई लड़ रहा कैमूर मुक्ति मोर्चा कोई नया संगठन नहीं है. यह संगठन पिछले तीस बरस से वनवासियों के लिए वनाधिकार लागू करने की लड़ाई लड़ रहा है.

कैमूर मुक्ति मोर्चा के संस्थापक डॉ विनियन ने वनाधिकार क़ानून लागू कराने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर काम किया है.

वनाधिकार के सवाल पर यह संगठन राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच से जुड़ गया.

डॉ विनियन इस राष्ट्रीय मंच के संस्थापक सदस्यों अशोक चौधरी, कामरेड डी थंकप्पन व भारती राय चौधरी में से एक थे.

राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच से जुड़ी रोमा बताती हैं, "इस मंच के माध्यम से सबसे पहले वनों के अंदर वनाश्रित समुदाय के प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकारों के लिए एक समग्र अधिनियम बनाने का मसौदा तैयार किया गया था. जिसके बाद इस मंच द्वारा पूरे देश में वन क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों को जोड़ने का काम किया गया व वामदलों के साथ मिल कर वनाधिकार क़ानून को पारित कराने का देश व्यापी संघर्ष किया गया. उनके ही प्रयासों से संसद में वनाधिकार क़ानून को मान्यता मिल सकी."

लेकिन, 2006 में डॉ विनियन की मृत्यु के बाद कैमूर मुक्ति मोर्चा की गतिविधियां कम हो गई थीं. आख़िरी बार यह संगठन 2012 में चर्चा में आया था जब कैमूर की पहाड़ियों में जातीय हिंसा की घटना घटी थी. संगठन के विरोधियों ने इसे कई बार माओवादियों और नक्सलियों से भी जोड़ा.

रोमा कहती हैं, "जो लोग हम पर माओवादियों और नक्सलियों से जुड़े होने का आरोप लगाते हैं, उन्हें यह भी जानना चाहिए कि कैमूर और रोहतास के इलाक़ों से माओवाद और नक्सलवाद का ख़ात्मा करने के लिए कैमूर मुक्ति मोर्चा ने स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर सहयोग किया था. हमारा संगठन जनवादी आधारों पर टिका है."

कैमूर

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क्या कहता है वन विभाग?

कैमूर ज़िले के 33 फ़ीसद हिस्से में वनक्षेत्र है, इसका 95 फ़ीसद हिस्सा अभयारण्य के रूप में घोषित है.

टाइगर रिज़र्व बनाने की बात को लेकर कैमूर के डीएफ़ओ विकास अहलावत कहते हैं, "तैयारियाँ चल रही हैं. समूचे वनक्षेत्र का सर्वे किया जा रहा है और यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि बाघों का बसेरा बनाना कितना सफल हो सकता है. पिछले साढ़े-तीन चार सालों ‌से यहां बाघों को लगातार स्पॉट किया गया है, इस आधार पर इसे टाइगर रिज़र्व बनाने की कोशिश हो रही है."

वन विभाग के रिकॉर्डस के मुताबिक़ कैमूर के जंगलों में पहले भी बाघों का बसेरा था. इसे टाइगर रिज़र्व बनाने से क्या हो जाएगा?

डीएफ़ओ विकास अहलावत कहे हैं, "यहां बाघों का बसेरा तो था मगर उनका संरक्षण नहीं हो सका. बीते सालों में बहुत से बाघों का शिकार हुआ है. टाइगर रिज़र्व बनने से एक बार फिर से यहां बाघों का बसेरा बनाया जा सकेगा."

बातचीत में डीएफ़ओ इस पर काफ़ी ज़ोर देते हैं कि टाइगर रिज़र्व बनने से यह जगह इको टूरिज़्म केंद्र के रूप में विकसित होगा.

कैमूर के आदिवासी

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लेकिन वनवासियों के अधिकारों का क्या?

विकास अहलावत कहते हैं, "सारे प्रतिबंध वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुरी एक्ट के तहत लगाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वन का एक पत्ता भी वन से बाहर नहीं जाना चाहिए चाहे वो सड़-गल क्यों न जाए. हम उसे मानने के लिए बाध्य हैं."

वे आगे कहते हैं, "जहां तक बात वहाँ रहने आदिवासियों की है तो उन्हें भ्रमित किया जा रहा है. विस्थापन का आधारहीन डर दिखाया जा रहा है. मैं इस बात को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कहूंगा कि टाइगर रिज़र्व बनने से किसी को उनके निवास से हटाया नहीं जाएगा. देश में कई ऐसे टाइगर रिज़र्व हैं जहाँ लोग रहते हैं."

डीएफ़ओ के मुताबिक़ टाइगर रिज़र्व के नाम पर स्थानीय आदिवासियों को बाहर के लोग बरगला रहे हैं, अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल कर रहे हैं.

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आदिवासियों पर राजनीति भी

बिहार में इस वक़्त चुनाव का माहौल है. इसलिए आदिवासियों के मुद्दे को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है.

कैमूर के चैनपुर विधानसभा क्षेत्र जिसके तहत कैमूर की पहाड़ियां भी आती हैं, वहां से विधायक हैं भाजपा के ब्रज किशोर बिंद. वे बिहार सरकार में खान और भूतत्व मंत्री भी हैं.

ब्रज किशोर बिंद बीबीसी से कहते हैं, "विरोधी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए आदिवासियों को झांसा दे रहे हैं. अभी तो टाइगर रिज़र्व बनने की बात सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही है. लेकिन चूंकि चुनाव है इसलिए उन्हें गोलबंद करने की कोशिश की जा रही है."

आदिवासियों के अधिकार छीनने का आरोप विपक्षी दल राजद पर लगाते हुए ब्रज किशोर बिंद ने कहा, "उनके ही जगदाबाबू ने इसे अभयारण्य बनवाया था. आदिवासियों को दिक़्क़तें तभी से शुरू हो गई हैं. हमारी कोशिश है कि आदिवासी समाज के हर आदमी को उसका अधिकार मिले. इसमें कई बार हमारा भी टकराव वन विभाग से हो जाता है. आदिवासियों की माँगें जायज़ हैं. लेकिन जो नियम है उसे तो मानना ही पड़ेगा."

वहीं राजद के ज़िला उपाध्यक्ष सुरेश प्रसाद सिंह बीबीसी से कहते हैं, "यदि भाजपा के नेता यह कह रहे हैं कि वन अभयारण्य जगदानंद सिंह ने बनवाया था, तो उसके बाद उनकी सरकार पिछले कई सालों से है, फिर भी वे वनवासियों को उनका अधिकार क्यों नहीं दिला पाए?"

सुरेश प्रसाद सिंह ने कहा, "बीजेपी नेता अभी खरवारों का वोट पाने के लिए कह रहे हैं कि वे उनकी माँगों के साथ हैं, लेकिन आदिवासी तो पिछले 20 सालों से अधिक ‌समय से अभयारण्य का विरोध कर रहे हैं. जहां तक राजद की बात है तो जब तक हमारी सरकार रही, हमने वनवासियों को उनका अधिकार दिलाने की भरसक कोशिश की. उसी कोशिश का परिणाम था कि संसद में वनाधिकार क़ानून पास हुआ."

चुनाव में चैनपुर विधानसभा में आदिवासियों का यह मुद्दा इस बार काफ़ी अहम रहने वाला है. वहां की 9.8 फ़ीसद आबादी वाले आदिवासी समुदाय में सबसे बड़ी आबादी खरवार जनजाति की है.

लेकिन यहां आदिवासियों का कोई बड़ा नेता नहीं है. पिछले बार के चुनाव में ब्रज किशोर बिंद बसपा के उम्मीदवार ज़मा ख़ान से सिर्फ़ 617 वोटों से बड़ी मुश्किल से जीते थे.

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ पिछली बार बिंद को खरवारों का भरपूर समर्थन मिला था. लेकिन इस बार टाइगर रिज़र्व के मुद्दे पर आदिवासी समाज में मौजूदा सरकार के प्रति रोष है.

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